Santon Ke Lakshan / संतों के लक्षण

Santon Ke Lakshan Aur Satsang Bhajan Ke Liye Prerna

Santon Ke Lakshan Aur Satsang Bhajan Ke Liye Prerna, संतों के लक्षण और सत्संग भजन के लिये प्रेरणा, श्रीरामचरितमानस अरण्यकाण्ड – सदा मेरी लीलाओं को गाते-सुनते हैं और बिना ही कारण दूसरों के हित में लगे रहने वाले होते हैं। हे मुनि ! सुनो, संतों के जितने गुण हैं, उनको सरस्वतीजी और वेद भी नहीं कह सकते। शेष और शारदा भी नहीं कह सकते ‘ यह सुनते ही नारदजी ने श्रीरामजी के चरणकमल पकड़ लिये। दीनबन्धु कृपालु प्रभु ने इस प्रकार अपने श्रीमुख से अपने भक्तों के गुण कहे।

Narad Ram Samwad / नारद राम संवाद

Narad Ram Samwad

Narad Ram Samwad, नारद राम संवाद, श्रीरामचरितमानस अरण्यकाण्ड – मेरे सेवक को केवल मेरा ही बल रहता है और उसे ( ज्ञानी को ) अपना बल होता है। पर काम-क्रोध रूपी शत्रु दोनों के लिये हैं। [ भक्त के शत्रुओं को मारने की जिम्मेवारी मुझ पर रहती है, क्योंकि वह मेरे परायण होकर मेरा ही बल मानता है ; परन्तु अपने बल को माननेवाले ज्ञानी के शत्रुओं का नाश करने की जिम्मेवारी मुझ पर नहीं है। ] ऐसा विचारकर पण्डितजन ( बुद्धिमान् लोग ) मुझको ही भजते हैं। वे ज्ञान प्राप्त होने पर भी भक्ति नहीं छोड़ते।

Shabri Par Kripa, Navdha Bhakti Updesh / शबरी पर कृपा

Shabri Par Kripa, Navdha Bhakti Updesh

Shabri Par Kripa, Navdha Bhakti Updesh, शबरी पर कृपा, नवधा भक्ति उपदेश, श्रीरामचरितमानस अरण्यकाण्ड- सब कथा कहकर भगवान् के मुख के दर्शन कर, हृदय में उनके चरणकमलों को धारण कर लिया और योगाग्नि से देह को त्यागकर ( जलाकर ) वह उस दुर्लभ हरिपद में लीन हो गयी, जहाँ से लौटना नहीं होता। तुलसीदास जी कहते हैं कि अनेकों प्रकार के कर्म, अधर्म और बहुत-से मत – ये सब शोकप्रद हैं ; हे मनुष्यों ! इनका त्याग कर दो और विश्वास करके श्रीरामजी के चरणों में प्रेम करो। 

Kabandh Uddhar / कबन्ध उद्धार

Kabandh Uddhar

Kabandh Uddhar, कबन्ध उद्धार, श्रीरामचरितमानस अरण्यकाण्ड – वह सघन वन लताओं और वृक्षों से भरा है। उसमें बहुत-से पक्षी, मृग, हाथी और सिंह रहते हैं। श्रीरामजी ने रास्ते में आते हुए कबंध राक्षस को मार डाला। उसने अपने शाप की सारी बात कही। [ वह बोला – ] दुर्वासाजी ने मुझे शाप दिया था। अब प्रभु के चरणों को देखने से वह पाप मिट गया। [ श्रीरामजी ने कहा – ] हे गन्धर्व ! सुनो, मैं तुम्हें कहता हूँ, ब्राह्मणकुल से द्रोह करने वाला मुझे नहीं सुहाता। 

Shri Ramji Ka Vilap Jatayu Ka Prasang /श्री रामजी का विलाप

Shri Ramji Ka Vilap

Shri Ramji Ka Vilap, Jatayu Ka Prasang, श्री रामजी का विलाप, जटायु का प्रसंग- हे रामजी ? आपकी जय हो ! आपका रूप अनुपम है, आप निर्गुण हैं, सगुण हैं और सत्य ही गुणों के ( माया के ) प्रेरक हैं। दस सिरवाले रावण की प्रचण्ड भुजाओं को खण्ड-खण्ड करने के लिये प्रचण्ड बाण धारण करनेवाले, पृथ्वी को सुशोभित करनेवाले, जलयुक्त मेघ के समान श्याम शरीरवाले, कमल के समान मुख और [ लाल ] कमल के समान विशाल नेत्रोंवाले, विशाल भुजाओं वाले और भव-भय से छुड़ाने वाले कृपालु श्रीरामजी को मैं नित्य नमस्कार करता हूँ। 

Sri Sita Haran Aur Sri Sita Vilap / श्री सीता हरण

Sri Sita Haran Aur Sri Sita Vilap

Sri Sita Haran Aur Sri Sita Vilap, श्री सीता हरण और श्री सीता विलाप, श्रीरामचरितमानस अरण्यकाण्ड – तब रावण ने अपना असली रूप दिखलाया और जब नाम सुनाया तब तो सीताजी भयभीत हो गयीं। उन्होंने गहरा धीरज धरकर कहा – ‘ अरे दुष्ट ! खड़ा तो रह, प्रभु आ गये। ‘ जैसे सिंह की स्त्री को तुच्छ खरगोश चाहे, वैसे ही अरे राक्षसराज ! तू [ मेरी चाह करके ] काल के वश हुआ है। ये वचन सुनते ही रावण को क्रोध आ गया, परन्तु मन में उसने सीताजी के चरणों की वन्दना करके सुख माना।

Jatayu Ravan Yuddh / जटायु रावण युद्ध

Jatayu Ravan Yuddh

Jatayu Ravan Yuddh, जटायु रावण युद्ध, श्रीरामचरितमानस अरण्यकाण्ड – [ उसने ललकार कहा – ] रे रे दुष्ट ! खड़ा क्यों नहीं होता ? निडर होकर चल दिया ! मुझे तूने नहीं जाना ? उसको यमराज के समान आता हुआ देखकर रावण घूमकर मन में अनुमान करने लगा। – यह या तो मैनाक पर्वत है या पक्षियों का स्वामी गरुड़ ! पर वह ( गरुड़ ) तो अपने स्वामी विष्णुसहित मेरे बल को जानता है ! [ कुछ पास आने पर ] रावण ने उसे पहचान लिया [ और बोला – ] यह तो बूढ़ा जटायु है ! यह मेरे हाथ रूपी तीर्थ में शरीर छोड़ेगा। 

Marich Prasang Aur Swarn Mrig Roop / मारीच प्रसंग

Marich Prasang Aur Swarn Mrig Rup Mein Marich Ka Mara Jana

Marich Prasang Aur Swarn Mrig Rup Mein Marich Ka Mara Jana, मारीच प्रसंग और स्वर्ण मृग रूप में मारीच का मारा जाना, श्रीरामचरितमानस अरण्यकाण्ड – वह मन-ही-मन सोचने लगा ] अपने परम प्रियतम को देखकर नेत्रों को सफल करके सुख पाऊँगा। जानकीजी सहित और छोटे भाई लक्ष्मणजी समेत कृपानिधान श्रीरामजी के चरणों में मन लगाऊँगा। जिनका क्रोध भी मोक्ष देनेवाला है और जिनकी भक्ति उन अवश ( किसी के वश में होनेवाले स्वतन्त्र भगवान् ) को भी वश में करने वाली है, अहा !

Shurpanakha Ka Ravan Ke Nikat Jana / शूर्पणखा का रावण के निकट जाना

Shurpanakha Ka Ravan Ke Nikat Jana

Shurpanakha Ka Ravan Ke Nikat Jana, Srisitaji Ka Agni Pravesh Aur Maya Sita, शूर्पणखा का रावण के निकट जाना, श्रीसीताजी का अग्नि प्रवेश और माया सीता, श्रीरामचरितमानस अरण्यकाण्ड – दोनों भाइयों का बल और प्रताप अतुलनीय है। वे दुष्टों के वध करने में लगे हैं और देवता तथा मुनियों को सुख देनेवाले हैं। वे शोभा के धाम हैं, ‘ राम ‘ ऐसा उनका नाम है। उनके साथ एक तरुणी सुन्दरी स्त्री है। विधाता ने उस स्त्री को ऐसी रूप की राशि बनाया है कि सौ करोड़ रति ( कामदेव की स्त्री ) उसपर निछावर हैं।

Shurpnakha Ki Katha / शूर्पणखा की कथा

Shurpnakha Ki Katha, Shurpnakha Ka Khar Dushan Ke Paas Jana

Shurpnakha Ki Katha, Shurpnakha Ka Khar Dushan Ke Paas Jana Aur Khar Dushan Aadi Ka Vadh, शूर्पणखा की कथा, शूर्पणखा का खर दूषण के पास जाना और खर दूषण आदि का वध, श्रीरामचरितमानस अरण्यकाण्ड – कठिन धनुष चढ़ाकर सिर पर जटा का जूड़ा बाँधते हुए प्रभु कैसे शोभित हो रहे हैं, जैसे मरकतमणि ( पन्ने ) के पर्वत पर करोड़ों बिजलियों से दो साँप लड़ रहे हों। कमर में तरकस कसकर, विशाल भुजाओं में धनुष लेकर और बाण सुधारकर प्रभु श्रीरामचन्द्रजी राक्षसों की ओर देख रहे हैं।

Panchwati Niwas / पंचवटी निवास

Panchwati Niwas Aur Shriram Lakshman Samwad

Panchwati Niwas Aur Shriram Lakshman Samwad, पंचवटी निवास और श्रीराम लक्ष्मण संवाद, श्रीरामचरितमानस अरण्यकाण्ड – जिसमें मान, दम्भ, हिंसा, क्षमाराहित्य, टेढ़ापन, आचार्यसेवका अभाव, अपवित्रता, अस्थिरता, मन का निगृहीत न होना, इन्द्रियों के विषय में आसक्ति, अहंकार, जन्म-मृत्यु-जरा-व्याधिमय जगत् में सुखबुद्धि, स्त्री-पुत्र-घर आदि में आसक्ति तथा ममता, इष्ट और अनिष्ट की प्राप्ति में हर्ष-शोक, भक्ति का अभाव, एकान्त में मन न लगना, विषयी मनुष्यों के संग में प्रेम – ये अठारह न हों।

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