Prabhav Sahit Gyan Ka Vishay / प्रभाव सहित ज्ञान का विषय

अध्याय नौ परम गुह्य ज्ञान

Prabhav Sahit Gyan Ka Vishay
प्रभाव सहित ज्ञान का विषय

Prabhav Sahit Gyan Ka Vishay, प्रभाव सहित ज्ञान का विषय- श्रीभगवान् ने कहा — हे अर्जुन ! चूँकि तुम मुझसे कभी ईर्ष्या नहीं करते, इसलिए मैं तुम्हें यह परम गुह्यज्ञान तथा अनुभूति बतलाऊँगा, जिसे जानकर संसार के सारे क्लेशों से मुक्त हो जाओगे। यह ज्ञान सब विद्याओं का राजा है, जो समस्त रहस्यों में सर्वाधिक गोपनीय है। यह परम शुद्ध है और चूँकि यह आत्मा की प्रत्यक्ष अनुभूति कराने वाला है, अतः यह धर्म का सिद्धान्त है। यह अविनाशी है और अत्यन्त सुखपूर्वक सम्पन्न किया जाता है। 

श्लोक 1 से 6

श्रीभगवानुवाच —
इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे ।
ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् ।। 1 ।।

श्री-भगवान् उवाच — श्रीभगवान् ने कहा; इदम् — इस; तु — लेकिन; ते — तुम्हारे लिए; गुह्य-तमम् — अत्यन्त गुह्य; प्रवक्ष्यामि — कह रहा हूँ; अनसूयवे — ईर्ष्या न करने वाले को; ज्ञानम् — ज्ञान को; विज्ञान — अनुभूत ज्ञान; सहितम् — सहित; यत् — जिसे; ज्ञात्वा — जानकर; मोक्ष्यसे — मुक्त हो सकोगे; अशुभात् — इस कष्टमय संसार से। 

तात्पर्य — श्रीभगवान् ने कहा — हे अर्जुन ! चूँकि तुम मुझसे कभी ईर्ष्या नहीं करते, इसलिए मैं तुम्हें यह परम गुह्यज्ञान तथा अनुभूति बतलाऊँगा, जिसे जानकर संसार के सारे क्लेशों से मुक्त हो जाओगे।

राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम्
प्रत्यक्षावगमं धर्म्यं सुसुखं कर्तुमव्ययम् ।। 2 ।।

राज-विद्या — विद्याओं का राजा; राज-गुह्यम् — गोपनीय ज्ञान का राजा; पवित्रम् — शुद्धतम; इदम् — यह; उत्तमम् — दिव्य; प्रत्यक्ष — प्रत्यक्ष अनुभव से; अवगमम् — समझा गया; धर्म्यम् — धर्म; सु-सुखम् — अत्यन्त सुखी; कर्तुम् — सम्पन्न करने में; अव्ययम् — अविनाशी। 

तात्पर्य — यह ज्ञान सब विद्याओं का राजा है, जो समस्त रहस्यों में सर्वाधिक गोपनीय है। यह परम शुद्ध है और चूँकि यह आत्मा की प्रत्यक्ष अनुभूति कराने वाला है, अतः यह धर्म का सिद्धान्त है। यह अविनाशी है और अत्यन्त सुखपूर्वक सम्पन्न किया जाता है।

अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप ।
अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवत्र्मनि ।। 3 ।।

अश्रद्दधानाः — श्रद्धाविहीन; पुरुषाः — पुरुष; धर्मस्य — धर्म के प्रति; अस्य — इस; परन्तप — हे शत्रुहन्ता; अप्राप्य — बिना प्राप्त किये; माम् — मुझको; निवर्तन्ते — लौटते हैं; मृत्यु — मृत्यु के; संसार — संसार में; वत्र्मनि — पथ में। 

तात्पर्य — हे परन्तप ! जो लोग भक्ति में श्रद्धा नहीं रखते, वे मुझे प्राप्त नहीं कर पाते। अतः वे इस भौतिक जगत् में जन्म-मृत्यु के मार्ग पर वापस आते रहते हैं।

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  1. भगवद्गीता यथारूप हिंदी में
  2. अध्याय दो — गीता का सार
  3. अध्याय सात — भगवद्ज्ञान
  4. अध्याय आठ — भगवत्प्राप्ति

 मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना ।
मत्स्थानि सर्वभूतानि चाहं तेष्ववस्थितः ।। 4 ।।

मया — मेरे द्वारा; ततम् — व्याप्त है; ईदम् — यह; सर्वम् — समस्त; जगत् — दृश्य जगत्; अव्यक्त-मूर्तिना — अव्यक्त रूप द्वारा; मत्-स्थानि — मुझमें; सर्व-भूतानि — समस्त जीव; न — नहीं; च — भी; अहम् — मैं; तेषु — उनमें; अवस्थितः — स्थित।

तात्पर्य — यह सम्पूर्ण जगत् मेरे अव्यक्त रूप द्वारा व्याप्त है। समस्त जीव मुझमें हैं, किन्तु मैं उनमें नहीं हूँ।

न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम् ।
भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावनः ।। 5 ।।

न — कभी नहीं; च —  भी; मत्-स्थानि — मुझमें स्थित; भूतानि — सारी सृष्टि; पश्य — देखो; मे — मेरा; योगम् ऐश्वरम् — अचिन्त्य योगशक्ति; भूत-भृत् — समस्त जीवों का पालक; न — नहीं; च — भी; भूत-स्थः — विराट अभिव्यक्ति में; मम — मेरा; आत्मा — स्व, आत्म; भूत-भावनः — समस्त अभिव्यक्तियों का स्त्रोत। 

तात्पर्य — तथापि मेरे द्वारा उत्पन्न सारी वस्तुएँ मुझमें स्थित नहीं रहतीं । जरा, मेरे योग-ऐश्वर्य को देखो ! यद्यपि मैं समस्त जीवों का पालक (भर्ता ) हूँ और सर्वत्र व्याप्त हूँ, लेकिन मैं इस विराट अभिव्यक्ति का अंश नहीं हूँ, क्योंकि मैं सृष्टि का कारणस्वरूप हूँ।

यथाकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान्
तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय ।। 6 ।।

यथा — जिस प्रकार; आकाश-स्थितः — आकाश में स्थित; नित्यम् — सदैव; वायुः — हवा; सर्वत्र-गः — सभी जगह बहने वाली; महान् — महान; तथा — उसी प्रकार; सर्वाणि भूतानि — सारे प्राणी; मत्-स्थानि — मुझमें स्थित; इति — इस प्रकार; उपधारय — समझो। 

तात्पर्य — जिस प्रकार सर्वत्र प्रवहमान प्रबल वायु सदैव आकाश में स्थित रहती है, उसी प्रकार समस्त उत्पन्न प्राणियों को मुझमें स्थित जानो।

आगे के श्लोक :–

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