Sheetala Ashtami Vrat Katha / शीतला अष्टमी व्रत कथा

Sheetala Ashtami Vrat Katha Aur Puja Vidhi
शीतला अष्टमी व्रत कथा और पूजा विधि


Sheetala Ashtami Vrat Katha Aur Puja Vidhi, शीतला अष्टमी व्रत कथा और पूजा विधि :- शीतला अष्टमी हिन्दुओं का त्यौहार है जिसमें माँ शीतला की पुरे विधि-विधान से पूजन एवं व्रत होता है। माता शीतला की पूजा वैशाख कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को होती है परन्तु कुछ स्थानों पर इनकी पूजा होली के बाद पड़ने वाले पहले सोमवार अथवा गुरुवार के दिन ही की जाती है। भगवती शीतला की पूजा का विधान भी विशिष्ट होता है। देवी शीतला को बासी पदार्थ अत्यन्त प्रिय हैं इनकी पूजा के एक दिन पूर्व उन्हें भोग लगाने के लिए बासी खाने का भोग या बसौड़ा तैयार किया जाता है। अष्टमी के दिन देवी को बासी पदार्थ नैवेद्य के रूप में समर्पित किया जाता है और भक्तों के बीच प्रसाद को वितरित किया जाता है। इसके कारण से सम्पूर्ण उत्तर भारत में शीतला अष्टमी त्यौहार को बसौड़ा भी कहा जाता है जो अत्यन्त विख्यात है।

शीतला अष्टमी व्रत पूजा विधि महत्त्व :-

शीतला अष्टमी के दिन प्रातःकाल स्नान आदि नित्यक्रिया करने के उपरान्त माता शीतला को एक दिन पूर्व तैयार किया माता को अतिप्रिय बासी भोजन नैवैद्य आदि अर्पित किया जाता है। माता को सफाई अत्यन्त लोकप्रिय है इसलिए सब कुछ साफ सुथरा होना अति आवश्यक है। स्नान करने के बाद माता की पूजन व्रत लें।

शीतला अष्टमी व्रत कथा :-

कथा के अनुसार एक बार शीतला अष्टमी के दिन एक बूढ़ी औरत और उनकी दो बहुओं ने व्रत रखा। उस दिन सभी को बासी भोजन ग्रहण करना था जिसके लिए एक दिन पूर्व ही भोजन पका लिया गया था। दोनों बहुओं को कुछ समय पूर्व ही संतान की प्राप्ति हुई थी। दोनों बहुओं ने सोचा की अभी कुछ समय पूर्व ही हमने संतान की प्राप्ति हुई है अगर बासी भोजन खायेंगे तो संतान बीमार न हो जाए। ऐसा सोच कर उन दोनों बहुओं ने उस बूढ़ी औरत के साथ माता की पूजा करने के बाद बासी भोजन करने के जगह पशुओं के लिए बनाए गये चूल्हे पर रोट बनाकर उसका चूरमा बनाकर खा लिया। जब बूढ़ी औरत ने अपने बहुओं को माता का प्रसाद खाने को कहा तो उन्होंने बहाना बना दिया। उनके इस कृत्य से माता कुपित हो गई और उन दोनों के नवजात शिशु मृत मिलें।

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