Shiv Stotra Ratnakar / शिव स्तोत्र रत्नाकर

Shiv Stotra Ratnakar
शिव स्तोत्र रत्नाकर

Shiv Stotra Ratnakar, शिव स्तोत्र रत्नाकर :-  श्रुति कहती है – ‘ सृष्टि के पूर्व न सत् ( कारण ) था, न असत् ( कार्य ); केवल एक निर्विकार शिव ही विद्यमान थे। ‘ अतः ‘ जो वस्तु सृष्टि के पूर्व हो, वही जगत् का कारण है, वही ब्रह्म है। ‘ इससे यह बात सिद्ध होती है कि ‘ ब्रह्म ‘ का ही नाम ‘ शिव ‘ है। ये शिव नित्य और अजन्मा हैं, इनका आदि और अन्त न होने से ये अनादि और अनन्त हैं। ये सभी पवित्र करने वाले पदार्थों को भी पवित्र करने वाले हैं। इस प्रकार भगवान् शिव सर्वोपरि परात्पर तत्त्व हैं अर्थात् जिनसे परे और कुछ भी नहीं है – ‘यस्मात् परं नापरमस्ति किञ्चित्।’

भगवान् शंकर के चरित्र बड़े ही उदात्त एवं अनुकम्पापूर्ण हैं। ये ज्ञान, वैराग्य तथा साधुता के परम आदर्श हैं। चन्द्र-सूर्य इनके नेत्र हैं, स्वर्ग सिर है, आकाश नाभि है, दिशाएँ कान हैं। इनके समान न कोई दाता है, न तपस्वी है, न ज्ञानी है, न त्यागी है, न वक्त है, न उपदेष्टा और न कोई ऐश्वर्यशाली ही है। ये सदा सब वस्तुओं से  परिपूर्ण हैं।

भगवान् शिव के विविध नाम हैं। उनके अनेक रूपों में उमामहेश्वर, अर्धनारीश्वर, हरिहर, मृत्युंजय, पंचवक्त्र, एकवक्त्र, पशुपति, कृत्तिवास, दक्षिणामूर्ति, योगीश्वर तथा नटराज आदि रूप बहुत प्रसिद्ध हैं। भगवान् शिव का एक विशिष्ट रूप लिंग-रूप भी है, जिनमें ज्योतिर्लिंग, स्वयंभूलिंग, नर्मदेश्वरलिंग और अन्य रत्नादि तथा धात्वादि लिंग एवं पार्थिव आदि लिंग हैं। इन सभी रूपों की स्तुति-उपासना तथा कीर्तन भक्तजन बड़ी श्रद्धा के साथ करते हैं।

भूतभावन भगवान् सदाशिव की महिमा का गान कौन कर सकता है ? किसी मनुष्य में इतनी शक्ति नहीं, जो भगवान् शंकर के गुणों का वर्णन कर सके। परम तत्त्वज्ञ भीष्मपितामह से नीति, धर्म और मोक्ष के सूक्ष्म रहस्यों को विवेचन सुनते हुए महाराज युधिष्ठिर ने जब शिव महिमा के सम्बन्ध में प्रश्न किया तो वृद्ध पितामह ने अपनी असमर्थता व्यक्त करते हुए स्पष्ट शब्दों में कहा –

‘ साक्षात् विष्णु के अवतार भगवान् श्रीकृष्ण के अतिरिक्त मनुष्य में सामर्थ्य नहीं कि वह भगवान् सदाशिव की महिमा का वर्णन कर सके।’

भीष्म पितामह के प्रार्थना करने पर भगवान् श्रीकृष्ण ने भी यही कहा –

‘ हिरण्यगर्भ, इन्द्र और महर्षि आदि भी शिव तत्त्व जानने में असमर्थ हैं, मैं उनके कुछ गुणों का ही व्याख्यान करता हूँ। ‘ ऐसी स्थिति में हम-जैसे तुच्छ जीवों के लिये तो भगवान् शिव की महिमा का वर्णन करना एक अनधिकार चेष्टा ही कही जायगी, किंतु इसका समाधान श्रीपुष्पदन्ताचार्य ने अपने शिवमहिम्नः स्तोत्र के आरम्भ में ही कर दिया है। –

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