Shri Ram Guun Ka Mahatmya / श्री राम गुण का माहात्म्य

Shri Ram Guun Ka Mahatmya

Shri Ram Guun Ka Mahatmya, श्री राम गुण का माहात्म्य, श्रीरामचरितमानस किष्किन्धाकाण्ड – वानरों की सेना साथ लेकर राक्षसों का संहार करके श्रीरामजी सीताजी को ले आयेंगे। तब देवता और नारदादि मुनि भगवान् के तीनों लोकों को पवित्र करने वाले सुन्दर यश का बखान करेंगे, जिसे सुनने, गाने, कहने और समझने से मनुष्य परमपद पाते हैं और जिसे श्रीरघुवीर के चरणकमल का मधुकर ( भ्रमर ) तुलसीदास गाता है। 

Samudra Langhne Ka Paramarsh / समुद्र लाँघने का परामर्श

Samudra Langhne Ka Paramarsh

Samudra Langhne Ka Paramarsh, Jambwant Ka Hanuman Ji Ko Bal Yaad Dilakar Utsahit Karna, समुद्र लाँघने का परामर्श, जाम्बवंत का हनुमान जी को बल याद दिलाकर उत्साहित करना, श्रीरामचरितमानस किष्किन्धाकाण्ड – हे तात ! तुम जाकर इतना ही करो कि सीताजी को देखकर लौट आओ और उनकी खबर कह दो। फिर कमलनयन श्रीरामजी अपने बाहुबल से [ ही राक्षसों का संहार कर सीताजी को ले आयेंगे, केवल ] खेल के लिये ही वे वानरों की सेना साथ लेंगे। 

Vanaron Ka Samudra Tat Par Aana / वानरों का समुद्र तट

Vanaron Ka Samudra Tat Par Aana

Vanaron Ka Samudra Tat Par Aana, Sampati Se Bhent Aur Batchit, वानरों का समुद्र तट पर आना, सम्पाती से भेंट और बातचीत, श्रीरामचरितमानस किष्किन्धाकाण्ड – अंगद ने मन में विचारकर कहा – अहा ! जटायु के समान धन्य कोई नहीं है। श्रीरामजी के कार्य के लिये शरीर छोड़कर वह परम बड़भागी भगवान् के परमधाम को चला गया। हर्ष और शोक से युक्त वाणी ( समाचार ) सुनकर वह पक्षी ( सम्पाती ) वानरों के पास आया। वानर डर गये।

Gufa Mein Tapaswini Ke Darshan / गुफा में तपस्विनी के दर्शन

Gufa Mein Tapaswini Ke Darshan

Gufa Mein Tapaswini Ke Darshan, गुफा में तपस्विनी के दर्शन, श्रीरामचरितमानस किष्किन्धाकाण्ड – तुमलोग आँखें मूँद लो और गुफा को छोड़कर बाहर जाओ। तुम सीताजी को पा जाओगे, पछताओं नहीं ( निराश न होओ )। आँखें मूँदकर फिर जब आँखें खोलीं तो सब वीर क्या देखते हैं कि सब समुद्र के तीर पर खड़े हैं। और स्वयं वहाँ गयी जहाँ श्रीरघुनाथजी थे। उसने जाकर प्रभु के चरणकमलों में मस्तक नवाया और बहुत प्रकार से विनती की। प्रभु ने उसे अपनी अनपायिनी ( अचल ) भक्ति दी।

Sugriv Ram Samwad Aur Sitaji Ki Khoj / सुग्रीव राम संवाद

Sugriv Ram Samwad Aur Sitaji Ki Khoj Ke Liye Bandaron Ka Prasthan

Sugriv Ram Samwad Aur Sitaji Ki Khoj Ke Liye Bandaron Ka Prasthan, सुग्रीव राम संवाद और सीताजी की खोज के लिये बंदरों का प्रस्थान, श्रीरामचरितमानस किष्किन्धाकाण्ड – हे स्वामी ! देवता, मनुष्य और मुनि सभी विषयों के वश में है। फिर मैं तो पामर पशु और पशुओं में भी अत्यन्त कामी बंदर हूँ। स्त्री का नयन-बाण जिसको नहीं लगा, जो भयङ्कर क्रोधरूपी अँधेरी रात में भी जागता रहता है ( क्रोधान्ध नहीं होता )। और लोभ की फाँसी से जिसने अपना गला नहीं बँधाया, हे रघुनाथजी ! वह मनुष्य आपही के समान है।

Shri Ram Ki Sugriv Par Naraji / श्री राम की सुग्रीव पर नाराजी

Shri Ram Ki Sugriv Par Naraji

Shri Ram Ki Sugriv Par Naraji, Lakshman Ji Ka Kop, श्री राम की सुग्रीव पर नाराजी, लक्ष्मण जी का कोप, श्रीरामचरितमानस किष्किन्धाकाण्ड – हनुमान् जी के वचन सुनकर सुग्रीव ने बहुत ही भय माना। [ और कहा – ] विषयों ने मेरे ज्ञान को हर लिया। अब हे पवनसुत ! जहाँ-तहाँ वानरों के यूथ रहते हैं ; वहाँ दूतों के समूह को भेजो। अंगद ने उनके चरणों में सिर नवाकर विनती की ( क्षमा याचना की )।

Sharad Ritu Varnan / शरद् ऋतु वर्णन

Sharad Ritu Varnan

Sharad Ritu Varnan, शरद् ऋतु वर्णन, श्रीरामचरितमानस किष्किन्धाकाण्ड – नदी और तालाबों का जल धीरे-धीरे सूख रहा है। जैसे ज्ञानी ( विवेकी ) पुरुष ममता का त्याग करते हैं। शरद्-ऋतु जानकर खंजन पक्षी आ गये। जैसे समय पाकर सुन्दर सुकृत आ जाते हैं ( पुण्य प्रकट हो जाते हैं )। न कीचड़ है, न धूल ; इससे धरती [ निर्मल होकर ] ऐसी शोभा दे रही है जैसे नीतिनिपुण राजा की करनी ! जल के कम हो जाने से मछलियाँ व्याकुल हो रही हैं, जैसे मूर्ख ( विवेकशून्य ) कुटुम्बी ( गृहस्थ ) धन के बिना व्याकुल होता है।

Varsha Ritu Varnan / वर्षा ऋतु वर्णन

Varsha Ritu Varnan

Varsha Ritu Varnan, वर्षा ऋतु वर्णन, श्रीरामचरितमानस किष्किन्धाकाण्ड – अन्न से युक्त ( लहलहाती हुई खेती से हरी-भरी ) पृथ्वी कैसी शोभित हो रही है, जैसी उपकारी पुरुष की सम्पत्ति। रात के घने अन्धकार में जुगनू शोभा पा रही है, मानो दम्भियों का समाज आ जुटा हो। भारी वर्षा से खेतों की क्यारियाँ फूट चली हैं, जैसे स्वतन्त्र होने से स्त्रियाँ बिगड़ जाती हैं। चतुर किसान खेतों को निरा रहे हैं ( उनमें घास आदि को निकालकर फेंक रहे हैं )। जैसे विद्वान् लोग मोह, मद और मन का त्याग कर देते हैं। 

Tara Ka Vilap, Tara Ko Shri Ramji Dwara Updesh / तारा का

Tara Ka Vilap, Tara Ko Shri Ramji Dwara Updesh

Tara Ka Vilap, Tara Ko Shri Ramji Dwara Updesh Aur Sugriv Ka Rahyabhishek Tatha Angad Ko Yuvrajpad, तारा का विलाप, तारा को श्री रामजी द्वारा उपदेश और सुग्रीव का राज्याभिषेक तथा अङ्गद को युवराजपद, श्रीरामचरितमानस किष्किन्धाकाण्ड – श्रीरामचन्द्रजी ने बालि को अपने परम धाम भेज दिया। नगर के सब लोग व्याकुल होकर दौड़े। बालि की स्त्री तारा अनेकों प्रकार से विलाप करने लगी। उसके बाल बिखरे हुए हैं और देह की सँभाल नहीं है। 

Bali Sugriv Yuddh Bali Uddhar / बालि सुग्रीव युद्ध

Bali Sugriv Yuddh

Bali Sugriv Yuddh, Bali Uddhar, बालि सुग्रीव युद्ध, बालि उद्धार, श्रीरामचरितमानस किष्किन्धाकाण्ड – श्रुतियाँ ‘ नेति-नेति ‘ कहकर निरन्तर जिनका गुणगान करती रहती हैं, तथा प्राण और मन को जीतकर एवं इन्द्रियों को [ विषयों के रस से सर्वथा ] नीरस बनाकर मुनिगण ध्यान में जिनकी कभी क्वचित् ही झलक पाते हैं, वे ही प्रभु ( आप ) साक्षात् मेरे सामने प्रकट हैं। आपने मुझे अत्यन्त अभिमानवश जानकर यह कहा कि तुम शरीर रख लो।

Sugriv Ka Vairagya / सुग्रीव का वैराग्य

Sugriv Ka Vairagya

Sugriv Ka Vairagya, सुग्रीव का वैराग्य, श्रीरामचरितमानस किष्किन्धाकाण्ड – श्रीरामजी का अपरिमित बल देखकर सुग्रीव की प्रीति बढ़ गयी और उन्हें विश्वास हो गया कि ये बालिका वध अवश्य करेंगे। वे बार-बार चरणों में सिर नवाने लगे। प्रभु को पहचानकर सुग्रीव मन में हर्षित हो रहे थे। जब ज्ञान उत्पन्न हुए तब वे वचन बोले कि हे नाथ ! आपकी कृपा से अब मेरा मन स्थिर हो गया। सुख, सम्पत्ति, परिवार और बड़ाई ( बड़प्पन ) सबको त्यागकर मैं आपकी सेवा ही करूँगा।

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