Santon Ke Lakshan / संतों के लक्षण

श्रीरामचरितमानस अरण्यकाण्ड

Santon Ke Lakshan Aur Satsang Bhajan Ke Liye Prerna
संतों के लक्षण और सत्संग भजन के लिये प्रेरणा

Santon Ke Lakshan Aur Satsang Bhajan Ke Liye Prerna, संतों के लक्षण और सत्संग भजन के लिये प्रेरणा :- श्रीरघुनाथजी के सुन्दर वचन सुनकर मुनि का शरीर पुलकित हो गया और नेत्र [ प्रेमाश्रुओं के जल से ] भर आये। [ वे मन-ही-मन कहने लगे – ] कहो तो किस प्रभु की ऐसी रीति है, जिसका सेवक पर इतना ममत्व और प्रेम हो। हे रघुवीर ! हे भव-भय ( जन्म-मरण के भय ) का नाश करने वाले मेरे नाथ ! अब कृपा कर संतों के लक्षण कहिये। [ श्रीरामजी ने कहा – ] हे मुनि ! सुनो, मैं संतों के गुणों को कहता हूँ, जिनके कारण मैं उनके वश में रहता हूँ। 


सुनु मुनि कह पुरान श्रुति संता। मोह बिपिन कहुँ नारि बसंता ।।

जप तप नेम जलाश्रय झारी। होइ ग्रीषम सोषइ सब नारी ।।

अर्थात् :- हे मुनि ! सुनो, पुराण, वेद और संत कहते हैं कि मोहरूपी वन [ को विकसित करने ] के लिये स्त्री वसन्त-ऋतु के समान है। जप, तप, नियमरूपी सम्पूर्ण जल के स्थानों को स्त्री ग्रीष्मरूप होकर सर्वथा सोख लेती है। 

काम क्रोध मद मत्सर भेका। इन्हहि हरषप्रद बरषा एका ।।
दुर्बासना कुमुद समुदाई। तिन्ह कहँ सरद सदा सुखदाई ।।

अर्थात् :- काम, क्रोध, मद और मत्सर ( डाह ) आदि मेढक हैं। इनको वर्षा-ऋतु होकर हर्ष प्रदान करने वाली एकमात्र यही ( स्त्री ) है। बुरी वासनाएँ कुमुदों के समूह हैं। उनको सदैव सुख देनेवाली यह शरद्-ऋतु है। 

धर्म सकल सरसीरुह बृंदा। होइ हिम तिन्हहि दहइ सुख मंदा ।।
पुनि ममता जवास बहुताई। पलुहइ नारि सिसिर रितु पाई ।।

अर्थात् :- समस्त धर्म कमलों की झुंड हैं। यह नीच ( विषयजन्य ) सुख देनेवाली स्त्री हिम-ऋतु होकर उन्हें जला डालती है। फिर मातरूपी जवास का समूह ( वन ) स्त्रीरूपी शिशिर-ऋतु को पाकर हरा-भरा हो जाता है। 

पाप उलूक निकर सुखकारी। नारि निबिड़ रजनी अँधिआरी ।।
बुधि बल सील सत्य सब मीना। बनसी सम त्रिय कहहिं प्रबीना ।।

अर्थात् :- पापरूपी उल्लुओं के समूह के लिये यह स्त्री सुख देनेवाली घोर अन्धकारमयी रात्रि है। बुद्धि, बल, शील और सत्य – ये सब मछलियाँ हैं और उन [ को फँसाकर नष्ट करने ] के लिये स्त्री बंसी के समान है, चतुर पुरुष ऐसा कहते हैं। 

दो० — अवगुन मूल सूलप्रद प्रमदा सब दुख खानि ।
ताते कीन्ह निवारन मुनि मैं यह जियँ जानि ।। 44 ।।

अर्थात् :- युवती स्त्री अवगुणों की मूल, पीड़ा देनेवाली और सब दुःखों की खान है। इसलिये हे मुनि ! मैंने जी में ऐसा जानकर तुमको विवाह करने से रोका था।

सुनि रघुपति के बचन सुहाए। मुनि तन पुलक नयन भरि आए ।।
कहहु कवन प्रभु कै असि रीती। सेवक पर ममता अरु प्रीती ।।

अर्थात् :- श्रीरघुनाथजी के सुन्दर वचन सुनकर मुनि का शरीर पुलकित हो गया और नेत्र [ प्रेमाश्रुओं के जल से ] भर आये। [ वे मन-ही-मन कहने लगे – ] कहो तो किस प्रभु की ऐसी रीति है, जिसका सेवक पर इतना ममत्व और प्रेम हो। 

जे न भजहिं अस प्रभु भ्रम त्यागी। ग्यान रंक नर मंद अभागी ।।
पुनि सादर बोले मुनि नारद। सुनहु राम बिग्यान बिसारद ।।

अर्थात् :- जो मनुष्य भ्रम को त्यागकर ऐसे प्रभु को नहीं भजते, वे ज्ञान के कंगाल, दुर्बुद्धि और अभागे हैं। फिर नारद मुनि आदरसहित बोले – हे विज्ञान-विशारद श्रीरामजी ! सुनिये। –

संतन्ह के लच्छन रघुबीरा। कहहु नाथ भव भंजन भीरा ।।
सुनु मुनि संतन्ह के गुन कहऊँ। जिन्ह ते मैं उन्ह कें बस रहऊँ ।।

अर्थात् :- हे रघुवीर ! हे भव-भय ( जन्म-मरण के भय ) का नाश करने वाले मेरे नाथ ! अब कृपा कर संतों के लक्षण कहिये। [ श्रीरामजी ने कहा – ] हे मुनि ! सुनो, मैं संतों के गुणों को कहता हूँ, जिनके कारण मैं उनके वश में रहता हूँ। 

षट बिकार जित अनघ अकामा। अचल अकिंचन सुचि सुखधामा ।।
अमित बोध अनीह मितभोगी। सत्यसार कबि कोबिद जोगी ।।

अर्थात् :- वे संत [ काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर – इन ] छः विकारों को जीते हुए, पापरहित, कामनारहित, निश्चल ( स्थिरबुद्धि ), अकिञ्चन ( सर्वत्यागी ), बाहर-भीतर से पवित्र, सुख के धाम, असीम ज्ञानवान्, इच्छारहित, मिताहारी, सत्यनिष्ठ, कवि, विद्वान्, योगी,। 

सावधान मानद मदहीना। धीर धर्म गति परम प्रबीना ।।

अर्थात् :- सावधान, दूसरों को मान देनेवाले, अभिमान रहित, धैर्यवान्, धर्म के ज्ञान और आचरण में अत्यन्त निपुण,। 

दो० — गुनागार संसार दुख रहित बिगत संदेह ।
तजि मम चरन सरोज प्रिय तिन्ह कहुँ देह न गेह ।। 45 ।।

अर्थात् :- गुणों के घर, संसार के दुःखों से रहित और सन्देहों से सर्वथा छूटे हुए होते हैं। मेरे चरणकमलों को छोड़कर उनको न देह की प्रिय होती है, न घर ही। 

निज गुन श्रवन सुनत सकुचाहीं। पर गुन सुनत अधिक हरषाहीं ।।
सम सीतल नहिं त्यागहिं नीती। सरल सुभाउ सबहि सन प्रीती ।।

अर्थात् :- कानों से अपने गुण सुनने में सकुचाते हैं, दूसरों के गुण सुनने से विशेष हर्षित होते हैं। सम और शीतल हैं, न्याय का कभी त्याग नहीं करते। सरल स्वभाव होते हैं और सभी से प्रेम रखते हैं। 

जप तप ब्रत दम संजम नेमा। गुरु गोबिंद बिप्र पद प्रेमा ।।
श्रद्धा छमा मयत्री दाया। मुदिता मम पद प्रीति अमाया ।।

अर्थात् :- वे जप, तप, व्रत, दम, संयम और नियम में रत रहते हैं और गुरु, गोविन्द तथा ब्राह्मणों के चरणों में प्रेम रखते हैं। उनमें श्रद्धा, क्षमा, मैत्री, दया, मुदिता ( प्रसन्नता ) और मेरे चरणों में निष्कपट प्रेम होता है। 

बिरति बिबेक बिनय बिग्याना। बोध जथारथ बेद पुराना ।।
दंभ मान मद करहिं न काऊ। भूलि न देहिं कुमारग पाऊ ।।

अर्थात् :- तथा वैराग्य, विवेक, विनय, विज्ञान ( परमात्मा के तत्त्व का ज्ञान ) और वेद-पुराण का यथार्थ ज्ञान रहता है। वे दम्भ, अभिमान और मद कभी नहीं करते और भूलकर भी कुमार्ग पर पैर नहीं रखते। 

गावहिं सुनहिं सदा मम लीला। हेतु रहित परहित रत सीला ।।
मुनि सुनु साधुन्ह के गुन जेते। कहि न सकहिं सारद श्रुति तेते ।।

अर्थात् :- सदा मेरी लीलाओं को गाते-सुनते हैं और बिना ही कारण दूसरों के हित में लगे रहने वाले होते हैं। हे मुनि ! सुनो, संतों के जितने गुण हैं, उनको सरस्वतीजी और वेद भी नहीं कह सकते। 

छं० — कहि सक न सारद सेष नारद सुनत पद पंकज गहे ।
अस दीनबंधु कृपाल अपने भगत गुन निज मुख कहे ।।
सिरु नाइ बारहिं बार चरनन्हि ब्रह्मपुर नारद गए ।
ते धन्य तुलसीदास आस बिहाइ जे हरि रँग रँए ।।

अर्थात् :- ‘ शेष और शारदा भी नहीं कह सकते ‘ यह सुनते ही नारदजी ने श्रीरामजी के चरणकमल पकड़ लिये। दीनबन्धु कृपालु प्रभु ने इस प्रकार अपने श्रीमुख से अपने भक्तों के गुण कहे। भगवान् के चरणों में बार-बार सिर नवाकर नारदजी ब्रह्मलोक को चले गये। तुलसीदासजी कहते हैं कि वे पुरुष धन्य हैं, जो सब आशा छोड़कर केवल श्रीहरि के चरणों के रंग में रँग गये हैं। 

दो० — रावनारि जसु पावन गावहिं सुनहिं जे लोग ।
राम भगति दृढ़ पावहिं बिनु बिराग जप जोगा ।। 46 ( क ) ।।

अर्थात् :- जो लोग रावण के शत्रु श्रीरामजी का पवित्र यश गावेंगे और सुनेंगे, वे वैराग्य, जप और योग के बिना ही श्रीरामजी की दृढ़ भक्ति पावेंगे। 

दीप सिखा सम जुबति तन मन जनि होसि पतंग ।
भजहि राम तजि काम मद करहि सदा सतसंग ।। 46 ( ख ) ।।

अर्थात् :- युवती स्त्रियों का शरीर दीपक की लौके समान है, हे मन ! तू उसका पतिंगा न बन। काम और मद को छोड़कर श्रीरामचन्द्रजी का भजन कर और सदा सत्संग कर।  

मासपारायण, बाईसवाँ विश्राम

इति श्रीमद्रामचरितमानसे सकलकलिकलुषविध्वंसने तृतीयः सोपानः समाप्तः ।
कलियुग के सम्पूर्ण पापों को विध्वंस करने वाले श्रीरामचरितमानस का यह तीसरा सोपान समाप्त हुआ।

अरण्यकाण्ड समाप्त

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