Shri Lakshmanji Ka Krodh / श्री लक्ष्मणजी का क्रोध

Shri Lakshmanji Ka Krodh,

Shri Lakshmanji Ka Krodh, श्री लक्ष्मणजी का क्रोध, श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड – हे सखी ! ये जो हमारे हितू कहलाते हैं, वे भी सब तमाशा देखेने वाले हैं। कोई भी [ इनके ] गुरु विशामित्रजी को समझाकर नहीं कहता कि ये ( रामजी ) बालक हैं, इनके लिये ऐसा हठ अच्छा नहीं। [ जो धनुष रावण और बाण-जैसे जगद्विजयी वीरों के हिलाये न हिल सका, उसे तोड़ने के लिये मुनि विश्वामित्रजी का रामजी को आज्ञा देना और रामजी का उसे तोड़ने के लिये चल देना रानी का हठ जान पड़ा।

Janakji Ki Nirashajanak Vani / जनकजी की निराशाजनक वाणी

Janakji Ki Nirashajanak Vani

Rajaon Se Dhanush Na Uthna, Janakji Ki Nirashajanak Vani, राजाओं से धनुष न उठना, जनकजी की निराशाजनक वाणी, श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड – राजालोग हृदय से हारकर श्रीहीन ( हतप्रभ ) हो गये और अपने-अपने समाज में जा बैठे। राजाओं को ( असफल ) देखकर जनक अकुला उठे और ऐसे वचन बोले जो मानो क्रोध में सने हुए थे। यदि प्रण छोड़ता हूँ तो पुण्य जाता है ; इसलिये क्या करूँ, कन्या कुँआरी ही रहे। यदि मैं जानता कि पृथ्वी वीरों से शून्य है, तो प्रण करके उपहास का पात्र न बनता।

Janak Pratigya Ki Ghoshna / जनक प्रतिज्ञा की घोषणा

Bandijanon Dwara Janak Pratigya Ki Ghoshna,

Bandi janon Dwara Janak Pratigya Ki Ghoshna, बन्दी जनों द्वारा जनक प्रतिज्ञा की घोषणा, श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड – श्रीरामचन्द्रजी का रूप और सीताजी की छबि देखकर स्त्री-पुरुषों ने पलक मारना छोड़ दिया ( सब एकटक उन्हीं को देखने लगे )। सभी अपने मन में सोचते हैं, पर कहते सकुचाते हैं। मन-ही-मन विधाता से विनय करते हैं। — उसी शिवजी के कठोर धनुष को आज इस राजसभा में जो भी तोड़ेगा, तीनों लोकों की विजय के साथ ही उसको जानकीजी बिना किसी विचार के हठपूर्वक वरण करेंगी।

Shri Sitaji ka Yagyashala Mein Pravesh / श्री सीताजी का यज्ञ

Shri Sitaji ka Yagyashala Mein Pravesh

Shri Sitaji ka Yagyashala Mein Pravesh, श्री सीताजी का यज्ञशाला में प्रवेश, श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड- रूप और गुणों की खान जगज्जननी जानकीजी की शोभा का वर्णन नहीं हो सकता। उसके लिये मुझे [ काव्य की ] सब उपमाएँ तुच्छ लगती हैं ; क्योंकि वे लौकिक स्त्रियों के अंगों से अनुराग रखने वाली हैं ( अर्थात् वे जगत् की स्त्रियों के अंगों को दी जाती हैं)। [ काव्य की उपमाएँ सब त्रिगुणात्मक, मायिक जगत् से ली गयी हैं।

Vishvamitr Ka Yagyashala Mein Pravesh /विश्वामित्र का यज्ञ

Shriram Lakshman Sahit Vishvamitr Ka Yagyashala Mein Pravesh

Shriram Lakshman Sahit Vishvamitr Ka Yagyashala Mein Pravesh, श्रीराम लक्ष्मण सहित विश्वामित्र का यज्ञशाला में प्रवेश, श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड – पृथ्वी की स्त्रियों की तो बात ही क्या, देवताओं की स्त्रियों को भी यदि देखा जाय तो हमारी अपेक्षा कहीं अधिक दिव्य और सुन्दर हैं, तो उनमें ] सरस्वती तो बहुत बोलने वाली हैं ; पार्वती अर्द्धांगिनी हैं ( अर्थात् अर्द्धनारी नटेश्वर के रूप में उनका आधा ही अंग स्त्री का है, शेष आधा अंग पुरुष – शिवजी का है)।

Sriramcharit Sunne Gaane Ki Mahima /श्रीरामचरित सुनने गाने

Sriramcharit Sunne Gaane Ki Mahima

Sriramcharit Sunne Gaane Ki Mahima, श्रीरामचरित सुनने गाने की महिमा, श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड – अपनी वाणी को पवित्र करने के लिये तुलसीजी ने राम का यश कहा है। [ नहीं तो ] श्रीरघुनाथजी का चरित्र अपार समुद्र है, किस कवि ने उसका पार पाया है ? जो लोग यज्ञोपवीत और विवाह के मङ्गलमय उत्सव का वर्णन आदर के साथ सुनकर गावेंगे, वे लोग श्रीजानकीजी और श्रीरामचन्द्रजी की कृपा से सदा सुख पावेंगे।

Shri Sitaji Ka Parwati Pujan / श्री सीताजी का पार्वती पूजन

Shri Sitaji Ka Parwati Pujan

Shri Sitaji Ka Parwati Pujan Evam Vardan Prapti Tatha Ram Lakshman Samwad, श्री सीताजी का पार्वती पूजन एवं वरदान प्राप्ति तथा राम लक्ष्मण संवाद, श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड – शिवजी के धनुष को कठोर जानकर वे विसूरती ( मन में विलाप करती ) हुई हृदय में श्रीरामजी की साँवली मूर्ति को रखकर चलीं। ( शिवजी के धनुष की कठोरता का स्मरण आने से उन्हें चिन्ता होती थी कि ये सुकुमार रघुनाथ जी उसे कैसे तोड़ेंगे, पिता के प्रण की स्मृति से उनके हृदय में क्षोभ था ही, इसलिये मन में विलाप करने लगीं।

Barat Ka Ayodhya Lautna / बारात का अयोध्या लौटना

Barat Ka Ayodhya Lautna

Barat Ka Ayodhya Lautna Aur Ayodhya Mein Anand, बारात का अयोध्या लौटना और अयोध्या में आनंद, श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड – नित्य ही मङ्गल, आनन्द और उत्सव होते हैं ; इस तरह आनन्द में दिन बीतते जाते हैं। अयोध्या आनन्द से भरकर उमड़ पड़ी, आनन्द की अधिकता अधिक-अधिक बढ़ती ही जा रही है। ब्राह्मण विश्वामित्रजी ने बहुत प्रकार से आशीर्वाद दिये और वे चल पड़े, प्रीति की रीति कही नहीं जाती। सब भाइयों के साथ लेकर श्रीरामजी प्रेम के साथ उन्हें पहुँचाकर और आज्ञा पाकर लौटे।

Shrisita Ram Vivah / श्रीसीता राम विवाह

Shrisita Ram Vivah

Shrisita Ram Vivah, श्रीसीता राम विवाह, श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड – सुन्दर मङ्गल का साज-सजकर [ रनिवास की ] स्त्रियाँ और सखियाँ आदरसहित सीताजी को लिवा चलीं। सभी सुन्दरियाँ सोलहों शृंगार किये हुए मतवाले हाथियों की चाल से चलने वाली हैं। उनके मनोहर गान को सुनकर मुनि ध्यान छोड़ देते हैं और कामदेव की कोयलें भी लजा जाती हैं। पायजेब, पैंजनी और सुन्दर कंकण ताल की गति पर बड़े सुन्दर बज रहे हैं।

Shrisita Ramji Ka Paraspar Darshan / श्रीसीता रामजी का परस्पर दर्शन

Shrisita Ramji Ka Paraspar Darshan

Pushpvatika Nirikshan, Sitaji Ka Pratham Darshan, Shrisita Ramji Ka Paraspar Darshan, पुष्पवाटिका निरीक्षण, सीताजी का प्रथम दर्शन, श्रीसीता रामजी का परस्पर दर्शन, श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड – ऐसा कहकर श्रीरामजी ने फिर कर उस ओर देखा। श्रीसीताजी के मुखरूपी चन्द्रमा [ को निहारने ] के लिये उनके नेत्र चकोर बन गये। सुन्दर नेत्र स्थिर हो गये ( टकटकी लग गयी)। मानो निमि ( जनकजी के पूर्वज ) ने [ जिनका सबकी पलकों में निवास माना गया है, लड़की-दामाद के मिलन-प्रसङ्ग को देखना उचित नहीं, इस भाव से ] सकुचाकर पलकें छोड़ दीं, ( पलकों में रहना छोड़ दिया, जिससे पलकों का गिरना रुक गया)।

Barat Ka Janakpur Mein Aana / बारात का जनकपुर में आना

Barat Ka Janakpur Mein Aana Aur Swagat Aadi

Barat Ka Janakpur Mein Aana Aur Swagat Aadi, बारात का जनकपुर में आना और स्वागत आदि, श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड – सूर्यवंश के पताका स्वरुप दशरथजी को आते हुए जानकर जनकजी नदियों पर पुल बँधवा दिये। बीच-बीच में ठहरने के लिये सुन्दर घर ( पड़ाव ) बनवा दिये, जिनमें देवलोक के समान सम्पदा छायी है। उत्तम फल तथा और भी अनेकों सुन्दर वस्तुएँ राजा ने हर्षित होकर भेंट के लिये भेजीं। गहने, कपड़े, नाना प्रकार की मूल्यवान् मणियाँ ( रत्न ), पक्षी, पशु, घोड़े, हाथी और बहुत तरह की सवारियाँ।

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