Safla Ekadashi Vrat Katha / सफला एकादशी व्रत कथा और पूजा

Safla Ekadashi Vrat Katha Aur Puja Vidhi
सफला एकादशी व्रत कथा और पूजा विधि


Safla Ekadashi Vrat Katha Aur Puja Vidhi, सफला एकादशी व्रत कथा और पूजा विधि :- पौष कृष्ण पक्ष एकादशी को सफला एकादशी का व्रत रखा जाता है। इस दिन भगवान् अच्युत की पूजा का विशेष विधि-विधान है।

सफला एकादशी पूजा विधि :-

इस व्रत को धारण करने वाले को चाहिये कि प्रातः स्नान करके भगवान् की आरती करें तथा भोग लगावें।

ब्राह्मणों तथा गरीबों को भोजन अथवा दान देना चाहिये। रात्रि में जागरण करते हुए कीर्तन पाठ करना अत्यन्त फलदायी होता है। इस व्रत को करने से समस्त कार्यों में अवश्य ही सफलता मिलती है। इसीलिए इसका नाम ‘ सफल ‘ एकादशी है।

सफला एकादशी व्रत कथा :-

प्राचीन कथा के अनुसार चम्पावती नगरी में महिष्मत नाम के राजा के पांच पुत्र थे। बड़ा पुत्र चरित्रहीन था और देवताओं की निन्दा करता था। मांसभक्षण और अन्य बुराइयों ने भी उसमें प्रवेश कर लिया था, जिससे राजा और उसके भाइयों ने उसका नाम लुभ्भक रख राज्य से बाहर निकाल दिया। फिर उसने अपने ही नगर को लूट लिया। एक दिन उसे चोरी करते सिपाहियों ने पकड़ा, पर राजा का पुत्र जानकर छोड़ दिया। फिर वह वन में पीपल के पेड़ के नीचे रहने लगा। पौष की कृष्ण पक्ष दशमी के दिन वह सर्दी के कारण प्राणहीन सा हो गया। अगले दिन उसे चेतना प्राप्त हुई। तब वह वन से फल लेकर लौटा और उसने पीपल के पेड़ की जड़ में सभी फलों को रखते हुए कहा, ‘ इन फलों से लक्ष्मीपति भगवान् विष्णु प्रसन्न हों। तब उसे सफला एकादशी के फल के प्रभाव से राज्य और पुत्र का वरदान मिला। इससे लुभ्भक का मन अच्छे की ओर प्रवृत्त हुआ और तब उसके पिता ने उसे राज्य प्रदान किया। उसे मनोज्ञ नामक पुत्र हुआ, जिसे बाद में राज्यसत्ता सौंप कर लुभ्भक खुद विष्णु भजन में लग कर मोक्ष प्राप्त करने में सफल रहा।

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