Parmeshwar Ke Swaroop Ka Vishay / परमेश्वर के स्वरुप का विषय

अध्याय पन्द्रह पुरुषोत्तम योग

Prabhav Sahit Parmeshwar Ke Swaroop Ka Vishay
प्रभाव सहित परमेश्वर के स्वरुप का विषय

Prabhav Sahit Parmeshwar Ke Swaroop Ka Vishay, प्रभाव सहित परमेश्वर के स्वरुप का विषय- मैं प्रत्येक लोक में प्रवेश करता हूँ और मेरी शक्ति से सारे लोक अपनी कक्षा में स्थित रहते हैं। मैं चन्द्रमा बनकर समस्त वनस्पतियों को जीवन-रस प्रदान करता हूँ। मैं समस्त जीवों के शरीरों में पाचन-अग्नि ( वैश्वानर ) हूँ और मैं श्वास-प्रश्वास ( प्राण-वायु ) में रह कर चार प्रकार के अन्नों को पचाता हूँ। मैं प्रत्येक जीव के हृदय में आसीन हूँ और मुझ से ही स्मृति, ज्ञान तथा विस्मृति होती है। 

श्लोक 12 से 15

यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम् ।
यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम् ।। 12 ।।

यत् — जो ; आदित्य-गतम् — सूर्यप्रकाश में स्थित ; तेजः — तेज ; जगत् — सारा संसार ; भासयते — प्रकाशित होता है ; अखिलम् — सम्पूर्ण ; यत् — जो ; चन्द्रमसि — चन्द्रमा में ; यत् — जो ; च — भी; अग्नौ — अग्नि में ; तत् — वह ; तेजः — तेज ; विद्धि — जानो ; मामकम् — मुझसे ।

तात्पर्य — सूर्य का तेज, जो सारे विश्व के अंधकार को दूर करता है, मुझसे ही निकलता है। चन्द्रमा तथा अग्नि के तेज भी मुझसे उत्पन्न हैं ।

गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा
पुष्णामि चौषधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः ।। 13 ।।

गाम् — लोक में ; आविश्य — प्रवेश करके ; च — भी ; भूतानि — जीवों को ; धारयामि — धारण करता हूँ ; अहम् — मैं ; ओजसा — अपनी शक्ति से ; पुष्णामि — पोषण करता हूँ ; च — तथा ; औषधीः — वनस्पतियों का ; सर्वाः — समस्त ; सोमः — चन्द्रमा ; भूत्वा — बनकर ; रस-आत्मकः — रस प्रदान करने वाला ।

तात्पर्य — मैं प्रत्येक लोक में प्रवेश करता हूँ और मेरी शक्ति से सारे लोक अपनी कक्षा में स्थित रहते हैं। मैं चन्द्रमा बनकर समस्त वनस्पतियों को जीवन-रस प्रदान करता हूँ ।

इसे भी पढ़ें :–

  1. अध्याय तेरह — प्रकृति, पुरुष तथा चेतना
  2. अध्याय चौदह — प्रकृति के तीन गुण
  3. अध्याय पन्द्रह — पुरुषोत्तम योग

अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः ।
प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम् ।। 14 ।।

अहम् — मैं ; वैश्वानरः — पाचक- अग्नि के रुप में मेरा पूर्ण अंश ; भूत्वा — बन कर ; प्राणिनाम् — समस्त जीवों के ; देहम् — शरीरों में ; आश्रितः — स्थित ; प्राण — उछ्वास, निश्वास ; अपान — श्वास ; समायुक्तः — सन्तुलित रखते हुए ; पचामि — पचाता हूँ ; अन्नम् — अन्न को ; चतुः-विधम् — चार प्रकार के ।

तात्पर्य — मैं समस्त जीवों के शरीरों में पाचन-अग्नि ( वैश्वानर ) हूँ और मैं श्वास-प्रश्वास ( प्राण-वायु ) में रह कर चार प्रकार के अन्नों को पचाता हूँ ।

 सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो
मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च ।
वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो
वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम् ।। 15 ।।

सर्वस्य — समस्त प्राणियों ; च — तथा ; अहम् — मैं ; हृदि — हृदय में ; सन्निविष्टः — स्थित ; मत्तः — मुझ से ; स्मृतिः — स्मरणशक्ति ; ज्ञानम् — ज्ञान ; अपोहनम् — विस्मृति ; च — तथा ; वेदैः — वेदों के द्वारा ; च — भी ; सर्वैः — समस्त ; अहम् — मैं हूँ ; एव — निश्चय ही ; वैद्यः — जानने योग्य, ज्ञेय ; वेदान्त-कृत् — वेदान्त के संकलनकर्ता ; वेद-वित् — वेदों के ज्ञाता ; एव — निश्चय ही ; च — तथा ; अहम् — मैं ।

तात्पर्य — मैं प्रत्येक जीव के हृदय में आसीन हूँ और मुझ से ही स्मृति, ज्ञान तथा विस्मृति होती है। मैं ही वेदों के द्वारा जानने योग्य हूँ। निस्सन्देह मैं वेदान्त का संकलनकर्ता तथा समस्त वेदों का जानने वाला हूँ ।

आगे के श्लोक :–

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