Shastr Viprit Aachranon Ko Tyagne / शास्त्र विपरीत आचरणों

Shastr Viprit Aachranon Ko Tyagne Aur Shastranukul Aachranon Ke Liye Prerna
शास्त्र विपरीत आचरणों को त्यागने और शास्त्रानुकूल आचरणों के लिये प्रेरणा

Shastr Viprit Aachranon Ko Tyagne Aur Shastranukul Aachranon Ke Liye Prerna, शास्त्र विपरीत आचरणों को त्यागने और शास्त्रानुकूल आचरणों के लिये प्रेरणा- इस नरक के तीन द्वार हैं — काम, क्रोध तथा लोभ। प्रत्येक बुद्धिमान व्यक्ति को चाहिए कि इन्हें त्याग दे, क्योंकि इनसे आत्मा का पतन होता है। हे कुन्तीपुत्र ! जो व्यक्ति इन तीनों नरक-द्वारों से बच पाता है, वह आत्म-साक्षात्कार के लिए कल्याणकारी कार्य करता है और इस प्रकार क्रमशः परम गति को प्राप्त होता है। 

श्लोक 21 से 24

त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः ।
कामः क्रोधस्तथा लाेभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत् ।। 21 ।।

त्रि-विधम् — तीन प्रकार का ; नरकस्य — नरक का ; इदम् — यह ; द्वारम् — द्वार ; नाशनम् — विनाशकारी ; आत्मनः — आत्मा का ; कामः — काम ; क्रोधः — क्रोध ; तथा — और ; लोभः — लोभ ; तस्मात् — अतएव ; एतत् — इन ; त्रयम् — तीनों को ; त्यजेत् — त्याग देना चाहिए ।

तात्पर्य — इस नरक के तीन द्वार हैं — काम, क्रोध तथा लोभ। प्रत्येक बुद्धिमान व्यक्ति को चाहिए कि इन्हें त्याग दे, क्योंकि इनसे आत्मा का पतन होता है ।

एतैर्विमुक्तः कौन्तेय तमोद्वारे स्त्रिभिर्नरः
आचरत्यात्मनः श्रेयस्ततो याति परां गतिम् ।। 22 ।।

एतैः — इनसे ; विमुक्तः — मुक्त होकर ; कौन्तेय — हे कुन्तीपुत्र ; तमः-द्वारैः — अज्ञान के द्वारों से ; त्रिभिः — तीन प्रकार के ; नरः — व्यक्ति ; आचरति — करता है ; आत्मनः — अपने लिए ; श्रेयः — मंगल, कल्याण ; ततः — तत्पश्चात् ; याति — जाता है ; पराम् — परम ; गतिम् — गन्तव्य को। 

तात्पर्य — हे कुन्तीपुत्र ! जो व्यक्ति इन तीनों नरक-द्वारों से बच पाता है, वह आत्म-साक्षात्कार के लिए कल्याणकारी कार्य करता है और इस प्रकार क्रमशः परम गति को प्राप्त होता है ।

इसे भी पढ़ें —

  1. अध्याय पन्द्रह — पुरुषोत्तम योग
  2. अध्याय सोलह — दैवी तथा आसुरी स्वभाव
  3. अध्याय सत्रह — श्रद्धा के विभाग

यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः ।
न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम् ।। 23 ।।

यः — जो ; शास्त्र-विधिम् — शास्त्रों की विधियों को ; उत्सृज्य — त्याग कर ; वर्तते — करता रहता है ; काम-कारतः — काम के वशीभूत होकर मनमाने ढंग से कार्य करता है, उसे न तो सिद्धि, न सुख, न ही परमगति की प्राप्ति हो पाती है।

तात्पर्य — जो शास्त्रों के आदेशों की अवहेलना करता है और मनमाने ढंग से कार्य करता है, उसे न तो सिद्धि, न सुख, न ही परमगति की प्राप्ति हो पाती है।

तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ
ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि ।। 24 ।।

तस्मात् — इसलिए ; शास्त्रम् — शास्त्र ; प्रमाणम् — प्रमाण ; ते — तुम्हारा ; कार्य — कर्तव्य ; अकार्य — निषिद्ध कर्म ; व्यवस्थितौ — निश्चित करने में ; ज्ञात्वा — जानकर ; शास्त्र — शास्त्र का ; विधान — विधान ; उक्तम् — कहा गया ; कर्म — कर्म ; कर्तुम् — करना ; इह — इस संसार में ; अर्हसि — तुम्हें चाहिए ।

तात्पर्य — अतएव मनुष्य को यह जानना चाहिए कि शास्त्रों के विधान के अनुसार क्या कर्तव्य है और क्या अकर्तव्य है। उसे ऐसे विधि-विधानों को जानकर कर्म करना चाहिए, जिससे वह क्रमशः ऊपर उठ सके ।

आगे के श्लोक :–

इस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीता के सोलहवें अध्याय ” दैवी तथा आसुरी स्वभाव ” का भक्तिवेदान्त तात्पर्य पूर्ण हुआ ।

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