Sat, Raj Aur Tam Teenon Gunn Ka Vishay / तीनों गुण का विषय

अध्याय चौदह प्रकृति के तीन गुण

Sat, Raj Aur Tam Teenon Gunn Ka Vishay
सत्, रज और तम तीनों गुण का विषय

Sat, Raj Aur Tam Teenon Gunn Ka Vishay, सत्, रज, तम तीनों गुण का विषय- भौतिक प्रकृति तीन गुणों से युक्त है। ये हैं — सतो, रजो तथा तमोगुण। हे महाबाहु अर्जुन ! जब शाश्वत जीव प्रकृति के संसर्ग में आता है, तो वह इस गुणों से बँध जाता है। हे निष्पाप ! सतोगुण अन्य गुणों की अपेक्षा अधिक शुद्ध होने के कारण प्रकाश प्रदान करने वाला और मनुष्यों को सारे पाप कर्मों से मुक्त करने वाला है। जो लोग इस गुण में स्थित होते हैं, वे सुख तथा ज्ञान के भाव से बँध जाते हैं। हे भरतपुत्र ! 

श्लोक 5 से 18

सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसम्भवाः ।
निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम् ।। 5 ।।

सत्त्वम् — सतोगुण ; रजः — रजोगुण ; तमः — तमोगुण ; इति — इस प्रकार ; गुणाः — गुण ; प्रकृति — भौतिक प्रकृति से ; सम्भवाः — उत्पन्न ; निबध्नन्ति — बंधते हैं ; महा-बाहो — हे बलिष्ठ भुजाओं वाले ; देहे — इस शरीर में ; देहिनम् — जीव को ; अव्ययम् — नित्य, अविनाशी ।

तात्पर्य — भौतिक प्रकृति तीन गुणों से युक्त है। ये हैं — सतो, रजो तथा तमोगुण। हे महाबाहु अर्जुन ! जब शाश्वत जीव प्रकृति के संसर्ग में आता है, तो वह इस गुणों से बँध जाता है ।

तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात्प्रकाशकमनामयम्
सुखसङ्गेन बध्नाति ज्ञानसङ्गेन चनाघ ।। 6 ।।

तत्र — वहाँ; सत्त्वम् — सतोगुण ; निर्मलत्वात् — भौतिक जगत् में शुद्धतम होने के कारण ; प्रकाशकम् — प्रकाशित करता हुआ ; अनामयम् — किसी पापकर्म के बिना ; सुख — सुख की ; सङ्गेन — संगति के द्वारा ; बध्नाति — बाँधता है ; ज्ञान — ज्ञान की ; सङ्गेन — संगति से ; च — भी ; अनघ — हे पापरहित ।

तात्पर्य — हे निष्पाप ! सतोगुण अन्य गुणों की अपेक्षा अधिक शुद्ध होने के कारण प्रकाश प्रदान करने वाला और मनुष्यों को सारे पाप कर्मों से मुक्त करने वाला है। जो लोग इस गुण में स्थित होते हैं, वे सुख तथा ज्ञान के भाव से बँध जाते हैं।

रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासङ्गसमुद्भवम् ।
तन्निबध्नाति कौन्तेय कर्मसङ्गेन देहिनम् ।। 7 ।।

रजः — रजोगुण ; राग-आत्मकम् — आकांक्षा या काम से उत्पन्न ; विद्धि — जानो ; तृष्णा — लोभ से ; सङ्ग — संगति से ; समुद्भवम् — उत्पन्न ; तत् — वह ; निबध्नाति — बाँधता है ; कौन्तेय — हे कुन्तीपुत्र ; कर्म-सङ्गेन — सकाम कर्म की संगति से ; देहिनम् — देहधारी को। 

तात्पर्य — हे कुन्तीपुत्र ! रजोगुण की उत्पत्ति असीम आकांक्षाओं तथा तृष्णाओं से होती है और इसी के कारण से यह देहधारी जीव सकाम कर्मों से बँध जाता है।

तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम् ।
प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नाति भारत ।। 8 ।।

तमः — तमोगुण ; तु — लेकिन ; अज्ञान-जम् — अज्ञान से उत्पन्न ; विद्धि — जानो ; मोहनम् — मोह ; सर्व-देहिनाम् — समस्त देहधारी जीवों का ; प्रमाद — पागलपन ; आलस्य — आलस ; निद्राभिः — तथा नींद द्वारा ; तत् — वह ; निबध्नाति — बाँधता है ; भारत — हे भरतपुत्र ।

तात्पर्य — हे भरतपुत्र ! तुम जान लो कि अज्ञान से उत्पन्न तमोगुण समस्त देहधारी जीवों  है। इस गुण के प्रतिफल पागलपन ( प्रमाद ), आलस तथा नींद हैं, जो बद्धजीव को बाँधते हैं ।

सत्त्वं सुखे सञ्जयति रजः कर्मणि भारत ।
ज्ञानमावृत्य तु तमः प्रमादे सञ्जयत्युत ।। 9 ।।

सत्त्वम् — सतोगुण ; सुखे — सुख में ; सञ्जयति — बाँधता है ; रजः — रजोगुण ; कर्मणि — सकाम कर्म में ; भारत — हे भरतपुत्र ; ज्ञानम् — ज्ञान को ; आवृत्य — धक् कर ; तु — लेकिन ; तमः — तमोगुण ; प्रमादे — पागलपन में ; सञ्जयति — बाँधता है ; उत — ऐसा कहा जाता है ।

तात्पर्य — हे भरतपुत्र ! सतोगुण मनुष्य को सुख से बाँधता है, रजोगुण सकाम कर्म से बाँधता है और तमोगुण मनुष्य के ज्ञान को ढक कर उसे पागलपन से बाँधता है ।

रजस्तमश्चाभिभूय सत्त्वं भवति भारत ।
रजः सत्त्वं तमश्चैव तमः सत्त्वं रजस्तथा ।। 10 ।।

रजः — रजोगुण ; तमः — तमोगुण को ; च — भी ; अभिभूय — पार करके ; सत्त्वम् — सतोगुण ; भवति — प्रधान बनता है ; भारत — हे भरतपुत्र ; रजः — रजोगुण ; सत्त्वम् — सतोगुण को ; तमः — तमोगुण ; च — भी ; एव — उसी तरह ; तमः — तमोगुण ; सत्त्वम् — सतोगुण को ; रजः — रजोगुण ; तथा — प्रकार ।

तात्पर्य — हे भरतपुत्र ! कभी-कभी सतोगुण रजोगुण तथा तमोगुण को परास्त करके प्रधान बन जाता है तो कभी रजोगुण सतो तथा तमोगुणों को परास्त कर देता है और कभी ऐसा होता है कि तमोगुण सतो तथा रजोगुणों को परास्त कर देता है। इस प्रकार श्रेष्ठता के लिए निरन्तर स्पर्धा चलती रहती है।

इसे भी पढ़ें :–

  1. अध्याय चौदह — प्रकृति के तीन गुण
  2. 1 से 4 — ज्ञान की महिमा और प्रकृति पुरुष

सर्वद्वारेषु देहेऽस्मिन्प्रकाश उपजायते
ज्ञानं यदा तदा विद्याद्विवृद्धं सत्त्वमित्युत ।। 11 ।।

सर्व-द्वारेषु — सारे दरवाजों में ; देहे अस्मिन् — इस प्रकार से ; प्रकाशः — प्रकाशित करने का गुण ; उपजायते — उत्पन्न होता है ; ज्ञानम् — ज्ञान; यदा — तब ; तदा — उस समय ; विद्यात् — जानो ; विवृद्धम् — बढ़ा हुआ ; सत्त्वम् — सतोगुण ; इति उत — ऐसा कहा गया है ।

तात्पर्य — सतोगुण की अभिव्यक्ति को तभी अनुभव किया जा सकता है, जब शरीर के सारे द्वार ज्ञान के प्रकाश से प्रकाशित होते हैं ।

लोभः प्रवृत्तिरारम्भः कर्मणामशमः स्पृहा ।
रजस्येतानि जायन्ते विवृद्धे भरतर्षभ ।। 12 ।।

लोभः — लोभ ; प्रवृत्तिः — कार्य ; आरम्भः — उद्यम ; कर्मणाम् — कर्मों में ; अशमः — अनियन्त्रित ; स्पृहा — इच्छा ; रजसि — रजोगुण में ; एतानि — ये सब ; जायन्ते — प्रकट होते हैं ; विवृद्धे — अधिकता होने पर ; भरत-ऋषभ — हे भरतवंशियों में प्रमुख ।

तात्पर्य — हे भरतवंशियों में प्रमुख ! जब रजोगुण में वृद्धि हो जाती है, तो अत्यधिक आसक्ति, सकाम कर्म, गहन उद्यम तथा अनियन्त्रित इच्छा एवं लालसा के लक्षण प्रकट होते हैं ।

अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव च ।
तमस्येतानि जायन्ते विवृद्धे कुरुनन्दन ।। 13 ।।

अप्रकाशः — अँधेरा ; अप्रवृत्तिः — निष्क्रियता ; च — तथा ; प्रमादः — पागलपन ; मोहः — मोह ; एव — निश्चय ही ; च — भी ; तमसि — तमोगुण ; एतानि — ये ; जायन्ते — प्रकट होते हैं ; विवृद्धे — बढ़ जाने पर ; कुरु-नन्दन — हे कुरुपुत्र ।

तात्पर्य — जब तमोगुण में वृद्धि हो जाती है, तो हे कुरुपुत्र ! अँधेरा, जड़ता, प्रमत्तता तथा मोह का प्राकट्य होता है।

यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु प्रलयं याति देहभृत् ।
तदोत्तमविदां लोकानमलान्प्रपद्यते ।। 14 ।। 

यदा — जब ; सत्त्वे — सतोगुण में ; प्रवृद्धे — बढ़ जाने पर ; तु — लेकिन ; प्रलयम् — सन्हार, विनाश को ; याति — जाता है ; देह-भृत् — देहधारी ; तदा — उस समय ; उत्तम विदाम् — ऋषियों के ; लोकान् — लोकों को ; अमलान् — शुद्ध ; प्रतिपद्यते — प्राप्त करता है।

तात्पर्य — जब कोई सतोगुण में मरता है, तो उसे महर्षियों के विशुद्ध उच्चतर लोकों की प्राप्ति होती है ।

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आगे के श्लोक :–

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