Shabri Par Kripa, Navdha Bhakti Updesh / शबरी पर कृपा

श्रीरामचरितमानस अरण्यकाण्ड

Shabri Par Kripa, Navdha Bhakti Updesh
शबरी पर कृपा, नवधा भक्ति उपदेश

Shabri Par Kripa, Navdha Bhakti Updesh, शबरी पर कृपा, नवधा भक्ति उपदेश :- मैं तुझसे अब अपनी नवधा भक्ति कहता हूँ। तू सावधान होकर सुन और मन में धारण कर। पहली भक्ति है संतों का सत्संग। दूसरी भक्ति है मेरे कथा-प्रसंग में प्रेम। मेरे दर्शन का परम अनुभव फल यह है कि जीव अपने सहज स्वरुप को प्राप्त हो जाता है। हे भामिनि ! अब यदि तू गजगामिनी जानकीजी की कुछ खबर जानती हो तो बता। हे तात ! काम, क्रोध और लोभ – ये तीन अत्यन्त प्रबल दुष्ट हैं। ये विज्ञान के धाम मुनियों के भी मनों को पलभर में क्षुब्ध कर देते हैं। 


सापत ताड़त परुष कहंता। बिप्र पूज्य अस गावहिं संता ।।

पूजिअ बिप्र सील गुन हीना। सूद्र न गुन गन ग्यान प्रबीना ।।

अर्थात् :- शाप देता हुआ, मारता हुआ और कठोर वचन कहता हुआ भी ब्राह्मण पूजनीय है, ऐसा संत कहते हैं। शील और गुण से हीन भी ब्राह्मण पूजनीय है। और गुणगणों से युक्त और ज्ञान में निपुण भी शूद्र पूजनीय नहीं है। 

कहि निज धर्म ताहि समुझावा। निज पद प्रीति देखि मन भावा ।।
रघुपति चरन कमल सिरु नाई। गयउ गगन आपनि गति पाई ।।

अर्थात् :- श्रीरामजी ने अपना धर्म ( भागवत-धर्म ) कहकर उसे समझाया। अपने चरणों में प्रेम देखकर वह उनके मन को भाया। तदनन्तर श्रीरघुनाथजी के चरणकमलों में सिर नवाकर वह अपनी गति ( गन्धर्व का स्वरुप ) पाकर आकाश में चला गया। 

ताहि देइ गति राम उदारा। सबरी कें आश्रम पगु धारा ।।
सबरी देखि राम गृहँ आए। मुनि के बचन समुझि जियँ भाए ।।

अर्थात् :- उदार श्रीरामजी उसे गति देकर शबरी जी के आश्रम में पधारे। शबरीजी ने श्रीरामचन्द्रजी को घर में आये देखा, तब मुनि मतङ्गजी के वचनों को याद करके उनका मन प्रसन्न हो गया। 

सरसिज लोचन बाहु बिसाला। जटा मुकुट सिर उर बनमाला ।।
स्याम गौर सुंदर दोउ भाई। सबरी परी चरन लपटाई ।।

अर्थात् :- कमल-सदृश नेत्र और विशाल भुजावाले, सिर पर जटाओं का मुकुट और हृदय पर वनमाला धारण किये हुए सुन्दर साँवले और गोरे दोनों भाइयों के चरणों में शबरीजी लिपट पड़ी। 

प्रेम मगन मुख बचन न आवा। पुनि पुनि पद सरोज सिर नावा ।।
सादर जल लै चरन पखारे। पुनि सुंदर आसन बैठारे ।।

अर्थात् :- वे प्रेम में मग्न हो गयीं, मुख से वचन नहीं निकलता। बार-बार चरण-कमलों में सिर नवा रही हैं। फिर उन्होंने जल लेकर आदरपूर्वक दोनों भाइयों के चरण धोये और फिर उन्हें सुन्दर आसनों पर बैठाया। 

दो० — कंद मूल फल सुरस अति दिए राम कहुँ आनि ।
प्रेम सहित प्रभु खाए बारंबार बखानि ।। 34 ।।

अर्थात् :- उन्होंने अत्यन्त रसीले और स्वादिष्ट कन्द, मूल और फल लाकर श्रीरामजी को दिये। प्रभु ने बार-बार प्रशंसा करके उन्हें प्रेमसहित खाया।

पानि जोरि आगें भइ ठाढ़ी। प्रभुहि बिलोकि प्रीति अति बाढ़ी ।।
केहि बिधि अस्तुति करौं तुम्हारी। अधम जाति मैं जड़मति भारी ।।

अर्थात् :- फिर वे हाथ जोड़कर आगे खड़ी हो गयीं। प्रभु को देखकर उनका प्रेम अत्यन्त बढ़ गया। [ उन्होंने कहा – ] मैं किस प्रकार आपकी स्तुति करूँ ? मैं नीच जाति की और अत्यन्त मूढ़बुद्धि हूँ। 

अधम ते अधम अधम अति नारी। तिन्ह महँ मैं मतिमंद अघारी ।।
कह रघुपति सुनु भामिनि बाता। मानउँ एक भगति कर नाता ।।

अर्थात् :- जो अधम से भी अधम हैं, स्त्रियाँ उनमें भी अत्यन्त अधम हैं; और उनमें भी हे पापनाशन ! मैं मन्दबुद्धि हूँ। श्रीरघुनाथजी ने कहा – हे भामिनि ! मेरी बात सुन ! मैं तो केवल एक भक्ति ही का सम्बन्ध मानता हूँ। 

जाति पाँति कुल धर्म बड़ाई। धन बल परिजन गुन चतुराई ।।
भगति हीन नर सोहइ कैसा। बिनु जल बारिद देखिअ जैसा ।।

अर्थात् :- जाति, पाँति, कुल, धर्म, बड़ाई, धन, बल, कुटुम्ब, गुण और चतुरता – इन सबके होने पर भी भक्ति से रहित मनुष्य कैसा लगता है, जैसे जलहीन बादल [ शोभाहीन ] दिखायी पड़ता है। 

नवधा भगति कहउँ तोहि पाहीं। सावधान सुनु धरु मन माहीं ।।
प्रथम भगति संतन्ह कर संगा। दूसरि रति मम कथा प्रसंगा ।।

अर्थात् :- मैं तुझसे अब अपनी नवधा भक्ति कहता हूँ। तू सावधान होकर सुन और मन में धारण कर। पहली भक्ति है संतों का सत्संग। दूसरी भक्ति है मेरे कथा-प्रसंग में प्रेम।  

दो० — गुर पद पंकज सेवा तीसरि भगति अमान ।
चौथि भगति मम गुन गन करइ कपट तजि गान ।। 35 ।।

अर्थात् :- तीसरी भक्ति है अभिमान रहित होकर गुरु के चरण कमलों की सेवा और चौथी भक्ति है कि कपट छोड़कर मेरे गुणसमूहों का गान करे। 

मंत्र जाप मम दृढ़ बिस्वासा। पंचम भजन सो बेद प्रकासा ।।
छठ दम सील बिरति बहु करमा। निरत निरंतर सज्जन धरमा ।।

अर्थात् :- मेरे ( राम ) मन्त्र का जप और मुझमें दृढ़ विश्वास – यह पाँचवी भक्ति है, जो वेदों में प्रसिद्ध है। छठी भक्ति है इन्द्रियों का निग्रह, शील ( अच्छा स्वभाव या चरित्र ), बहुत कार्यों से वैराग्य और निरंतर संत पुरुषों के धर्म ( आचरण ) में लगे रहना। 

सातवँ सम मोहि मय जग देखा। मोतें संत अधिक करि लेखा ।।
आठवँ जथालाभ संतोषा। सपनेहुँ नहिं देखइ परदोषा ।।

अर्थात् :- सातवीं भक्ति है जगत् भर को समभाव से मुझमें ओतप्रोत ( राममय ) देखना और संतों का मुझसे भी अधिक करके मानना। आठवीं भक्ति है जो कुछ मिल जाय, उसी में संतोष करना और स्वप्न में भी पराये दोषों को न देखना। 

नवम सरल सब सन छलहीना। मम भरोस हियँ हरष न दीना ।।
नव महुँ एकउ जिन्ह कें होई। नारि पुरुष सचराचर कोई ।।

अर्थात् :- नवीं भक्ति है सरलता और सबके साथ कपटरहित बर्ताव करना, हृदय में मेरा भरोसा रखना और किसी भी अवस्था में हर्ष और दैन्य ( विषाद ) का न होना। इन नवों में से जिनके एक भी होती है, वह स्त्री-पुरुष, जड़-चेतन कोई भी हो। –

सोइ अतिसय प्रिय भामिनि मोरें। सकल प्रकार भगति दृढ़ तोरें ।।
जोगि बृंद दुरलभ गति जोई। तो कहुँ आजु सुलभ भइ सोई ।।

अर्थात् :- हे भामिनि ! मुझे वही अत्यन्त प्रिय है। फिर तुझमें तो सभी प्रकार की भक्ति दृढ़ है। अतएव जो गति योगियों को भी दुर्लभ है, वही आज तेरे लिये सुलभ हो गयी है। 

मम दरसन फल परम अनूपा। जीव पाव निज सहज सरूपा ।।
जनकसुता कइ सुधि भामिनी। जानहि कहु करिबरगामिनी ।।

अर्थात् :- मेरे दर्शन का परम अनुभव फल यह है कि जीव अपने सहज स्वरुप को प्राप्त हो जाता है। हे भामिनि ! अब यदि तू गजगामिनी जानकीजी की कुछ खबर जानती हो तो बता। 

पंपा सरहि जाहु रघुराई। तहँ होइहि सुग्रीव मिताई ।।
सो सब कहिहि देव रघुबीरा। जानतहूँ पूछहु मतिधीरा ।।

अर्थात् :- [ शबरी जी ने कहा – ] हे रघुनाथजी ! आप पंपा नामक सरोवर जाइये, वहाँ आपकी सुग्रीव से मित्रता होगी। हे देव ! हे रघुवीर ! वह सब हाल बतावेगा। हे धीरबुद्धि ! आप सब जानते हुए भी मुझसे पूछते हैं। 

बार बार प्रभु पद सिरु नाई। प्रेम सहित सब कथा सुनाई ।।

अर्थात् :- बार-बार प्रभु के चरणों में सिर नवाकर, प्रेमसहित उसने सब कथा सुनायी। 

छं० — कहि कथा सकल बिलोकि हरि मुख हृदयँ पद पंकज धरे ।
तजि जोग पावक देह हरि पद लीन भइ जहँ नहीँ फिरे ।।
नर बिबिध कर्म अधर्म बहु मत सोकप्रद सब त्यागहू ।
बिस्वास करि कह दास तुलसी राम पद अनुरागहू ।।

अर्थात् :- सब कथा कहकर भगवान् के मुख के दर्शन कर, हृदय में उनके चरणकमलों को धारण कर लिया और योगाग्नि से देह को त्यागकर ( जलाकर ) वह उस दुर्लभ हरिपद में लीन हो गयी, जहाँ से लौटना नहीं होता। तुलसीदास जी कहते हैं कि अनेकों प्रकार के कर्म, अधर्म और बहुत-से मत – ये सब शोकप्रद हैं ; हे मनुष्यों ! इनका त्याग कर दो और विश्वास करके श्रीरामजी के चरणों में प्रेम करो। 

दो० — जाति हीन अघ जन्म महि मुक्त कीन्हि असि नारि ।
महामंद मन सुख चहसि ऐसे प्रभुहि बिसारि ।। 36 ।।

अर्थात् :- जो नीच जाति की और पापों की जन्मभूमि थी, ऐसी स्त्री को भी जिन्होंने मुक्त कर दिया, अरे महादुर्बुद्धि मन ! तू ऐसे प्रभु को भूलकर सुख चाहता है ?

चले राम त्यागा बन सोऊ। अतुलित बल नर केहरि दोऊ ।।
बिरही इव प्रभु करत बिषादा। कहत कथा अनेक संबादा ।।

अर्थात् :- श्रीरामचन्द्रजी ने उस वन को भी छोड़ दिया और वे आगे चले। दोनों भाई अतुलनीय बलवान् और मनुष्यों में सिंह के समान हैं। प्रभु विरह की तरह विषाद करते हुए अनेकों कथाएँ और संवाद कहते हैं। 

लछिमन देखु बिपिन कइ सोभा। देखत केहि कर मन नहिं छोभा ।।
नारि सहित सब खग मृग बृंदा। मानहुँ मोरि करत हहिं निंदा ।।

अर्थात् :- हे लक्ष्मण ! जरा वन की शोभा तो देखो। इसे देखकर किसका मन क्षुब्ध नहीं होगा ? पक्षी और पशुओं के समूह सभी स्त्री सहित हैं। मानो वे मेरी निन्दा कर रहे हैं। 

हमहि देखि मृग निकर पराहीं। मृगीं कहहिं तुम्ह कहँ भय नाहीं ।।
तुम्ह आनंद करहु मृग जाए। कंचन मृग खोजन ए आए ।।

अर्थात् :- हमें देखकर [ जब डर के मारे ] हिरनों के झुंड भागने लगते हैं, तब हिरनियाँ उनसे कहती हैं – तुमको भय नहीं है। तुम तो साधारण हिरनों से पैदा हुए हो, अतः तुम आनन्द करो। ये तो सोने का हिरन खोजने आये हैं। 

संग लाइ करिनीं करि लेहीं। मानहुँ मोहि सिखावनु देहीं ।।
सास्त्र सुचिंतित पुनि पुनि देखिअ। भूप सुसेवित बस नहिं लेखिअ ।।

अर्थात् :- हाथी हथिनियों को साथ लगा लेते हैं। वे मानो मुझे शिक्षा देते हैं [ कि स्त्री को कभी अकेली नहीं छोड़ना चाहिये ]। भलीभाँति चिन्तन किये हुए शास्त्र को भी बार-बार देखते रहना चाहिये। अच्छी तरह सेवा किये हुए भी राजा को वश में नहीं समझना चाहिये।  

राखिअ नारि जदपि उर माहीं। जुबती सास्त्र नृपति बस नाहीं ।।
देखहु तात बसंत सुहावा। प्रिया हीन मोहि भय उपजावा ।।

अर्थात् :- और स्त्री को चाहे हृदय में ही क्यों न रखा जाय ; परन्तु युवती स्त्री, शास्त्र और राजा किसी के वश में नहीं रहते। हे तात ! इस सुन्दर वसन्त को तो देखो। प्रिया के बिना मुझको यह भय उत्पन्न कर रहा है। 

दो० — बिरह बिकल बलहीन मोहि जानेसि निपट अकेल ।
सहित बिपिन मधुकर खग मदन कीन्ह बगमेल ।। 37 ( क ) ।।

अर्थात् :- मुझे विरह से व्याकुल, बलहीन और बिलकुल अकेला जानकर कामदेव ने वन, भौंरों और पक्षियों को साथ लेकर मुझपर धावा बोल दिया। 

देखि गयउ भ्राता सहित तासु दूत सुनि बात ।
डेरा कीन्हेउ मनहुँ तब कटकु हटकि मनजात ।। 37 ( ख ) ।।

अर्थात् :- परन्तु जब उसका दूत यह देख गया कि मैं भाई के साथ हूँ ( अकेला नहीं हूँ ), तब उसकी बात सुनकर कामदेव ने मानो सेना को रोककर डेरा डाल दिया है। 

बिटप बिसाल लता अरुझानी। बिबिध बितान दिए जनु तानी ।।
कदलि ताल बर धुजा पताका। देखि न मोह धीर मन जाका ।।

अर्थात् :- विशाल वृक्षों में लताएँ उलझी हुई ऐसी मालूम होती हैं मानो नाना प्रकार के तंबू तान दिये गये हैं। केला और ताड़ सुन्दर ध्वजा-पताका के समान हैं। इन्हें देखकर वही नहीं मोहित होता, जिसका मन धीर है। 

बिबिध भाँति फूले तरु नाना। जनु बानैत बने बहु बाना ।।
कहुँ कहुँ सुंदर बिटप सुहाए। जनु भट बिलग बिलग होइ छाए ।।

अर्थात् :- अनेकों वृक्ष नाना प्रकार से फूले हुए हैं। मानो अलग-अलग बाना ( वर्दी ) धारण किये हुए बहुत-से तीरंदाज हों। कहीं-कहीं सुन्दर वृक्ष शोभा दे रहे हैं। मानो योद्धालोग अलग-अलग होकर छावनी डाले हों। 

कूजत पिक मानहुँ गज माते। ढेक महोख ऊँट बिसराते ।।
मोर चकोर कीर बर बाजी। पारावत मराल सब ताजी ।।

अर्थात् :- कोयलें कूज रही हैं, वही मानो मतवाले हाथी [ चिग्घाड़ रहे ] हैं। ढेक और महोख पक्षी मानो ऊँट और खच्चर हैं। मोर, चकोर, तोते, कबूतर और हंस मानो सब सुन्दर ताज़ी ( अरबी ) घोड़े हैं।  

तीतिर लावक पदचर जूथा। बरनि न जाइ मनोज बरूथा ।।
रथ गिरि सिला दुंदुभीं झरना। चातक बंदी गुन गन बरना ।।

अर्थात् :- तीतर और बटेर पैदल सिपाहियों के झुंड हैं। कामदेव की सेना का वर्णन नहीं हो सकता। पर्वतों की शिलाएँ रथ और जल के झरने नगाड़े हैं। पपीहे भाट हैं, जो गुणसमूह ( विरदावली ) का वर्णन करते हैं। 

मधुकर मुखर भेरि सहनाई। त्रिबिध बयारि बसीठीं आई ।।
चतुरंगिनी सेन सँग लीन्हें। बिचरत सबहि चुनौती दीन्हें ।।

अर्थात् :- भौरों की गुंजार भेरी और शहनाई है। शीतल, मन्द और सुगन्धित हवा मानो दूत का काम लेकर आयी है। इस प्रकार चतुरङ्गिणी सेना साथ लिये कामदेव मानो सबको चुनौती देता हुआ विचर रहा है। 

लछिमन देखत काम अनीका। रहहिं धीर तिन्ह कै जग लीका ।।
एहि कें एक परम बल नारी। तेहि तें उबर सुभट सोइ भारी ।।

अर्थात् :- हे लक्ष्मण ! कामदेव की इस सेना को देखकर जो धीर बने रहते हैं, जगत् में उन्हीं की [ वीरों में ] प्रतिष्ठा होती है। इस कामदेव के एक स्त्री का बड़ा भारी बल है। उससे जो बच जाय, वही श्रेष्ठ योद्धा है। 

दो० — तात तीनि अति प्रबल खल काम क्रोध अरु लोभ ।
मुनि बिग्यान धाम मन करहिं निमिष महुँ छोभ ।। 38 ( क ) ।।

अर्थात् :- हे तात ! काम, क्रोध और लोभ – ये तीन अत्यन्त प्रबल दुष्ट हैं। ये विज्ञान के धाम मुनियों के भी मनों को पलभर में क्षुब्ध कर देते हैं। 

लोभ कें इच्छा दंभ बल काम कें केवल नारि ।
क्रोध कें परुष बचन बल मुनिबर कहहिं बिचारि ।। 38 ( ख ) ।।

अर्थात् :- लोभ की इच्छा और दम्भ का बल है, काम को केवल स्त्री का बल है और क्रोध को कठोर वचनों का बल है ; श्रेष्ठ मुनि विचारकर ऐसा कहते हैं।

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