Dhundhi Vinayaka Stotra / सर्वसम्पत्कर ढुण्ढि विनायक

Sarvsampatkar Dhundhi Vinayaka Stotram
सर्वसम्पत्कर ढुण्ढि विनायक स्तोत्रम्


श्रीकण्ठ उवाच

जय विघ्नकृतामाद्य भक्तनिर्विघ्नकारक ।
अविघ्न विघ्नशमन महाविघ्नैकविघ्नकृत् ।। 1 ।।

अर्थात् :- श्रीकण्ठ [ शिवजी ] बोले – हे विघ्नकर्ताओं के कारण ! हे भक्तों के निर्विघ्न-कारक, विघ्नहीन, विघ्नविनाशन, महाविघ्नों के मुख्य विघ्न करने वाले ! आपकी जय हो।

जय सर्वगणाधीश जय सर्वगणाग्रणीः ।
गणप्रणतपादाब्ज गणनानीतसद्गुणा ।। 2 ।।

अर्थात् :- हे सर्वगणाधीश, सर्वगणाग्रणी ! आपकी जय हो।  हे गणों से प्रणाम किये हुए पदकमल वाले, गणनातीत सद्गुण ! आपकी जय हो।

जय सर्वग सर्वेश सर्वबुद्धयेकशेवधे ।
सर्वमायाप्रपञ्चज्ञ सर्वकर्माग्रपूजित ।। 3 ।।

अर्थात् :- हे सर्वगत, सर्वेश, सब बुद्धियों के मुख्य निधान, सब मायाप्रपञ्च के जानने वाले, सब कर्मों में अग्रपूजित ! आपकी जय हो।

सर्वमङ्गलमाङ्गल्य जय त्वं सर्वमङ्गल ।
अमङ्गलोपशमन महामङ्गलहेतुक ।। 4 ।।

अर्थात् :- हे सब मंगलों के मंगल स्वरुप, सब मंगल वाले, अमंगलनाशक, महामंगलकारण ! आपकी जय हो।

जय सृष्टिकृतां वन्द्य जय स्थितिकृता नत ।
जय संहृतिकृतस्तुत्य जय सत्कर्मसिद्धिद ।। 5 ।।

अर्थात् :- हे सृष्टिकर्ताओं के वंदनीय ! आपकी जय हो। हे पालनकर्ता विष्णु से नमस्कृत ! आपकी जय हो। हे संहारकारक ! हे स्तुति के योग्य ! आपकी जय हो। हे अच्छे कर्मों के सिद्धिदायक ! आपकी जय हो।

सिद्धवन्द्यपदाम्भोज जय सिद्धिविधायक ।
सर्वसिद्ध्येकनिलय महासिद्धयृद्धिसूचक ।। 6 ।।

अर्थात् :- हे सिद्धों से वंदनीय पदकमल वाले, सिद्धिकारक, सब सिद्धियों के मुख्य स्थान, मुक्ति समृद्धि सूचक ! आपकी जय हो।

अशेषगुणनिर्माण गुणातीत गुणाग्रणीः ।
परिपूर्णचरित्रार्थ जय त्वं गुणवर्णित ।। 7 ।।

अर्थात् :- हे सम्पूर्ण गुणों के निर्माण करने वाले, गुणों से परे, गुणाग्रणी, परिपूर्ण चरितार्थ, गुणों से वर्णित ! आपकी जय हो।

जय सर्वबलाधीशबलारातिबलप्रद ।
बलाकोज्ज्वलदन्ताग्र बालाबलपराक्रम ।। 8 ।।

अर्थात् :- हे सब बलों के अधीश्वर इन्द्र के बलदायक, बकपंक्ति के समान श्वेत दन्ताग्र वाले, बालक, अबाल पराक्रम ! आपकी जय हो

अनन्तमहिमाधार धराधरविदारण ।
दन्ताग्रप्रोतदीङ्नाग जय नाग विभूषण ।। 9 ।।

अर्थात् :- हे अनन्त महिमा के आधार, पर्वत विदारण, दन्त के अग्रभाग से ग्रथित दिग्गज वाले, सर्पालंकार ! आपकी जय हो।

ये त्वां नमन्ति करुणामय दिव्यमूर्ते
सर्वैनसामपि भुवो भुवि मुक्तिभाजः ।

तेषां सदैव हरसीह महोपसर्गान्
स्वर्गापवर्गमपि सम्प्रददासि तेभ्यः ।। 10 ।।

अर्थात् :- हे दयामय, दिव्यमूर्ते ! सब पापों के आश्रय हुए भी जो मन आपको नमस्कार करते हैं, वे पृथ्वी पर मुक्ति के भागी होते हैं एवं आप यहाँ उनके बड़े उपद्रवों को हर लेते हैं एवं उनको स्वर्ग और मुक्ति भी देते हैं।

ये विघ्नराज भवता करुणाकटाक्षैः
सम्प्रेक्षिताः क्षितितले क्षणमात्रमत्र ।

तेषां क्षयन्ति सकलान्यपि किल्बिषाणि
लक्ष्मीः कटाक्षयति तान् पुरुषोत्तमान् हि ।। 11 ।।

अर्थात् :- हे विघ्नराज ! जो इस भूतल में क्षणमात्र आपसे करुणा-कटाक्षों के द्वारा देखे गये हैं, उनके सब पाप भी नष्ट हो जाते हैं और उन पुरुषोत्तमों को ही लक्ष्मीजी करुणा-कटाक्ष से देखती हैं।

ये त्वां स्तुवन्ति नतविघ्नविघातदक्ष
दाक्षायणीहृदयपङ्कजतिग्मरश्मे ।

श्रूयन्त एव त इह प्रथिता न चित्रं
चित्रं तदत्र गणपा यदहो त एव ।। 12 ।।

अर्थात् :- हे भक्तविघ्नविघातदक्ष, दक्षपुत्री के हृदय कमल के सूर्य ! जो आपकी स्तुति करते हैं, वे यहाँ प्रसिद्ध सुने जाते हैं – यह आश्चर्य नहीं है, अपितु जो वे ही लोग यहाँ गणों के स्वामी होते हैं, वह विचित्र है।

ये शीलयन्ति सततं भवतोऽङ्घरियुग्मं
ते पुत्रपौत्रधनधान्यसमृद्धिभाजः ।

संशीलिताङ्घ्रिकमलाबहुभृत्यवर्गै-
र्भूपालभोग्यकमलां विमलां लभन्ते ।। 13 ।।

अर्थात् :- जो आपके दोनों पदारविन्दों का निरन्तर ध्यान करते हैं, वे धन-धान्य, पुत्र और पौत्रों से युक्त होते हैं एवं बहुत भृत्यवर्गों से सेवित पद-कमल वाले होकर विमल एवं राजाओं से भोगने योग्य सम्पत्ति को पाते हैं।

त्वं कारणं परमकारणकारणानां
वेद्योऽसि वेदविदुषां सततं त्वमेकः ।

त्वं मार्गणीयमसि किञ्चनमूलवाचां
वाचामगोचर चराचर दिव्यमूर्ते ।। 14 ।।

अर्थात् :- हे परमकारण, निजकारण, वाणी के अविषय, दिव्यमूर्ते ! आप कारणों के कारण हैं एवं वेदों के पण्डितों से एकमात्र निरन्तर जानने योग्य हैं और जो कुछ खोजने योग्य है, वह आप ही हैं।

वेदा वेदन्ति न यथार्थतया भवन्तं
ब्रह्मादयोऽपि न चराचरसूत्रधार ।

त्वं हंसि पासि विदधासि समस्तमेकः
कस्ते स्तुतिव्यतिकरो मनसाप्यगम्य ।। 15 ।।

अर्थात् :- हे मन से भी अगम्य, चराचर सूत्रधार ! वेद आपको यथार्थ रूप में नहीं जानते हैं एवं ब्रह्मादि देव भी नहीं जानते हैं ? एकमात्र आप ही संसार का सृजन, पालन एवं संहार करते हैं। इससे आपकी स्तुति करने का माध्यम कौन है अर्थात् कोई भी नहीं है।

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