Sanjay Dwara Dhritarashtra Ke Prati Vishwaroop / संजय

अध्याय ग्यारह विराट रूप

Sanjay Dwara Dhritarashtra Ke Prati Vishwaroop Ka Varnan
सञ्जय द्वारा धृतराष्ट्र के प्रति विश्वरूप का वर्णन

Sanjay Dwara Dhritarashtra Ke Prati Vishwaroop Ka Varnan, संजय द्वारा धृतराष्ट्र के प्रति विश्वरूप का वर्णन- संजय ने कहा — हे राजा ! इस प्रकार कहकर महायोगेश्वर भगवान् ने अर्जुन को अपना विश्वरूप दिखलाया। अर्जुन ने उस विश्वरूप में असंख्य मुख, असंख्य नेत्र तथा असंख्य आश्चर्यमय दृश्य देखे। यह रूप अनेक दैवी आभूषणों से अलंकृत था और अनेक दैवी हथियार उठाये हुए था। यह दैवी मालाएँ तथा वस्त्र धारण किये था और उस पर अनेक दिव्य सुगन्धियाँ लगी थीं।

श्लोक 9 से 14

सञ्जय उवाच — 
एवमुक्त्वा ततो राजन्महायोगेश्वरो हरिः ।
दर्शयामास पार्थाय परमं रुपमैश्वरम् ।। 9 ।।

सञ्जयः उवाच — संजय ने कहा; एवम् — इस प्रकार; उक्त्वा — कहकर; ततः — तत्पश्चात्; राजन् — हे राजा; महा-योग-ईश्वरः — परम शक्तिशाली योगी; हरिः — भगवान् कृष्ण ने; दर्शयाम् आस — दिखलाया; पार्थाय — अर्जुन को; परमम् — दिव्य; रूपम् ऐश्वरम् — विश्वरूप। 

तात्पर्य — संजय ने कहा — हे राजा ! इस प्रकार कहकर महायोगेश्वर भगवान् ने अर्जुन को अपना विश्वरूप दिखलाया।

 अनेकवक्त्रनयनमनेकाद्भुतदर्शनम् ।
अनेकदिव्याभरणं दिव्यानेकोद्यतायुधम् ।। 10 ।।

दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धानुलेपनम्
सर्वाश्चर्यमयं देवमनन्तं विश्वतोमुखम् ।। 11 ।।

अनेक — कई; वक्त्र — मुख; नयनम् — नेत्र; अनेक — अनेक; अद्भुत — विचित्र; दर्शनम् — दृश्य; अनेक — अनेक; दिव्य — दिव्य, अलौकिक; आभरणम् — आभूषण; दिव्य — दैवी; अनेक — विविध; उद्यत — उठाये हुए; आयुधम् — हथियार; दिव्य — दिव्य; माल्य — मालाएँ; अम्बर — वस्त्र; धरम् — धारण किये; दिव्य — दिव्य; गन्ध — सुगन्धियाँ; अनुलेपनम् — लगी थीं ; सर्व — समस्त; आश्चर्य-मयम् — आश्चर्यपूर्ण; देवम् — प्रकाशयुक्त; अनन्तम् — असीम; विश्वतः -मुखम् — सर्वव्यापी।

तात्पर्य — अर्जुन ने उस विश्वरूप में असंख्य मुख, असंख्य नेत्र तथा असंख्य आश्चर्यमय दृश्य देखे। यह रूप अनेक दैवी आभूषणों से अलंकृत था और अनेक दैवी हथियार उठाये हुए था। यह दैवी मालाएँ तथा वस्त्र धारण किये था और उस पर अनेक दिव्य सुगन्धियाँ लगी थीं। सब कुछ आश्चर्यमय, तेजमय, असीम तथा सर्वत्र व्याप्त था।

इसे भी पढ़ें :–

  1. अध्याय दस — श्रीभगवान् का ऐश्वर्य
  2. अध्याय ग्यारह — विराट रूप
  3. 1 से 4 — विश्वरूप के दर्शन हेतु अर्जुन की प्रार्थना
  4. 5 से 10 — भगवान् द्वारा अपने विश्वरूप का वर्णन

दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता ।
यदि भाः सदृशी सा स्याभ्दासस्तस्य महात्मनः ।। 12 ।।

दिवि — आकाश में ; सूर्य — सूर्य का; सहस्रस्य — हजारों ; भवेत् — थे; युगपत् — एकसाथ; उत्थिता — उपस्थित; यदि — यदि; भाः — प्रकाश; सदृशी — के समान; सा — वह; स्यात् — हो; भासः — तेज; तस्य — उस; महा-आत्मनः — परम स्वामी का।

तात्पर्य — यदि आकाश में हजारों सूर्य एकसाथ उदय हों, तो उनका प्रकाश शायद परमपुरुष के इस विश्वरूप के तेज की समता कर सके।

तत्रैकस्थं जगत्कृत्स्नं प्रविभक्तमनेकधा ।
अपश्यद्देवदेवस्य शरीरे पाण्डवस्तदा ।। 13 ।।

तत्र — वहाँ ; एक-स्थम् — एकत्र, एक स्थान में ; जगत् — ब्रह्माण्ड; कृत्स्नम् — सम्पूर्ण; प्रविभक्तम् — विभाजित; अनेकधा — अनेक में ; अपश्यत् — देखा; देव-देवस्य — भगवान् के; शरीरे — विश्वरूप में ; पाण्डवः — अर्जुन ने; तदा — तब।

तात्पर्य — उस समय अर्जुन ने भगवान् के विश्वरूप में एक ही स्थान पर स्थित हजारों भागों में विभक्त ब्रह्माण्ड के अनन्त अंशों को देख सका।

ततः स विस्मयाविष्टो हृष्टरोमा धनञ्जयः
प्रणम्य शिरसा देवं कृताञ्जलिरभाषत ।। 14 ।।

ततः — तत्पश्चात्; सः — वह; विस्मय-आविष्टः — आश्चर्यचकित होकर; हृष्ट-रोमा — हर्ष से रोमांचित; धनञ्जयः — अर्जुन; प्रणम्य — प्रणाम करके; शिरसा — शिर के बल; देवम् — भगवान् को; कृत-अञ्जलिः — हाथ जोड़कर; अभाषत — कहने लगा। 

तात्पर्य — तब मोहग्रस्त एवं आश्चर्यचकित रोमांचित हुए अर्जुन ने प्रणाम करने के लिए मस्तक झुकाया और वह हाथ जोड़कर भगवान् से प्रार्थना करने लगा।

आगे के श्लोक :–

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