Sharad Ritu Varnan / शरद् ऋतु वर्णन

श्रीरामचरितमानस किष्किन्धाकाण्ड

Sharad Ritu Varnan
शरद् ऋतु वर्णन

Sharad Ritu Varnan, शरद् ऋतु वर्णन :- अगस्त्य के तारे उदय होकर मार्ग के जल को सोख लिया, जैसे सन्तोष लोभ को सोख लेता है। नदियों और तालाबों का निर्मल जल ऐसी शोभा पा रहा है जैसे मद और मोह से रहित संतों का हृदय ! चकोरों के समुदाय चन्द्रमा को देखकर इस प्रकार टकटकी लगाये हैं जैसे भगवद्भक्त भगवान् को पाकर उनके [ निर्निमेष नेत्रों से ] दर्शन करते हैं। मच्छर और डाँस जाड़े के डर से इस प्रकार नष्ट हो गये जैसे ब्राह्मण के साथ वैर करने से कुल का नाश हो जाता है।    

बरषा बिगत सरद रितु आई। लछिमन देखहु परम सुहाई ।।
फूलें कास सकल महि छाई। जनु बरषाँ कृत प्रगट बुढ़ाई ।।

अर्थात् :- हे लक्ष्मण ! देखो, वर्षा बीत गयी और परम सुन्दर शरद्-ऋतु आ गयी। फूले हुए कास से सारी पृथ्वी छा गयी। मानो वर्षा-ऋतु ने [ कासरूपी सफ़ेद बालों के रूप में ] अपना बुढ़ापा प्रकट किया है।  

उदित अगस्ति पंथ जल सोषा। जिमि लोभहि सोषइ संतोषा ।।
सरिता सर निर्मल जल सोहा। संत हृदय जस गत मद मोहा ।।

अर्थात् :- अगस्त्य के तारे उदय होकर मार्ग के जल को सोख लिया, जैसे सन्तोष लोभ को सोख लेता है। नदियों और तालाबों का निर्मल जल ऐसी शोभा पा रहा है जैसे मद और मोह से रहित संतों का हृदय !

रस रस सूख सरित सर पानी। ममता त्याग करहिं जिमि ग्यानी ।।
जानि सरद रितु खंजन आए। पाइ समय जिमि सुकृत सुहाए ।।

अर्थात् :- नदी और तालाबों का जल धीरे-धीरे सूख रहा है। जैसे ज्ञानी ( विवेकी ) पुरुष ममता का त्याग करते हैं। शरद्-ऋतु जानकर खंजन पक्षी आ गये। जैसे समय पाकर सुन्दर सुकृत आ जाते हैं ( पुण्य प्रकट हो जाते हैं )। 

पंक न रेनु सोह असि धरनी। नीति निपुन नृप कै जसि करनी ।।
जल संकोच बिकल भइँ मीना। अबुध कुटुंबी जिमि धनहीना ।।

अर्थात् :-  न कीचड़ है, न धूल ; इससे धरती [ निर्मल होकर ] ऐसी शोभा दे रही है जैसे नीतिनिपुण राजा की करनी ! जल के कम हो जाने से मछलियाँ व्याकुल हो रही हैं, जैसे मूर्ख ( विवेकशून्य ) कुटुम्बी ( गृहस्थ ) धन के बिना व्याकुल होता है। 

बिनु घन निर्मल सोह अकासा। हरिजन इव परिहरि सब आसा ।।
कहुँ कहुँ बृष्टि सारदी थोरी। कोउ एक पाव भगति जिमि मोरी ।।

अर्थात् :- बिना बादलों का निर्मल आकाश ऐसा शोभित हो रहा है जैसे भगवद्भक्त सब आशाओं को छोड़कर सुशोभित होते हैं। कहीं-कहीं ( विरले ही स्थानों में ) शरद्-ऋतु की थोड़ी-थोड़ी वर्षा हो रही है। जैसे कोई विरले ही मेरी भक्ति पाते हैं।  

दो० — चले हरषि तजि नगर नृप तापस बनिक भिखारि ।
जिमि हरिभगति पाइ श्रम तजहिं आश्रमी चारि ।। 16 ।।

अर्थात् :- [ शरद्-ऋतु पाकर ] राजा, तपस्वी, व्यापारी और भिखारी [ क्रमशः विजय, तप, व्यापर और भिक्षा के लिये ] हर्षित होकर नगर छोड़कर चले। जैसे श्रीहरि की भक्ति पाकर चारों आश्रम वाले [ नाना प्रकार के साधनरूपी ] श्रमों को त्याग देते हैं।  

सुखी मीन जे नीर अगाधा। जिमि हरि सरन न एकउ बाधा ।।
फूलें कमल सोह सर कैसा। निर्गुन ब्रह्म सगुन भएँ जैसा ।।

अर्थात् :- जो मछलियाँ अथाह जल में हैं, वे सुखी हैं, जैसे श्रीहरि के शरण में चले जाने पर एक भी बाधा नहीं रहती। कमलों के फूलने से तालाब कैसी शोभा दे रहा है, जैसे निर्गुण ब्रह्म सगुण होने पर शोभित होता है। 

गुंजत मधुकर मुखर अनूपा। सुंदर खग रव नाना रूपा ।।
चक्रबाक मन दुख निसि पेखी। जिमि दुर्जन पर संपति देखी ।।

अर्थात् :- भौंरे अनुपम शब्द करते हुए गूँज रहे हैं, तथा पक्षियों के नाना प्रकार के सुन्दर शब्द हो रहे हैं। रात्रि देखकर चकवे के मन में वैसे ही दुःख हो रहा है, जैसे दूसरे की सम्पत्ति देखकर दुष्ट को होता है। 

चातक रटत तृषा अति ओही। जिमि सुख लहइ न संकरद्रोही ।।
सरदातप निसि ससि अपहरई। संत दरस जिमि पातक टरई ।।

अर्थात् :- पपीहा रट लगाये है, उसको बड़ी प्यास है, जैसे श्रीशङ्करजी का द्रोही सुख नहीं पाता ( सुख के लिये झीखता रहता है )। शरद्-ऋतु के ताप को रात के समय चन्द्रमा हर लेता है, जैसे संतों के दर्शन से पाप दूर हो जाते हैं।  

देखि इंदु चकोर समुदाई। चितवहिं जिमि हरिजन हरि पाई ।।
मसक दंस बीते हिम त्रासा। जिमि द्विज द्रोह किएँ कुल नासा ।।

अर्थात् :- चकोरों के समुदाय चन्द्रमा को देखकर इस प्रकार टकटकी लगाये हैं जैसे भगवद्भक्त भगवान् को पाकर उनके [ निर्निमेष नेत्रों से ] दर्शन करते हैं। मच्छर और डाँस जाड़े के डर से इस प्रकार नष्ट हो गये जैसे ब्राह्मण के साथ वैर करने से कुल का नाश हो जाता है।  

दो० — भूमि जीव संकुल रहे गए सरद रितु पाइ ।
सदगुर मिलें जाहिं जिमि संसय भ्रम समुदाइ ।। 17 ।।

अर्थात् :- [ वर्षा-ऋतु के कारण ] पृथ्वी पर जो जीव भर गये थे, वे शरद्-ऋतु को पाकर वैसे ही नष्ट हो गये जैसे सद्गुरु के मिल जाने पर सन्देह और भ्रम के समूह नष्ट हो जाते हैं।  

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