Agyani Aur Gyanwan Ke Lakshan / अज्ञानी और ज्ञानवान् के लक्षण

Agyani Aur Gyanwan Ke Lakshan

Agyani Aur Gyanwan Ke Lakshan Tatha Rag Dwesh Se Rahit Hokar Karma Karne Ke Liye Prerna, अज्ञानी और ज्ञानवान् के लक्षण तथा राग द्वेष से रहित होकर कर्म करने के लिए प्रेरणा- विद्वान व्यक्ति चाहिए कि वह सकाम कर्मों में आसक्त अज्ञानी पुरुषों को कर्म करने से रोके नहीं ताकि उनके मन विचलित न हों । अपितु भक्तिभाव से कर्म करते हुए वह उन्हें सभी प्रकार के कार्यों में लगाये ( जिससे कृष्णभावनामृत का क्रमिक विकास हो )।

Gyanwan Aur Bhagwan / ज्ञानवान् और भगवान्

Gyanwan Aur Bhagwan Ke Liye Loksangrharth

Gyanwan Aur Bhagwan Ke Liye Loksangrharth Karmon Ki Avashyakta, ज्ञानवान् और भगवान् के लिए भी लोकसंग्रहार्थ कर्मों की आवश्यकता- महापुरुष जो जो आचरण करता है, सामान्य व्यक्ति उसी का अनुसरण करते हैं। वह अपने अनुसरणीय कार्यों से जो आदर्श प्रस्तुत करता है, सम्पूर्ण विश्व उसका अनुसरण करता है। यदि मैं नियतकर्म न करूँ तो ये सारे लोग नष्ट हो जायँ।

Yagyadi Karmon Ki Avashyakta Ka Nirupan / यज्ञादि कर्मों

Yagyadi Karmon Ki Avashyakta Ka Nirupan

Yagyadi Karmon Ki Avashyakta Ka Nirupan, यज्ञादि कर्मों की आवश्यकता का निरूपण- सृष्टि के प्रारम्भ में समस्त प्राणियों के स्वामी ( प्रजापति ) ने विष्णु के लिए यज्ञ सहित मनुष्यों तथा देवताओं की सन्ततियों को रचा और उनसे कहा, ”तुम इस यज्ञ से सुखी रहो क्योंकि इसके करने से तुम्हे सुखपूर्वक रहने तथा मुक्ति प्राप्त करने के लिए समस्त वांछित वस्तुएँ प्राप्त हो सकेंगी। हे प्रिय अर्जुन !

Gyanyog Aur Karmyog / ज्ञानयोग और कर्मयोग

Gyanyog Aur Karmyog

Gyanyog Aur Karmyog Ke Anusar Anasakt Bhav Se Niyat Karma Karne Ki Shreshthta Ka Nirupan, ज्ञानयोग और कर्मयोग के अनुसार अनासक्त भाव से नियत कर्म करने की श्रेष्ठता का निरुपण- श्रीभगवान् ने कहा — हे निष्पाप अर्जुन ! मैं पहले ही बता चुका हूँ  कि आत्म-साक्षात्कार का प्रयत्न करने वाले दो प्रकार के पुरुष होते हैं। कुछ इसे ज्ञानयोग द्वारा समझने का प्रयत्न करते हैं, तो कुछ भक्ति-मय सेवा के द्वारा।

Sthir Buddhi Purush Ke Lakshan / स्थिर बुद्धि पुरुष

Sthir Buddhi Purush Ke Lakshan

Sthir Buddhi Purush Ke Lakshan Aur Uski Mahima, स्थिर बुद्धि पुरुष के लक्षण और उसकी महिमा- श्रीभगवान् ने कहा – हे पार्थ ! जब मनुष्य मनोधर्म से उत्त्पन्न होने वाली इन्द्रियतृप्ति की समस्त कामनाओं का परित्याग कर देता है और जब इस तरह से विशुद्ध हुआ उसका मन आत्मा में सन्तोष प्राप्त करता है तो वह विशुद्ध दिव्य चेतना को प्राप्त (स्थितप्रज्ञ) कहा जाता है। अतः हे महाबाहु !

Karmyog Ka Vishay / कर्मयोग का विषय

Karmyog Ka Vishay

Karmyog Ka Vishay, कर्मयोग का विषय- इस तरह भगवद्भक्ति में लगे रहकर बड़े-बड़े ऋषि, मुनि अथवा भक्तगण अपने आपको इस भौतिक संसार में कर्म के फलों से मुक्त कर लेते हैं। इस प्रकार वे जन्म-मृत्यु के चक्र से छूट जाते हैं और भगवान् के पास जाकर उस अवस्था को प्राप्त करते हैं, जो समस्त दुःखों से परे हैं। भक्ति में संलग्न मनुष्य इस जीवन में ही अच्छे तथा बुरे कार्यों से अपने मुक्त कर लेता है। अतः योग के लिए प्रयत्न करो क्योंकि सारा कार्य-कौशल यही है।

Kshatrdharm Ke Anusar Yuddh / क्षात्रधर्म के अनुसार युद्ध

Kshatrdharm Ke Anusar Yuddh Karne

Kshatrdharm Ke Anusar Yuddh Karne Ki Avashyakta, क्षात्रधर्म के अनुसार युद्ध करने की आवश्यकता- हे कुन्तीपुत्र ! तुम यदि युद्ध में मारे जाओगे तो स्वर्ग प्राप्त करोगे या यदि तुम जीत जाओगे तो पृथ्वी के साम्राज्य का भोग करोगे। अतः ढृढ़ संकल्प करके खड़े होओ और युद्ध करो। तुम सुख या दुःख, हानि या लाभ, विजय या पराजय का विचार किये बिना युद्ध के लिए युद्ध करो। ऐसा करने पर तुम्हें कोई पाप नहीं लगेगा।

Sankhya Yog Ka Vishay / सांख्य योग का विषय

Sankhya Yog Ka Vishay

Sankhya Yog Ka Vishay, सांख्य योग का विषय- आत्मा के लिए किसी भी काल में न तो जन्म है न मृत्यु। वह न तो कभी जन्मा है, न जन्म लेता है और न जन्म लेगा। वह अजन्मा, नित्य, शाश्वत तथा पुरातन है। शरीर के मारे जाने पर वह मारा नहीं जाता। हे भरतवंशी ! शरीर में रहने वाले (देही) का कभी भी वध नहीं किया जा सकता। अतः तुम्हें किसी भी जीव के लिए शोक करने की आवश्यकता नहीं है।

Arjun Ki Kayarta Ke Vishay / अर्जुन की कायरता के विषय

Arjun Ki Kayarta Ke Vishay Mein

Arjun Ki Kayarta Ke Vishay Mein Srikrishnarjun Samwad, अर्जुन की कायरता के विषय में श्रीकृष्णार्जुन संवाद- श्रीभगवान् ने कहा – हे अर्जुन ! तुम्हारे मन में यह कल्मष आया कैसे ? यह उस मनुष्य के लिए तनिक भी अनुकूल नहीं है, जो जीवन के मूल्य को जानता हो। इससे उच्चलोक की नहीं अपितु अपयश की प्राप्ति होती है। ऐसे महापुरुषों को जो मेरे गुरु हैं, उन्हें मार कर जीने की अपेक्षा इस संसार में भीख माँग कर खाना अच्छा है।

Moh Se Vyapt Arjun / मोह से व्याप्त अर्जुन

Moh Se Vyapt Arjun Ke Kayarta

Moh Se Vyapt Arjun Ke Kayarta Sneh Aur Shokyukt Vachan, मोह से व्याप्त अर्जुन के कायरता स्नेह और शोकयुक्त वचन- हे गोविन्द ! हमें राज्य, सुख अथवा इस जीवन से क्या लाभ ! क्योंकि जिन सारे लोगों के लिए हम उन्हें चाहते हैं वे ही इस युद्धभूमि में खड़े हैं। हे मधुसूदन ! जब गुरुजन, पितृगण, पुत्रगण, पितामह, मामा, ससुर, पौत्रगण, साले तथा अन्य सारे सम्बन्धी अपना-अपना धन एवं प्राण देने के लिए तत्पर हैं और मेरे समक्ष खड़े हैं तो फिर मैं इन सबको क्यों मारना चाहूँगा, भले ही वे मुझे क्यों न मार डालें ? हे जीवों के पालक !

Arjun Dwara Sena Nirikshan / अर्जुन द्वारा सेना निरीक्षण

Arjun Dwara Sena Nirikshan Ka Prasang

Arjun Dwara Sena Nirikshan Ka Prasang, अर्जुन द्वारा सेना निरीक्षण का प्रसंग- उस समय हनुमान से अंकित ध्वजा लगे रथ पर आसीन पाण्डुपुत्र अर्जुन ने अपना धनुष उठा कर तीर चलाने के लिए उद्यत हुआ। हे राजन् ! धृतराष्ट्र के पुत्रों को व्यूह में खड़ा देखकर अर्जुन ने श्रीकृष्ण से ये वचन कहे। अर्जुन ने कहा – हे अच्युत ! कृपा करके मेरा रथ दोनों सेनाओं के बीच ले चलें जिससे मैं यहाँ उपस्थित युद्ध की अभिलाषा रखने वालों को और शस्त्रों की इस महान परीक्षा में, जिनसे मुझे संघर्ष करना है, उन्हें देख सकूँ।

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