Rakshabandhan Ki Katha / रक्षाबंधन की कथा

Rakshabandhan Ki Katha
रक्षाबंधन की कथा


Rakshabandhan Ki Katha Ka Mahattva, रक्षाबंधन की कथा का महत्त्व :- यह त्यौहार सावन की पूर्णिमा को मनाया जाता है। यह भाई-बहन को स्नेह की डोर में बाँधने वाला त्यौहार है। इस दिन बहन  भाई के हाथ में राखी बाँधती है तथा मस्तक पर टीका लगाती है। रक्षा-बंधन का अर्थ है रक्षा + बन्धन = अर्थात् किसी को अपनी रक्षा के लिए बाँध लेना। राखी बाँधते समय बहन कहती है — हे भैया ! मैं तुम्हारी शरण में हूँ। मेरी सब प्रकार से रक्षा करना। एक बार भगवान् कृष्ण के हाथ में चोट लग गई तथा खून गिरने लगा। द्रोपदी ने जब देखा तो वह तुरन्त साड़ी की कोर फाड़कर श्रीकृष्ण जी के हाथ में बाँध दी। इसी बन्धन के ऋणी श्रीकृष्ण ने दुःशासन द्वारा चीर खींचते समय द्रोपदी की लाज राखी थी।

मध्यकालीन इतिहास में एक ऐसी घटना मिलती है जिसमें चित्तौड़ की हिन्दुरानी कर्मवती ने दिल्ली के मुग़ल बादशाह हुमायूँ को अपना भाई मानकर उसके पास राखी भेजी थी। हुमायूँ ने कर्मवती की राखी स्वीकार कर ली और उसकी सम्मान-रक्षा के लिए गुजरात बादशाह  किया।

रक्षाबंधन कथा :-

एक बार युधिष्ठिर ने श्री कृष्ण भगवान् से पूछा — हे अच्युत ! मुझे रक्षा-बंधन की वह कथा सुनाइये जिसमें मनुष्यों की प्रेत-बाधा तथा दुःख दूर होते हैं। इस पर भगवान् ने कहा — हे पाण्डव श्रेष्ठ ! प्राचीन समय में एक बार देवों तथा असुरों में बारह वर्षों तक युद्ध चलता रहा। युद्ध में देवराज इन्द्र की पराजय हुई। देवता कान्ति-विहीन हो गये। इन्द्र रणस्थल छोड़कर विजय की आशा को तिलांजलि देकर देवताओं सहित अमरावती चले गये।

विजेता दैत्यराज ने तीनों लोकों को अपने वश में कर लिया। उसने राजपद से घोषित कर दिया कि ” इन्द्र देवसभा में न आवें तथा देवता एवं मनुष्य यज्ञ कर्म न करें। सब लोग मेरी पूजा करें।

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