Bharatji Ka Ayodhya Lautna / भरतजी का अयोध्या लौटना

Bharatji Ka Ayodhya Lautna, Bharatji Dwara Paduka Ki Sthapna

Bharatji Ka Ayodhya Lautna, Bharatji Dwara Paduka Ki Sthapna, Nandigram Mein Niwas Aur Sribharatji Ke Charitra-Shrawan Ki Mahima, भरतजी का अयोध्या लौटना, भरतजी द्वारा पादुका की स्थापना, नन्दिग्राम में निवास और श्रीभरतजी के चरित्र-श्रवण की महिमा :- श्रीसीतारामजी के प्रेमरूपी अमृत से परिपूर्ण भरतजी का जन्म यदि न होता, तो मुनियों के मन को भी अगम यम, नियम, शम, दम आदि कठिन व्रतों का आचरण कौन करता ? दुःख, सन्ताप, दरिद्रता, दम्भ आदि दोषों को अपने सुयश के बहाने कौन हरण करता ? तथा कलिकाल में तुलसीदास-जैसे शठों को हठपूर्वक कौन श्रीरामजी के सम्मुख करता ?

Bharatji Ko Paduka Pradan / भरतजी को पादुका प्रदान

Bharatji Ko Paduka Pradan

Shriram Bharat Samwad, Bharatji Ko Paduka Pradan, Bharatji Ki Vidai, श्रीराम भरत संवाद, भरतजी को पादुका प्रदान, भरतजी की विदाई, श्रीरामचरितमानस अयोध्याकाण्ड – श्रीरामचन्द्रजी ने गुरु वसिष्ठजी, राजा जनकजी, भरतजी और सारी सभा की ओर देखा, किन्तु फिर सकुचाकर दृष्टि फेरकर वे पृथ्वी की ओर ताकने लगे। सभा उनके शील की सराहना करके सोचती है कि श्रीरामचन्द्रजी के समान संकोची स्वामी कहीं नहीं हैं।

Bharatji Ka Tirth Jal Sthapan / भरतजी का तीर्थ जल स्थापन

Bharatji Ka Tirth Jal Sthapan Tatha Chitrkut Bhraman

Bharatji Ka Tirth Jal Sthapan Tatha Chitrkut Bhraman, भरतजी का तीर्थ जल स्थापन तथा चित्रकूट भ्रमण, श्रीरामचरितमानस अयोध्याकाण्ड – भरतजी ने अत्रिमुनि की आज्ञा पाकर जल के सब पात्र रवाना कर दिये और छोटे भाई शत्रुघ्न, अत्रिमुनि तथा अन्य साधु-संतों सहित आप वहाँ गये जहाँ वह अथाह कुआँ था। और उस पवित्र जल को उस पुण्यस्थल में रख दिया। तब अत्रि ऋषि ने प्रेम से आनन्दित होकर ऐसा कहा – हे तात ! यह अनादि सिद्धस्थल है। कालक्रम से यह लोप हो गया था इसलिये किसी को इसका पता नहीं था। 

Shriram Bharat Samwad / श्रीराम भरत संवाद

Shriram Bharat Samwad

Shriram Bharat Samwad, श्रीराम भरत संवाद, श्रीरामचरितमानस अयोध्याकाण्ड – ऐसे वचन बोले जो मानो वाणी के सर्वस्व ही थे, परिणाम में हितकारी थे और सुनने में चन्द्रमा के रस ( अमृत ) – सरीखे थे। [ उन्होंने कहा – ] हे तात भरत ! तुम धर्म की धुरी को धारण करने वाले हो, लोक और वेद दोनों के जानने वाले और प्रेम में प्रवीण हो। हे तात ! कर्म से, वचन से और मन से निर्मल तुम्हारे समान तुम्हीं हो। गुरूजनों के समाज में और ऐसे कुसमय में छोटे भाई के गुण किस तरह कहे जा सकते हैं ?

Janak Vasishth Aadi Samwad / जनक वसिष्ठ आदि संवाद

Janak Vasishth Aadi Samwad

Janak Vasishth Aadi Samwad, Indra Ki Chinta, Saraswati Ka Indra Ko Samjhana, जनक वसिष्ठ आदि संवाद, इन्द्र की चिन्ता, सरस्वती का इन्द्र को समझाना, श्रीरामचरितमानस अयोध्याकाण्ड – मुनि वसिष्ठजी के वचन सुनकर जनकजी प्रेम में मग्न हो गये। उनकी दशा देखकर ज्ञान और वैराग्य हो गया ( अर्थात् उनके ज्ञान-वैराग्य छूट-से गये )।वे प्रेम से शिथिल हो गये और मन में विचार करने लगे कि हम यहाँ आये, यह अच्छा नहीं किया। 

Janak Sunayna Samwad / जनक सुनयना संवाद

Janak Sunayna Samwad,

Janak Sunayna Samwad, Bharatji Ki Mahima, जनक सुनयना संवाद, भरतजी की महिमा, श्रीरामचरितमानस अयोध्याकाण्ड – श्रीरामचन्द्रजी के प्रति अनन्य प्रेम को छोड़कर ] भरतजी ने समस्त परमार्थ, स्वार्थ और सुखों की ओर स्वप्न में भी मन से भी नहीं ताका है। श्रीरामजी के चरणों का प्रेम ही उनका साधन है और वही सिद्धि है। मुझे तो भरतजी का बस, यही एकमात्र सिद्धान्त जान पड़ता है। श्रीरामजी और भरतजी के गुणों की प्रेमपूर्वक गणना करते ( कहते-सुनते ) पति-पत्नी को रात पलक के समान बीत गयी।

Kausalya Sunayna Samwad / कौसल्या सुनयना संवाद

Kausalya Sunayna Samwad, Srisitaji Ka Shil

Kausalya Sunayna Samwad, Srisitaji Ka Shil, कौसल्या सुनयना संवाद, श्रीसीताजी का शील, श्रीरामचरितमानस अयोध्याकाण्ड – जानकीजी अपने प्यारे कुटुम्बियों से – जो जिस योग्य था, उससे उसी प्रकार मिलीं। जानकीजी को तपस्विनी के वेष में देखकर सभी शोक से अत्यन्त व्याकुल हो गये। जनकजी श्रीरामजी के गुरु वसिष्ठजी की आज्ञा पाकर डेरे को चले और आकर उन्होंने सीताजी को देखा। जनकजी ने अपने पवित्र प्रेम और प्राणों की पाहुनी जानकीजी को हृदय से लगा लिया।

Janakji Ka Pahunchna / जनकजी का पहुँचना

Janakji Ka Pahunchna, Kol-Kirtadi Ki Bhent

Janakji Ka Pahunchna, Kol-Kirtadi Ki Bhent, Sabka Paraspar Milna, जनकजी का पहुँचना, कोल-कीरतादि की भेंट, सबका परस्पर मिलना, श्रीरामचरितमानस अयोध्याकाण्ड – वन की मनोहरता वर्णन नहीं की जा सकती, मानो पृथ्वी जनकजी की पहुनाई कर रही है। तब जनकपुरवासी सब लोग नहा-नहाकर श्रीरामचन्द्रजी, जनकजी और मुनि की आज्ञा पाकर, सुन्दर वृक्षों को देख-देखकर प्रेम में भरकर जहाँ-तहाँ उतरने लगे। पवित्र, सुन्दर और अमृत के समान [ स्वादिष्ट ] अनेकों प्रकार के पत्ते, फल, मूल और कन्द। –

Shriram Bharat Aadi Ka Samwad / श्रीराम भरत आदि का संवाद

Shriram Bharat Aadi Ka Samwad

Shriram Bharat Aadi Ka Samwad, श्रीराम भरत आदि का संवाद, श्रीरामचरितमानस अयोध्याकाण्ड – इस तरह वह दिन भी बीत गया। दूसरे दिन प्रातःकाल सब कोई स्नान करने लगे। स्नान करके सब नर-नारी गणेशजी, गौरीजी, महादेवजी और सूर्यभगवान् की पूजा करते हैं। फिर लक्ष्मीपति भगवान् विष्णु के चरणों की वन्दना करके, दोनों हाथ जोड़कर, आँचल पसारकर विनती करते हैं कि श्रीरामजी राजा हों, जानकीजी रानी हों तथा राजधानी अयोध्या आनन्द की सीमा होकर। – 

Sri Vasishthji Ka Bhashan / श्री वसिष्ठजी का भाषण

Sri Vasishthji Ka Bhashan

Sri Vasishthji Ka Bhashan, श्री वसिष्ठजी का भाषण, श्रीरामचरितमानस अयोध्याकाण्ड – श्रेष्ठ मुनि वसिष्ठजी समयोचित वचन बोले – हे सभासदो ! हे सुजान भरत ! सुनो। सूर्यकुल के सूर्य महाराज श्रीरामचन्द्रजी धर्मधुरन्धर और स्वतन्त्र भगवान् हैं। वे सत्यप्रतिज्ञ हैं और वेद की मर्यादा के रक्षक हैं। श्रीरामजी का अवतार ही जगत् के कल्याण के लिये हुआ है। वे गुरु, पिता और माता के वचनों के अनुसार चलनेवाले हैं। दुष्टों के दल का नाश करनेवाले और देवताओं के हितकारी हैं। 

Bharatji Ki Mandali Ka Satkar / भरतजी की मण्डली का सत्कार

Vanvasiyon Dwara Bharatji Ki Mandali Ka Satkar, Kaikeyi Ka Paschatap

Vanvasiyon Dwara Bharatji Ki Mandali Ka Satkar, Kaikeyi Ka Paschatap, वनवासियों द्वारा भरतजी की मण्डली का सत्कार, कैकेयी का पश्चाताप, श्रीरामचरितमानस अयोध्याकाण्ड- जबसे प्रभु के चरणकमल देखे, तब से हमारे दुःसह दुःख और दोष मिट गये। वनवासियों के वचन सुनकर अयोध्या के लोग प्रेम में भर गये और उनके भाग्य की सराहना करने लगे। सब उनके भाग्य की सराहना करने लगे और प्रेम के वचन सुनाने लगे। उन लोगों के बोलने और मिलने का ढंग तथा श्रीसीतारामजी के चरणों में उनका प्रेम देखकर सब सुख पा रहे हैं। उन कोल-भीलों की वाणी सुनकर सभी नर-नारी अपने प्रेम का निरादर करते हैं ( उसे धिक्कार देते हैं )। तुलसीदासजी कहते हैं कि यह रघुवंशमणि श्रीरामचन्द्रजी की कृपा है कि लोहा नौका को अपने ऊपर लेकर तैर गया। 

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