Shiv Ji Ki Vrat Katha / शिव जी की व्रत कथा

Shiv Ji Ki Vrat Katha Aur Puja Vidhi
शिव जी की व्रत कथा और पूजा विधि


Shiv Ji Ki Vrat Katha Aur Puja Vidhi, शिव जी की व्रत कथा और पूजा विधि :- श्रावण मास के समस्त सोमवारों के दिन यह व्रत मनाया जाता है। प्रत्येक सोमवार को गणेश, शिव, पार्वती तथा नन्दी की पूजा की जाती है। जल, दूध, शहद, घी चीनी, जनेऊ, रोली, बेल-पत्र, भाँग, धतूरा, धूप, दीप और दक्षिणा से भगवान् पशुपति का पूजन करना चाहिये। कपूर से आरती करके रात्रि में जागरण करें। सोलह सोमवार व्रत कथा माहात्म्य सुनना चाहिये। यह व्रत रहने वाले तथा गुणगान करने वाले पर भगवान् शिव अपनी कृपा-छाया सदा रखते हैं।

शिव जी की पूजा विधि :-

सोमवार के दिन भगवान शिव की पूजा के दौरान उनकी प्रिय चीजों को सम्मलित करें। भगवान् शिव अपने भक्तों की पूजा से बहुत जल्द प्रसन्न होते हैं और शुभ फल प्रदान करते हैं। कुमारी कन्या भगवान् शंकर की पूजा करें तो उन्हें मनवांछित सुयोग्य वर की प्राप्ति होगी। प्रत्येक सोमवार को गणेश, शिव, पार्वती तथा नन्दी की पूजा की जाती है। जल, दूध, शहद, घी चीनी, जनेऊ, रोली, बेल-पत्र, भाँग, धतूरा, धूप, दीप और दक्षिणा से भगवान् पशुपति का पूजन करना चाहिये। कपूर से आरती करके रात्रि में जागरण करें। सोलह सोमवार व्रत कथा का माहात्म्य सुनना चाहिये। यह व्रत रहने वाले तथा गुणगान करने वाले पर भगवान् शिव अपनी कृपा-छाया सदा रखते हैं।

महामृत्युंजय मन्त्र का जप करें :-

सोमवार को भगवान् शिव की पूजा के साथ 108 बार महामृत्युंजय मन्त्र का जप बहुत ही शुभ माना गया है। सोमवार को महामृत्युंजय मन्त्र का जाप कम से कम 108 बार करना चाहिए। महामृत्युंजय मन्त्र का जप मन को शांति प्रदान करता है और सुख-समृद्धि में वृद्धि करता है। ॐ नमः शिवाय मन्त्र का जप 108 बार करने से विशेष फल की प्राप्ति होती है।

शिव जी की व्रत कथा :-

प्राचीन काल की बात है। किसी नगर में एक साहूकार रहता था। उसके घर में धन की कोई कमी नहीं थी लेकिन उसकी कोई संतान नहीं थी इस कारण वह बहुत दुखी था। पुत्र प्राप्ति के लिए वह प्रत्येक सोमवार व्रत रखता था और पूरी श्रद्धा के साथ शिव मंदिर जाकर भगवान शिव और पार्वती जी की पूजा करता था।

उसकी भक्ति देखकर एक दिन माँ पार्वती प्रसन्न हो गईं और भगवान शिव से उस साहूकार की मनोकामना पूर्ण करने का आग्रह किया। पार्वती जी की इच्छा अनुसार भगवान् शिव ने कहा कि ‘ हे पार्वती , इस संसार में हर प्राणी को उसके कर्मों का फल मिलता है और जिसके भाग्य में जो हो उसे भोगना ही पड़ता है लेकिन पार्वती जी ने साहूकार की भक्ति का मान रखने के लिए उसकी मनोकामना पूर्ण करने की इच्छा जताई।

माता पार्वती के आग्रह पर शिवजी ने साहूकार को पुत्र प्राप्ति का वरदान दिया परन्तु उसकी आयु 12 वर्ष ही रहेगी ऐसा कहा। उसे न तो इसे खोने का भय था और न ही कुछ पाने का।

कुछ समय बाद साहूकार के घर एक पुत्र का जन्म हुआ। जब वह बालक ग्यारह वर्ष का हुआ तो उसे पढ़ने के लिए काशी भेज दिया गया। साहूकार ने पुत्र के मामा को बुलाकर उसे बहुत सारा धन दिया और कहा कि तुम इस बालक को काशी विद्या प्राप्ति के लिए जाओ और मार्ग में यज्ञ करना। जहाँ भी यज्ञ कराओ वहां ब्राह्मणों को भोजन कराते और दक्षिणा देते हुए जाना।

दोनों मामा-भांजे इसी तरह यज्ञ कराते और ब्राह्मणों को दान दक्षिणा देते काशी की ओर चल दिया। साहूकार ने पुत्र के मामा को बुलाकर उसे बहुत सारा धन दिया काशी की ओर चल पड़ा।

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