Om Tat Sat Ke Prayog Ki Vyakhya / ॐ तत् सत् के प्रयोग

Om Tat Sat Ke Prayog Ki Vyakhya
ॐ तत् सत् के प्रयोग की व्याख्या

Om Tat Sat Ke Prayog Ki Vyakhya, ॐ तत् सत् के प्रयोग की व्याख्या- सृष्टि के आदिकाल से ॐ तत् सत् ये तीन शब्द परब्रह्म को सूचित करने के लिए प्रयुक्त किये जाते रहे हैं। ये तीनों सांकेतिक अभिव्यक्तियाँ ब्राह्मणों द्वारा वैदिक मन्त्रों का उच्चारण करते समय तथा ब्रह्म को संतुष्ट करने के लिए यज्ञों के समय प्रयुक्त होती थीं। अतएव योगीजन ब्रह्म की प्राप्ति के लिए शास्त्रीय विधि के अनुसार यज्ञ, दान तथा तप की समस्त क्रियाओं का शुभारम्भ सदैव ओम् से करते हैं। 

श्लोक 23 से 28

ॐतत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः ।
ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिताः पुरा ।। 23 ।।

ॐ — परम का सूचक ; तत् — वह ; सत् — शाश्वत ; इति — इस प्रकार ; निर्देशः — संकेत ; ब्रह्मणः — ब्रह्म को ; त्रि-विधः — तीन प्रकार का ; स्मृतः — माना जाता है ; ब्राह्मणाः — ब्राह्मण लोग ; तेन — उससे ; वेदाः — वैदिक साहित्य ; च — भी ; यज्ञाः — यज्ञ ; च — भी ; विहिताः — प्रयुक्त ; पुरा — आदिकाल में ।

तात्पर्य — सृष्टि के आदिकाल से ॐ तत् सत् ये तीन शब्द परब्रह्म को सूचित करने के लिए प्रयुक्त किये जाते रहे हैं। ये तीनों सांकेतिक अभिव्यक्तियाँ ब्राह्मणों द्वारा वैदिक मन्त्रों का उच्चारण करते समय तथा ब्रह्म को संतुष्ट करने के लिए यज्ञों के समय प्रयुक्त होती थीं ।

तस्माद् ॐ इत्युदाहृत्य यज्ञदानतपःक्रियाः ।
प्रवर्तन्ते विधानोक्ता सततं ब्रह्मवादिनाम् ।। 24 ।।

तस्मात् — अतएव ; ॐ — ओम् से प्रारम्भ करके ; इति — इस प्रकार ; उदाहृत्य — संकेत करके ; यज्ञ — यज्ञ ; दान — दान ; तपः — तथा तप की ; क्रियाः — क्रियाएँ ; प्रवर्तन्ते — प्रारम्भ होती हैं ; विधान-उक्ताः — शास्त्रीय विधान के अनुसार ; सततम् — सदैव ; ब्रह्म-वादिनाम् — अध्यात्मवादियों या योगियों की ।

तात्पर्य — अतएव योगीजन ब्रह्म की प्राप्ति के लिए शास्त्रीय विधि के अनुसार यज्ञ, दान तथा तप की समस्त क्रियाओं का शुभारम्भ सदैव ओम् से करते हैं ।

इसे भी पढ़ें :–

  1. अध्याय सोलह — दैवी तथा आसुरी स्वभाव
  2. अधयाय सत्रह — श्रद्धा के विभाग
  3. 1 से 6 — श्रद्धा और शास्त्र विपरीत
  4. 7 से 22 — आहार, यज्ञ, तप और दान

तदित्यनभिसन्धाय फलं यज्ञतपःक्रियाः ।
दानक्रियाश्च विविधाः क्रियन्ते मोक्षकाङक्षिभिः ।। 25 ।।

तत् — वह ; इति — इस प्रकार ; अनभिसन्धाय — बिना इच्छा किये ; फलम् — फल ; यज्ञ — यज्ञ ; तपः — तथा तप की ; क्रियाः — क्रियाएँ ; दान — दान की ; क्रियाः — क्रियाएँ ; च — भी ; विविधाः — विभिन्न ; क्रियन्ते — की जाती हैं ; मोक्ष-काङक्षिभिः — मोक्ष चाहने वालों के द्वारा ।

तात्पर्य — मनुष्य को चाहिए कि कर्मफल की इच्छा किये बिना विविध प्रकार के यज्ञ, तप तथा दान को ‘ तत् ‘ शब्द कह कर सम्पन्न करे। ऐसी दिव्य क्रियाओं का उद्देश्य भव-बन्धन से मुक्त होना है ।

सद्भावे साधुभावे च सदित्येतत्प्रयुज्ते ।
प्रशस्ते कर्मणि तथा सच्छब्दः पार्थ युज्यते ।। 26 ।।

यज्ञे तपसि दाने च स्थितिः सदिति चोच्यते
कर्म चैव तदर्थीयं सदित्येवाभिधीयते ।। 27 ।।

सत्-भावे — ब्रह्म के स्वभाव के अर्थ में ; साधु-भावे — भक्त के स्वभाव के अर्थ में ; च — भी ; सत् –सत् शब्द ; इति — इस प्रकार ; एतत् — यह ; प्रयुज्यते — प्रयुक्त किया जाता है ; प्रशस्ते — प्रामाणिक ; कर्माणि — कर्मों में ; तथा — भी ; सत्-शब्दः —  सत् शब्द ; पार्थ — हे पृथापुत्र ; युज्यते — प्रयुक्त किया जाता है ; यज्ञे — यज्ञ में ; तपसि — तपस्या में ; दाने — दान में ; च — भी ; स्थितिः — स्थिति ; सत् — ब्रह्म ; इति — इस प्रकार ; च — तथा ; उच्यते — उच्चारण किया जाता है ; कर्म — कार्य ; च — भी ; एव — निश्चय ही ; तत् — उस ; अर्थीयम् — के लिए ; सत् — ब्रह्म ; इति — इस प्रकार ; एव — निश्चय ही ; अभिधीयते — कहा जाता है ।

तात्पर्य — परम सत्य भक्तिमय यज्ञ का लक्ष्य है और उसे सत् शब्द से अभिहित किया जाता है।  हे पृथापुत्र ! ऐसे यज्ञ का सम्पन्नकर्ता भी ‘ सत् ‘ कहलाता है, जिस प्रकार यज्ञ, तप तथा दान के सारे कर्म भी, जो परमपुरुष को प्रसन्न करने के लिए सम्पन्न किये जाते हैं, ‘ सत् ‘ हैं ।

अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत् ।
असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह ।। 28 ।।

अश्रद्धया — श्रद्धारहित ; हुतम् — यज्ञ में आहुति किया गया ; दत्तम् — प्रदत्त ; तपः — तपस्या ; तप्तम् — सम्पन्न ; कृतम् — किया गया ; च — भी ; यत् — जो ; असत् — झूठा ; इति — इस प्रकार ; उच्यते — कहा जाता है ; पार्थ — हे पृथापुत्र ; न — कभी नहीं ; च — भी ; तत् — वह ; प्रेत्य — मर कर ; न उ — न तो ; इह — इस जीवन में ।

तात्पर्य — हे पार्थ ! श्रद्धा के बिना यज्ञ, दान या तप के रूप में जो भी किया जाता है, वह नश्वर है। वह ‘ असत् ‘ कहलाता है और इस जन्म तथा अगले जन्म — दोनों में ही व्यर्थ जाता है।

आगे के श्लोक :–

इस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीता के सत्रहवें अध्याय ” श्रद्धा के विभाग ” का भक्तिवेदान्त तात्पर्य पूर्ण हुआ।

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