Prayag Pahunchna, Shriram Bhardwaj Samvad / प्रयाग पहुँचना

श्रीरामचरितमानस अयोध्या काण्ड

Prayag Pahunchna, Shriram Bhardwaj Samwad, Yamunateer Nivasiyon Ka Prem
प्रयाग पहुँचना, श्रीराम भरद्वाज संवाद, यमुनातीर निवासियों का प्रेम

Prayag Pahunchna, Shriram Bhardwaj Samwad, Yamunateer Nivasiyon Ka Prem, प्रयाग पहुँचना, श्रीराम भरद्वाज संवाद, यमुनातीर निवासियों का प्रेम — प्रयाग क्षेत्र ही दुर्गम, मजबूत और सुन्दर गढ़ ( किला ) है, जिसको स्वप्न में भी [ पापरूपी ] शत्रु नहीं पा सके हैं। सम्पूर्ण तीर्थ ही उसके श्रेष्ठ वीर सैनिक हैं, जो पाप की सेना को कुचल डालने वाले और बड़े रणधीर हैं। [ गङ्गा, यमुना और सरस्वती का ] सङ्गम ही उसका अत्यन्त सुशोभित सिंहासन है। अक्षयवट छत्र है, जो मुनियों के भी मन को मोहित कर लेता है। यमुनाजी और गङ्गाजी की तरंगे उसके [ श्याम और श्वेत ] चँवर हैं, जिनको देखकर ही दुःख और दरिद्रता नष्ट हो जाती है।


तेहि दिन भयउ बिटप तर बासू। लखन सखाँ सब कीन्ह सुपासू ।।

प्रात प्रातकृत करि रघुराई। तीरथराजू दीख प्रभु जाई ।।

अर्थात् :- उस दिन पेड़ के नीचे निवास हुआ। लक्ष्मणजी और सखा गहने [ विश्राम की ] सब सुव्यवस्था कर दी। प्रभु श्रीरामचन्द्रजी ने सबेरे प्रातःकाल की सब क्रियाएँ करके जाकर तीर्थों के राजा प्रयाग के दर्शन किये।

सचिव सत्य श्रद्धा प्रिय नारी। माधव सरिस मीतु हितकारी ।।
चारि पदारथ भरा भँडारू। पुन्य प्रदेस देस अति चारू ।।

अर्थात् :- उस राजा का सत्य मन्त्री है, श्रद्धा प्यारी स्त्री है श्रीवेणीमाधवजी – सरीखे हितकारी मित्र हैं। चार पदार्थों ( धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष ) से भण्डार भरा है और वह पुण्यमय प्रान्त ही उस राजा का सुन्दर देश है।

छेत्रु अगम गढ़ु गाढ़ सुहावा। सपनेहुँ नहिं प्रतिपच्छिन्ह पावा ।।
सेन सकल तीरथ बर बीरा। कलुष अनीक दलन रनधीरा ।।

अर्थात् :- प्रयाग क्षेत्र ही दुर्गम, मजबूत और सुन्दर गढ़ ( किला ) है, जिसको स्वप्न में भी [ पापरूपी ] शत्रु नहीं पा सके हैं। सम्पूर्ण तीर्थ ही उसके श्रेष्ठ वीर सैनिक हैं, जो पाप की सेना को कुचल डालने वाले और बड़े रणधीर हैं।

संगमु सिंहासनु सुठि सोहा। छत्रु अखयबटु मुनि मनु मोहा ।।
चवँर जमुन अरु गंग तरंगा। देखि होहिं दुख दारिद भंगा ।।

अर्थात् :- [ गङ्गा, यमुना और सरस्वती का ] सङ्गम ही उसका अत्यन्त सुशोभित सिंहासन है। अक्षयवट छत्र है, जो मुनियों के भी मन को मोहित कर लेता है। यमुनाजी और गङ्गाजी की तरंगे उसके [ श्याम और श्वेत ] चँवर हैं, जिनको देखकर ही दुःख और दरिद्रता नष्ट हो जाती है।

दो० — सेवहिं सुकृती साधु सुचि पावहिं सब मनकाम ।
बंदी बेद पुरान गन कहहिं बिमल गुन ग्राम ।। 105 ।।

अर्थात् :- पुण्यात्मा, पवित्र साधु उसकी सेवा करते हैं और सब मनोरथ पाते हैं। वेद और पुराणों के समूह भाट हैं, जो उसके निर्मल गुणगणों का बखान करते हैं।

को कहि सकइ प्रयाग प्रभाऊ। कलुष पुंज कुंजर मृगराऊ ।।
अस तीरथपति देखि सुहावा। सुख सागर रघुबर सुखु पावा ।।

अर्थात् :- पापों के समूह रूपी हाथी के मारने के लिये सिंह रूप प्रयागराज का प्रभाव ( महत्त्व-माहात्म्य ) कौन कह सकता है। ऐसे सुहावन तीर्थराज का दर्शन कर सुख के समुद्र रघुकुल श्रेष्ठ श्रीरामजी ने भी सुख पाया।

कहि सिय लखनहि सखहि सुनाई। श्रीमुख तीरथराज बड़ाई ।।
करि प्रनामु देखत बन बागा। कहत महातम अति अनुरागा ।।

अर्थात् :- उन्होंने अपने श्रीमुख से सीताजी, लक्ष्मणजी और सखा गुह को तीर्थराज की महिमा कहकर सुनायी। तदनन्तर प्रणाम करके, वन और बगीचों को देखते हुए और बड़े से माहात्म्य कहते हुए। –

एहि बिधि आइ बिलोकी बेनी। सुमिरत सकल सुमंगल देनी ।।
मुदित नहाइ कीन्हि सिव सेवा। पूजि जथाबिधि तीरथ देवा ।।

अर्थात् :- इस प्रकार श्रीरामजी ने आकर त्रिवेणी के दर्शन किया, जो स्मरण करने से ही सब सुन्दर मङ्गलों को देनेवाली है। फिर आनन्दपूर्वक [ त्रिवेणी में ] स्नान करके शिवजी की सेवा ( पूजा ) की और विधिपूर्वक तीर्थ देवताओं का पूजन किया।

तब प्रभु भरद्वाज पहिं आए। करत दंडवत मुनि उर लाए ।।
मुनि मन मोद न कछु कहि जाई। ब्रह्मानंद रासि जनु पाई ।।

अर्थात् :- [ स्नान, पूजन आदि सब करके ] तब प्रभु श्रीरामजी भरद्वाजजी के पास आये। उन्हें दण्डवत् करते हुए ही मुनि ने हृदय से लगा लिया। मुनि के मन का आनन्द कुछ कहा नहीं जाता। मानो उन्हें ब्रह्मानन्द की राशि मिल गयी हो।

दो० — दीन्हि असीस मुनीस उर अति अनंदु अस जानि ।
लोचन गोचर सुकृत फल मनहुँ किए बिधि आनि ।। 106 ।।

अर्थात् :- मुनीश्वर भरद्वाजजी ने आशीर्वाद दिया। उनके हृदय में ऐसा जानकर अत्यन्त आनन्द हुआ कि आज विधाता ने [ श्रीसीताजी और लक्ष्मणजी सहित प्रभु श्रीरामचन्द्रजी के दर्शन कराकर ] मानो हमारे सम्पूर्ण पुण्यों के फल को लाकर आँखों के सामने कर दिया।

कुसल प्रस्न करि आसन दीन्हे। पूजि प्रेम परिपूरन कीन्हे ।।
कंद मूल फल अंकुर नीके। दिए आनि मुनि मनहुँ अमी के ।।

अर्थात् :- कुशल पूछकर मुनिराज ने उनको आसन दिये और प्रेमसहित पूजन करके उन्हें संतुष्ट कर दिया। फिर मानो अमृत के ही बने हों, ऐसे अच्छे-अच्छे कन्द, मूल, फल और अंकुर लाकर दिये।

सीय लखन जन सहित सुहाए। अति रूचि राम मूल फल खाए ।।
भए बिगतश्रम रामु सुखारे। भरद्वाज मृदु बचन उचारे ।।

अर्थात् :- सीताजी, लक्ष्मणजी और सेवक गुह सहित श्रीरामचन्द्रजी ने उन सुन्दर मूल-फलों को बड़ी रूचि के साथ खाया। थकावट दूर होने से श्रीरामचन्द्रजी सुखी हो गये। तब भरद्वाजजी ने उनसे कोमल वचन कहे —

आजु सुफल तपु तीरथ त्यागू। आजु सुफल जप जोग बिरागू ।।
सफल सकल सुभ साधन साजू। राम तुम्हहि अवलोकत आजू ।।

अर्थात् :- हे राम ! आपका दर्शन करते ही आज मेरा तप, तीर्थसेवन और त्याग सफल हो गया। आज मेरा जप, योग और वैराग्य सफल हो गया और आज मेरे सम्पूर्ण शुभ साधनों का समुदाय भी सफल हो गया।

लाभ अवधि सुख अवधि न दूजी। तुम्हरें दरस आस सब पूजी ।।
अब करि कृपा देहु बर एहू। निज पद सरसिज सहज सनेहू ।।

अर्थात् :- लाभ की सीमा और सुख की सीमा [ प्रभु के दर्शन को छोड़कर ] दूसरी कुछ भी नहीं है। आपके दर्शन से मेरी सब आशाएँ पूर्ण हो गयीं। अब कृपा करके यह वरदान दीजिये कि आपके चरण कमलों स्वाभाविक प्रेम हो।

दो० — करम बचन मन छाड़ि छलु जब लगि जनु न तुम्हार ।
तब लगि सुखु सपनेहुँ नहीं किएँ कोटि उपचार ।। 107 ।।

अर्थात् :- जब तक कर्म, वचन और मन से छल छोड़कर मनुष्य आपका दास नहीं हो जाता, तब तक करोड़ों उपाय करने से भी, स्वप्न में भी वह सुख नहीं पाता।

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