Sansar Vriksh Ka Kathan / संसार वृक्ष का कथन

अध्याय पन्द्रह पुरुषोत्तम योग

Sansar Vriksh Ka Kathan Aur Bhagwat Prapti Ka Upay
संसार वृक्ष का कथन और भगवत प्राप्ति का उपाय

Sansar Vriksh Ka Kathan Aur Bhagwat Prapti Ka Upay, संसार वृक्ष का कथन और भगवत प्राप्ति का उपाय- भगवान् ने कहा — कहा जाता है कि एक शाश्वत अश्वत्थ वृक्ष है, जिसकी जड़े तो ऊपर की ओर तथा पत्तियाँ वैदिक स्त्रोत हैं। जो इस वृक्ष को जानता है, वह वेदों का ज्ञाता है। इस वृक्ष के वास्तविक स्वरुप का अनुभव इस जगत् में नहीं किया जा सकता। कोई भी नहीं समझ सकता कि इसका आदि कहाँ है, अन्त कहाँ है या इसका आधार कहाँ है ? 

श्लोक 1 से 6

श्रीभगवानुवाच —
ऊध्र्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम् ।
छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित् ।। 1 ।।

श्री-भगवान् उवाच — भगवान् ने कहा ; ऊध्र्व-मूलम् — ऊपर की ओर जड़े ; अधः — नीचे की ओर ; शाखम् — शाखाएँ ; अश्वत्थम् — अश्वत्थ वृक्ष को ; प्राहुः — कहा गया है ; अव्ययम् — शाश्वत ; छन्दांसि — वैदिक स्त्रोत ; यस्य — जिसके ; पर्णानि — पत्ते ; यः — जो कोई ; तम् — उसको ; वेद — जानता है ; सः — वह ; वेद-वित् — वेदों के ज्ञाता ।

तात्पर्य — भगवान् ने कहा — कहा जाता है कि एक शाश्वत अश्वत्थ वृक्ष है, जिसकी जड़े तो ऊपर की ओर तथा पत्तियाँ वैदिक स्त्रोत हैं। जो इस वृक्ष को जानता है, वह वेदों का ज्ञाता है ।

अधश्चोध्र्वं प्रसृतास्तस्य शाखा
गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः ।
अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि
कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके ।। 2 ।।

अधः — नीचे ; च — तथा ; ऊध्र्वम् — ऊपर की ओर ; प्रसृताः — फैली हुई ; तस्य — उसकी ; शाखाः — शाखाएँ ; गुण — प्रकृति के गुणों द्वारा ; प्रवृद्धाः — विकसित ; विषय — इन्द्रियविषय ; प्रवालाः — टहनियाँ ; अधः — नीचे की ओर ; च — तथा ; मूलानि — जड़ों को ; अनुसन्ततानि — विस्तृत ; कर्म — कर्म करने के लिए ; अनुबन्धीनि — बँधा ; मनुष्य-लोके — मानव समाज के जगत् में ।

तात्पर्य — इस वृक्ष की शाखाएँ ऊपर तथा नीचे फैली हुई हैं और प्रकृति के तीन गुणों द्वारा पोषित हैं। इसकी टहनियाँ इन्द्रियविषय हैं । इस वृक्ष की जड़ें नीचे की ओर भी जाती हैं , जो मानवसमाज के सकाम कर्मों से बँधी हुई हैं ।

न रूपमस्येह तथोपलभ्यते
नान्दो न चादिर्न च सम्प्रतिष्ठा ।
अश्वत्थमेनं सुविरूढमूल-
मसङ्गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा ।। 3 ।।

ततः पदं तत्परिमार्गितव्यं
यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः ।
तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये
यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी ।। 4 ।।

न — नहीं ; रूपम् — रूप ; अस्य — इस वृक्ष का ; इह — इस संसार में ; तथा — भी ; उपलभ्यते — अनुभव किया जा सकता है ; न — कभी नहीं ; अन्तः — अन्त ; न — कभी नहीं ; च — भी ; आदिः —  प्रारम्भ ; न — कभी नहीं ; च — भी ; सम्प्रतिष्ठा — नींव ; अश्वत्थम् — अश्वत्थ वृक्ष को ; एनम् — इस ; सु-विरुढ़ — अत्यन्त दृढ़ता से ; मूलम् — जड़वाला ; असङ्ग-शस्त्रेण — विरक्ति के हथियार से ; दृढेन — दृढ़ ; छित्त्वा — काट कर ; ततः — तत्पश्चात् ; पदम् — स्थिति को ; तत् — उस ; परिमार्गितव्यम् — खोजना चाहिए ; यस्मिन् — जहाँ ; गताः — जाकर ; न — कभी नहीं ; निवर्तन्ति — वापस आते हैं ; भूयः — पुनः ; तम् — उसको ; एव — ही ; च — भी ; आद्यम् — आदि ; पुरुषम् — भगवान् की ; प्रपद्ये — शरण में जाता हूँ ; यतः — जिससे ; प्रवृत्तिः — प्रारम्भ ; प्रसृता — विस्तीर्ण ; पुराणि — अत्यन्त पुरानी ।

तात्पर्य — इस वृक्ष के वास्तविक स्वरुप का अनुभव इस जगत् में नहीं किया जा सकता। कोई भी नहीं समझ सकता कि इसका आदि कहाँ है, अन्त कहाँ है या इसका आधार कहाँ है ? लेकिन मनुष्य को चाहिए कि इस दृढ मूल वाले वृक्ष को विरक्ति के शस्त्र से काट गिराए। तत्पश्चात् उसे ऐसे स्थान की खोज करनी चाहिए जहाँ जाकर लौटना न पड़े और जहाँ उस भगवान् की शरण ग्रहण कर ली जाये, जिससे अनादि काल से प्रत्येक वस्तु का सूत्रपात तथा विस्तार होता आया है।

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निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा
अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः ।
द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसंज्ञै-
र्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत् ।। 5 ।।

निः — रहित ; मान — झूठी प्रतिष्ठा ; मोहाः — तथा मोह ; जित — जीता गया ; सङ्ग — संगति की ; दोषाः — त्रुटियाँ ; अध्यात्म — आध्यात्मिक ज्ञान में ; नित्याः — शाश्वतता में ; विनिवृत्त — विलग ; कामाः — काम से ; द्वन्द्वैः — द्वैत से ; विमुक्ताः — मुक्त ; सुख-दुःख — सुख तथा दुःख ; संज्ञैः — नामक ; गच्छन्ति — प्राप्त करते हैं ; अमूढाः — मोहरहित ; पदम् — पद, स्थान को ; अव्ययम् — शाश्वत ; तत् — उस ।

तात्पर्य — जो झूठी प्रतिष्ठा, मोह तथा कुसंगति से मुक्त हैं, जो शाश्वत तत्त्व को समझते हैं, जिन्होंने भौतिक काम को नष्ट कर दिया है, जो सुख तथा दुःख के द्वन्द्व से मुक्त हैं और जो मोहरहित होकर परम पुरुष के शरणागत होना जानते हैं, वे उस शाश्वत राज्य को प्राप्त होते हैं ।

न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः
यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ।। 6 ।।

न — नहीं ; तत् — वह ; भासयते — प्रकाशित करता है ; सूर्यः — सूर्य ; न — न तो ; शशाङ्कः — चन्द्रमा ; न — न तो ; पावकः — अग्नि, बिजली ; यत् — जहाँ ; गत्वा — जाकर ; न — कभी नहीं ; निवर्तन्ते — वापस आते हैं ; तत् धाम — वह धाम ; परमम् — परम ; मम — मेरा ।

तात्पर्य — वह मेरा परम धाम न तो सूर्य या चन्द्र के द्वारा प्रकाशित होता है और न अग्नि या बिजली से। जो लोग वहाँ पहुँच जाते हैं, वे इस भौतिक जगत् में फिर से लौट कर नहीं आते ।

आगे के श्लोक :–

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