Samudra Langhne Ka Paramarsh / समुद्र लाँघने का परामर्श

श्रीरामचरितमानस किष्किन्धाकाण्ड

Samudra Langhne Ka Paramarsh, Jambwant Ka Hanuman Ji Ko Bal Yaad Dilakar Utsahit Karna
समुद्र लाँघने का परामर्श, जाम्बवंत का हनुमान् जी को बल याद दिलाकर उत्साहित करना

Samudra Langhne Ka Paramarsh, Jambwant Ka Hanuman Ji Ko Bal Yaad Dilakar Utsahit Karna, समुद्र लाँघने का परामर्श, जाम्बवंत का हनुमान जी को बल याद दिलाकर उत्साहित करना :- ऋक्षराज जाम्बवान् जी ने श्रीहनुमान् जी से कहा – हे हनुमान् ! हे बलवान् ! सुनो, तुमने यह क्या चुप साध रखी है ? तुम पवन के पुत्र हो और बल में पवन के समान हो। तुम बुद्धि-विवेक और विज्ञान की खान हो। श्रीरघुवीर का यश भव ( जन्म-मरण ) रूपी रोग की [ अचूक ] दवा है। जो पुरुष और स्त्री इसे सुनेंगे, त्रिशिरा के शत्रु श्रीरामजी उनके सब मनोरथों को सिद्ध करेंगे।  

 अनुज क्रिया करि सागर तीरा। कहि निज कथा सुनहु कपि बीरा ।।
हम द्वौ बंधु प्रथम तरुनाई। गगन गए रबि निकट उड़ाई ।।

अर्थात् :- समुद्र के तीर पर छोटे भाई जटायु की क्रिया ( श्राद्ध आदि ) करके सम्पाती अपनी कथा कहने लगा – हे वीर वानरों ! सुनो, हम दोनों भाई उठती जवानी में एक बार आकाश में उड़कर सूर्य के निकट चले गये। 

तेज न सहि सोक सो फिरि आवा। मैं अभिमानी रबि निअरावा ।।
जरे पंख अति तेज अपारा। परेउँ भूमि करि घोर चिकारा ।।

अर्थात् :- वह ( जटायु ) तेज नहीं सह सका, इससे लौट आया। ( किन्तु ) मैं अभिमानी था इसलिये सूर्य के पास चला गया। अत्यन्त अपार तेज से मेरे पंख जल गये। मैं बड़े जोर से चीख मारकर जमीन पर गिर पड़ा।  

मुनि एक नाम चंद्रमा ओही। लागी दया देखि करि मोही ।।
बहु प्रकार तेहिं ग्यान सुनावा। देहजनित अभिमान छड़ावा ।।

अर्थात् :- वहाँ चन्द्रमा नाम के एक मुनि थे। मुझे देखकर उन्हें बड़ी दया लगी। उन्होंने बहुत प्रकार से मुझे ज्ञान सुनाया और मेरे देहजनित ( देहसम्बन्धी ) अभिमान को छुड़ा दिया।  

त्रेताँ ब्रह्म मनुज तनु धरिही। तासु नारि निसिचर पति हरिही ।।
तासु खोज पठइहि प्रभु दूता। तिन्हहि मिलें तैं होब पुनीता ।।

अर्थात् :- [ उन्होंने कहा – ] त्रेतायुग में साक्षात् परब्रह्म मनुष्य शरीर धारण करेंगे। उनकी स्त्री को राक्षसों का राजा हर ले जायगा। उसकी खोज में प्रभु दूत भेजेंगे। उनसे मिलने पर तू पवित्र हो जायगा। 

जमिहहिं पंख करसि जनि चिंता। तिन्हहि देखाइ देहेसु तैं सीता ।।
मुनि कइ गिरा सत्य भइ आजू। सुनि मम बचन करहु प्रभु काजू ।।

अर्थात् :- और तेरे पंख उग आयेंगे ; चिन्ता न कर। उन्हें तू सीताजी  को दिखा देना। मुनि की वह वाणी आज सत्य हुई। अब मेरे वचन सुनकर तुम प्रभु का कार्य करो। 

गिरि त्रिकूट ऊपर बस लंका। तहँ रह रावन सहज असंका ।।
तहँ असोक उपबन जहँ रहई। सीता बैठि सोच रत अहई ।।

अर्थात् :- त्रिकूट पर्वत पर लङ्का बसी हुई है। वहाँ स्वभाव ही से निडर रावण रहता है। वहाँ अशोक नाम का उपवन ( बगीचा ) है, जहाँ सीताजी रहती हैं। [ इस समय भी ] वे सोच में मग्न बैठी हैं। 

दो० — मैं देखउँ तुम्ह नाहीं गीधहि दृष्टि अपार ।
बूढ़ भयउँ न त करतेउँ कछुक सहाय सहाय तुम्हार ।। 28 ।।

अर्थात् :- मैं उन्हें देख रहा हूँ, तुम नहीं देख सकते ; क्योंकि गीध की दृष्टि अपार होती है ( बहुत दूर तक जाती है )। क्या करूँ ? मैं बूढ़ा हो गया, नहीं तो तुम्हारी कुछ तो सहायता अवश्य करता।  

जो नाघइ सत जोजन सागर। करइ सो राम काज मति आगर ।।
मोहि बिलोकि धरहु मन धीरा। राम कृपाँ कस भयउ सरीरा ।।

अर्थात् :- जो सौ योजन ( चार सौ कोस ) समुद्र लाँघ सकेगा और बुद्धिनिधान होगा वही श्रीरामजी का कार्य कर सकेगा। [ निराश होकर घबराओ मत ] मुझे देखकर मन में धीरज धरो। देखो, श्रीरामजी की कृपा से [ देखते-ही-देखते ] मेरा शरीर कैसा हो गया ( बिना पाँख का बेहाल था, पाँख उगने से सुन्दर हो गया )। 

पापिउ जा कर नाम सुमिरहीं। अति अपार भवसागर तरहीं ।।
तासु दूत तुम्ह तजि कदराई। राम हृदयँ धरि करहु उपाई ।।

अर्थात् :- पापी भी जिनका नाम स्मरण करके अत्यन्त अपार भवसागर से तर जाते हैं, तुम उनके दूत हो, अतः कायरता छोड़कर श्रीरामजी को हृदय में धारण करके उपाय करो। 

अस कहि गरुड़ गीध जब गयऊ। तिन्ह कें मन अति बिसमय भयऊ ।।
निज निज बल सब काहूँ भाषा। पार जाइ कर संसय राखा ।।

अर्थात् :- [ काकभुशुण्डिजी कहते हैं – ] हे गरुड़जी ! इस प्रकार कह कर जब गीध चला गया, तब उन ( वानरों ) के मन में अत्यन्त विस्मय हुआ। सब किसी ने अपना-अपना बल कहा ! पर समुद्र के पार जाने में सभी ने सन्देह प्रकट किया। 

जरठ भयउँ अब कहइ रिछेसा। नहिं तन रहा प्रथम बल लेसा ।।
जबहिं त्रिबिक्रम भए खरारी। तब मैं तरुन रहेउँ बल भारी ।।

अर्थात् :- ऋक्षराज जाम्बवान् जी कहने लगे – मैं अब बूढ़ा हो गया। शरीर में पहले वाले बल का लेश भी नहीं रहा। जब खरारि ( खरके शत्रु श्रीराम ) वामन बने थे, तब मैं जवान था और मुझमें बड़ा बल था। 

दो० — बलि बाँधत प्रभु बाढ़ेउ सो तनु बरनि न जाइ ।
उभय घरी महँ दीन्हीं सात प्रदच्छिन धाइ ।। 29 ।।

अर्थात् :- बलि के बाँधते समय प्रभु इतने बढ़े कि उस शरीर का वर्णन नहीं हो सकता, किन्तु मैंने दो ही घड़ी में दौड़कर [ उस शरीर की ] सात प्रदक्षिणाएँ कर लीं। 

अंगद कहइ जाउँ मैं पारा। जियँ संसय कछु फिरती बारा ।।
जामवंत कह तुम्ह सब लायक। पठइअ किमि सबही कर नायक ।।

अर्थात् :- अंगद ने कहा – मैं पार तो चला जाऊँगा। परन्तु लौटते समय के लिये हृदय में कुछ सन्देह है। जाम्बवान् जी ने कहा – तुम प्रकार से योग्य हो। परन्तु तुम सबके नेता हो, तुम्हें कैसे भेजा जाय ? 

कहइ रीछपति सुनु हनुमाना। का चुप साधि रहेहु बलवाना ।।
पवन तनय बल पवन समाना। बुधि बिबेक बिग्यान निधाना ।।

अर्थात् :- ऋक्षराज जाम्बवान् जी ने श्रीहनुमान् जी से कहा – हे हनुमान् ! हे बलवान् ! सुनो, तुमने यह क्या चुप साध रखी है ? तुम पवन के पुत्र हो और बल में पवन के समान हो। तुम बुद्धि-विवेक और विज्ञान की खान हो।  

कवन सो काज कठिन जग माहीं। जो नहिं होइ तात तुम्ह पाहीं ।।
राम काज लगि तव अवतारा। सुनतहिं भयउ पर्बताकारा ।।

अर्थात् :- जगत् में कौन-सा ऐसा कठिन काम है जो हे तात ! तुमसे न हो सके। श्रीरामजी के कार्य के लिये ही तुम्हारा अवतार हुआ है। यह सुनते ही हनुमान् जी पर्वत की आकार से (  अत्यन्त विशालकाय ) हो गये। 

कनक बरन तन तेज बिराजा। मानहुँ अपर गिरिन्ह कर राजा ।।
सिंहनाद करि बारहिं बारा। लीलहिं नाघउँ जलनिधि खारा ।।

अर्थात् :- उनका सोने का-सा रंग है, शरीर पर तेज सुशोभित है, मानो दूसरा पर्वतों का राजा सुमेरु हो। हनुमान् जी ने बार-बार सिंहनाद करके कहा – मैं इस खारे समुद्र को खेल में ही लाँघ सकता हूँ। 

सहित सहाय रावनहि मारी। आनउँ इहाँ त्रिकूट उपारी ।।
जामवंत मैं पूँछउँ तोही। उचित सिखावनु दीजहु मोही ।।

अर्थात् :- और सहायकों सहित रावण को मारकर त्रिकूट पर्वत को उखाड़कर यहाँ ला सकता हूँ। हे जाम्बवान् ! मैं तुमसे पूछता हूँ, तुम मुझे उचित सीख देना [ कि मुझे क्या करना चाहिये ]। 

एतना करहु तात तुम्ह जाई। सीतहि देखि कहहु सुधि आई ।।
तब निज भुज बल राजिवनैना। कौतुक लागि संग कपि सेना ।।

अर्थात् :- [ जाम्बवान् जी ने कहा – ] हे तात ! तुम जाकर इतना ही करो कि सीताजी को देखकर लौट आओ और उनकी खबर कह दो। फिर कमलनयन श्रीरामजी अपने बाहुबल से [ ही राक्षसों का संहार कर सीताजी को ले आयेंगे, केवल ] खेल के लिये ही वे वानरों की सेना साथ लेंगे। 

छं० — कपि सेन संग सँघारि निसिचर रामु सीतहि आनिहैं ।
त्रैलोक पावन सुजसु सुर मुनि नारदादि बखानिहैं ।।
जो सुनत गावत कहत समुझत परम पद नर पावई ।
रघुबीर पद पाथोज मधुकर दास तुलसी गावई ।।

अर्थात् :- वानरों की सेना साथ लेकर राक्षसों का संहार करके श्रीरामजी सीताजी को ले आयेंगे। तब देवता और नारदादि मुनि भगवान् के तीनों लोकों को पवित्र करने वाले सुन्दर यश का बखान करेंगे, जिसे सुनने, गाने, कहने और समझने से मनुष्य परमपद पाते हैं और जिसे श्रीरघुवीर के चरणकमल का मधुकर ( भ्रमर ) तुलसीदास गाता है। 

दो० — भव भेषज रघुनाथ जसु सुनहिं जे नर अरु नारि ।
तिन्ह कर सकल मनोरथ सिद्ध करहिं त्रिसिरारि ।। 30 ( क ) ।।

अर्थात् :- श्रीरघुवीर का यश भव ( जन्म-मरण ) रूपी रोग की [ अचूक ] दवा है। जो पुरुष और स्त्री इसे सुनेंगे, त्रिशिरा के शत्रु श्रीरामजी उनके सब मनोरथों को सिद्ध करेंगे। 

सो० — नीलोत्पल तन स्याम काम कोटि सोभा अधिक ।
सुनिअ तासु गुन ग्राम जासु नाम अघ खग बधिक ।। 30 ( ख ) ।।

अर्थात् :- जिनका नीले कमल के समान श्याम शरीर है, जिनकी शोभा करोड़ों कामदेवों से भी अधिक है और जिनका नाम पापरूपी पक्षियों को मारने के लिये बधिक ( व्याधा ) के समान है, उन श्रीराम के गुणों के समूह ( लीला ) को अवश्य सुनना चाहिये। 

मासपारायण, तेईसवाँ विश्राम

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