Shiv Mahima Aur Stuti / शिव महिमा और स्तुति

Shiv Mahima Aur Stuti
शिव महिमा और स्तुति

Shiv Mahima Aur Stuti, शिव महिमा और स्तुति :- वह परमात्मा हाथ-पैरों से रहित होकर भी समस्त वस्तुओं को ग्रहण करने वाला ( तथा ) वेगपूर्वक सर्वत्र गमन करने वाला है, आँखों के बिना ही वह सब कुछ देखता है ( और ) कानों के बिना ही सब कुछ सुनता है, वह जो कुछ भी जानने में आने वाली वस्तुएँ हैं उन सबको जानता है परंतु उसको जानने वाला ( कोई ) नहीं है, ( ज्ञानी पुरुष ) उसे महान् आदि पुरुष कहते हैं। श्रद्धा और भक्ति के भाव से प्राप्त होने योग्य, आश्रय रहित कहे जाने वाले ( तथा ) जगत् की उत्पत्ति और संहार करने वाले, कल्याण स्वरूप ( तथा ) सोलह कलाओं की रचना करने वाले परमदेव परमेश्वर को जो साधक जान लेते हैं, वे शरीर को ( सदा के लिये ) त्याग देते हैं — जन्म-मृत्यु के चक्कर से छूट जाते हैं।

एको हि रुद्रो न द्वितीयाय तस्थुर्य इमाँल्लोकानीशत ईशनीभिः ।
प्रत्यङ् जनांस्तिष्ठति संचुकोचान्तकाले संसृज्य विश्वा भुवनानि गोपाः ।।

अर्थात् :- जो अपनी स्वरुपभूत विविध शासन-शक्तियों द्वारा इन सब लोकों पर शासन करता है, वह रुद्र एक ही है, ( इसीलिये विद्वान् पुरुषों ने जगत् के कारण का निश्चय करते समय ) दूसरे का आश्रय नहीं लिया, वह परमात्मा समस्त जीवों के भीतर स्थित हो रहा है। सम्पूर्ण लोकों की रचना करके उनकी रक्षा करने वाला परमेश्वर, प्रलयकाल में इन सबको समेट लेता है।

यो देवानां प्रभवश्चोद्भवश्च विश्वाधिपो रुद्रो महर्षिः।
हिरण्यगर्भं जनयामास पूर्वं स नो बुद्धया शुभया संयुनक्तु ।।

अर्थात् :- जो रूद्र इन्द्रादि देवताओं की उत्पत्ति का हेतु और वृद्धि का हेतु है तथा ( जो ) सबका अधिपति ( और ) महान् ज्ञानी ( सर्वज्ञ ) है, ( जिसने ) पहले हिरण्यगर्भ को उत्पन्न किया था, वह परमदेव परमेश्वर हमलोगों को शुभ बुद्धि से संयुक्त करे।

या ते रुद्र शिवा तनूरघोरापापकाशिनी ।
तया नस्तनुवा शन्तमया गिरिशन्ताभिचाकशीहि ।।

अर्थात् :- हे रुद्रदेव ! तेरी जो भयानकता से शून्य ( सौम्य ) पुण्य से प्रकाशित होनेवाली ( तथा ) कल्याणमयी मूर्ति है, हे पर्वत पर रहकर सुख का विस्तार करने वाले शिव ! उस परम शान्त मूर्ति से ( तू कृपा करके ) हमलोगों को देख।

ततः परं ब्रह्मपरं बृहन्तं
यथानिकायं सर्वभूतेषु गूढम् ।
विश्वस्यैकं परिवेष्टितार-
मीशं तं ज्ञात्वामृता भवन्ति ।।

अर्थात् :- पूर्वोक्त जीव-समुदाय रूप जगत् के परे ( और ) हिरण्यगर्भ रूप ब्रह्मा से भी श्रेष्ठ, समस्त प्राणियों में उनके शरीरों के अनुरूप होकर छिपे हुए ( और ) सम्पूर्ण विश्व को सब ओर से घेरे हुए उस महान् सर्वत्र व्यापक एकमात्र देव परमेश्वर को जानकर ( ज्ञानीजन ) अमर हो जाते हैं।

सर्वाननशिरोग्रीवः सर्वभूतगुहाशयः ।
सर्वव्यापी स भगवांस्तस्मात् सर्वगतः शिवः ।।

अर्थात् :- वह भगवान् सब ओर मुख, सिर और ग्रीवावला है। समस्त प्राणियों के ह्रदय रूप गुफा में निवास करता है ( और ) सर्वव्यापी है, इसलिये वह कल्याण स्वरुप परमेश्वर सब जगह पहुँचा हुआ है।

महान् प्रभुर्वै पुरुषः सत्त्वस्यैष प्रवर्तकः ।
सुनिर्मलामिमां प्राप्तिमीशानो ज्योतिरव्ययः ।।

अर्थात् :- निश्चय ही यह महान् समर्थ, सब पर शासन करने वाला, अविनाशी ( एवं ) प्रकाश स्वरूप परमपुरुष पुरुषोत्तम अपनी प्राप्ति रूप इस अत्यन्त निर्मल लाभ की ओर अन्तःकरण को प्रेरित करने वाला है।

पुरुष एवेद्ँ सर्वं यद्भूतं यच्च भव्यम् ।
उतामृतत्वस्येशानो यदन्नेनातिरोहति ।।

अर्थात् :- जो अबसे पहले हो चुका है, जो भविष्य में होने वाला है और जो खाद्य पदार्थों से इस समय बढ़ रहा है, यह समस्त जगत् परम पुरुष परमात्मा ही है और ( वही ) अमृत स्वरुप मोक्ष का स्वामी है।

सर्वतः पाणिपदं तत् सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् ।
सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ।।

अर्थात् :- वह परम पुरुष परमात्मा सब जगह हाथ-पैरवाला, सब जगह आँख, सिर और मुखवाला ( तथा ) सब जगह कानोंवाला है, ( वही ) ब्रह्माण्ड में सबको सब ओर से घेरकर स्थित है।

सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम् ।
सर्वस्य प्रभुमीशानं सर्वस्य शरणं बृहत् ।।

अर्थात् :- ( जो परम पुरुष परमात्मा ) समस्त इन्द्रियों से रहित होने पर भी समस्त इन्द्रियों के विषयों को जानने वाला है ( तथा ) सबका स्वामी, सबका शासक ( और ) सबसे बड़ा आश्रय है।

अपाणिपादो जवनो ग्रहीता पश्यत्यचक्षुः स शृणोत्यकर्णः ।
स वेत्ति वेद्यं न च तस्यास्ति वेत्ता तमाहुरग्रयं पुरुषं महान्तम् ।।

अर्थात् :- वह परमात्मा हाथ-पैरों से रहित होकर भी समस्त वस्तुओं को ग्रहण करने वाला ( तथा ) वेगपूर्वक सर्वत्र गमन करने वाला है, आँखों के बिना ही वह सब कुछ देखता है ( और ) कानों के बिना ही सब कुछ सुनता है, वह जो कुछ भी जानने में आने वाली वस्तुएँ हैं उन सबको जानता है परंतु उसको जानने वाला ( कोई ) नहीं है, ( ज्ञानी पुरुष ) उसे महान् आदि पुरुष कहते हैं।

अणोरणीयान् महतो महीया-
नात्मा गुहायां निहितोऽस्य जन्तोः ।
तमक्रतुं पश्यति वीतशोको
धातुः प्रसादान्महिमानमीशम् ।।

अर्थात् :- ( वह ) सूक्ष्म से भी अति सूक्ष्म ( तथा ) बड़े से भी बहुत बड़ा परमात्मा इस जीव की हृदय रूप गुफा में छिपा हुआ है, सबकी रचना करने वाले परमेश्वर की कृपा से ( जो मनुष्य ) उस संकल्प रहित परमेश्वर को ( और ) उसकी महिमा को देख लेता है ( वह ) सब प्रकार के दुःखों से रहित ( हो जाता है )।

मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम् ।
तस्यावयवभूतैस्तु व्याप्तं सर्वमिदं जगत् ।।

अर्थात् :- माया तो प्रकृति को समझना चाहिये और मायापति महेश्वर को समझना चाहिये, उसी के अंगभूत कारण-कार्य-समुदाय से यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त हो रहा है।

यो योनिं योनिमधितिष्ठत्येको
यस्मिन्निदं सं च वि चैति सर्वम् ।
तमीशानं वरदं देवमीड्यं
निचाय्येमां शान्तिमत्यन्तमेति ।।

अर्थात् :- जो अकेला ही प्रत्येक योनि का अधिष्ठाता हो रहा है, जिसमें यह समस्त जगत् प्रलय काल में विलीन हो जाता है और सृष्टिकाल में विविध रूपों में प्रकट भी हो जाता है, उस सर्वनियन्ता वरदायक स्तुति करने योग्य परमदेव परमेश्वर को तत्त्व से जानकर ( मनुष्य ) निरन्तर बनी रहने वाली इस ( मुक्ति रूप ) परम शान्ति को प्राप्त हो जाता है।

यो देवानां प्रभवश्चोद्भवश्च
विश्वाधिपो रुद्रो महर्षिः ।
हिरण्यगर्भं पश्यत जायमानं
स नो बुद्ध्या शुभया संयुनक्तु ।।

अर्थात् :- जो रुद्र इन्द्रादि देवताओं को उत्पन्न करने वाला और बढ़ाने वाला है तथा ( जो ) सबका अधिपति ( और ) महान् ज्ञानी ( सर्वज्ञ ) है ( जिसने सबसे पहले ) उत्पन्न हुए हिरण्यगर्भ को देखा था वह परमदेव परमेश्वर हमलोगों को शुभ बुद्धि से संयुक्त करे।

सूक्ष्मातिसूक्ष्मं कलिलस्य मध्ये
विश्वस्य स्त्रस्टारमनेकरूपम् ।
विश्वस्यैकं परिवेष्टितारं
ज्ञात्वा शिवं शान्तिमत्यन्तमेति ।।

अर्थात् :- ( जो ) सूक्ष्म से भी अत्यन्त सूक्ष्म हृदय गुहारूप गुह्यस्थान के भीतर स्थित, अखिल विश्व की रचना करने वाला, अनेक रूप धारण करने वाला ( तथा ) समस्त जगत् को सब ओर से घेर रखने वाला है ( उस ) एक ( अद्वितीय ) कल्याण स्वरुप महेश्वर को जानकर ( मनुष्य ) सदा रहने वाली शान्ति को प्राप्त होता है।

घृतात् परं मण्डमिवातिसूक्ष्मं
ज्ञात्वा शिवं सर्वभूतेषु गूढम् ।
विश्वस्यैकं परिवेष्टितारं
ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः ।।

अर्थात् :- कल्याण स्वरूप एक ( अद्वितीय ) परमदेव को मक्खन के ऊपर रहने वाले सारभाग की भाँति अत्यन्त सूक्ष्म ( और ) समस्त प्राणियों में छिपा हुआ जानकार ( तथा ) समस्त जगत् को सब ओर से घेरकर स्थित हुआ जानकर ( मनुष्य ) समस्त बन्धनों से छूट जाता है।

यदातमस्तन्न दिवा न रात्रि-
र्न सन्न चासञ्छिव एव केवलः ।
तदक्षरं तत्सवितुर्वरेण्यं
प्रज्ञा च तस्मात् प्रसृता पुराणी ।।

अर्थात् :- जब अज्ञानमय अन्धकार का सर्वथा अभाव हो जाता है, उस समय ( अनुभव में आनेवाला तत्त्व ) न दिन है न रात है, न सत् है और न असत् है, एकमात्र विशुद्ध कल्याणमय शिव ही है वह सर्वथा अविनाशी है, वह सूर्याभिमानी देवता का भी उपास्य है तथा उसी से ( यह ) पुराना ज्ञान फैला है।

भावग्राह्यमनीडाख्यं भावाभावकरं शिवम् ।
कलासर्गकरं देवं ये विदुस्ते जहुस्तनुम् ।।

अर्थात् :- श्रद्धा और भक्ति के भाव से प्राप्त होने योग्य, आश्रय रहित कहे जाने वाले ( तथा ) जगत् की उत्पत्ति और संहार करने वाले, कल्याण स्वरूप ( तथा ) सोलह कलाओं की रचना करने वाले परमदेव परमेश्वर को जो साधक जान लेते हैं, वे शरीर को ( सदा के लिये ) त्याग देते हैं — जन्म-मृत्यु के चक्कर से छूट जाते हैं।

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