Shraddha Aur Shastra Viprit / श्रद्धा और शास्त्र विपरीत

अध्याय सत्रह श्रद्धा के विभाग

Shraddha Aur Shastra Viprit Ghor Tap Karne Valon Ka Vishay
श्रद्धा और शास्त्र विपरीत घोर तप करने वालों का विषय

Shraddha Aur Shastra Viprit Ghor Tap Karne Valon Ka Vishay, श्रद्धा और शास्त्र विपरीत घोर तप करने वालों का विषय- भगवान् ने कहा- देहधारी जीव द्वारा अर्जित गुणों के अनुसार उसकी श्रद्धा तीन प्रकार की हो सकती है — सतोगुणी, रजोगुणी अथवा तमोगुणी । अब इसके विषय में सुनो। हे भरतपुत्र ! विभिन्न गुणों के अन्तर्गत अपने-अपने अस्तित्व के अनुसार मनुष्य एक विशेष प्रकार की श्रद्धा विकसित करता है।

श्लोक 1 से 6

अर्जुन उवाच — 
ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयान्विताः ।
तेषां निष्ठा तु का कृष्ण सत्त्वमाहो रजस्तमः ।। 1 ।।

अर्जुनः उवाच — अर्जुन ने कहा ; ये — जो ; शास्त्र-विधिम् — शास्त्रों के विधान को ; उत्सृज्य — त्यागकर ; यजन्ते — पूजा करते हैं ; श्रद्धया — पूर्ण श्रद्धा से ; अन्विताः — युक्त ; तेषाम् — उनकी ; निष्ठा — श्रद्धा ; तु — लेकिन ; का — कौनसी ; कृष्ण — हे कृष्ण ; सत्त्वम् — सतोगुणी ; आहो — अथवा अन्य ; रजः — रजोगुणी ; तमः — तमोगुणी ।

तात्पर्य — अर्जुन ने कहा — हे कृष्ण ! जो लोग शास्त्र के नियमों का पालन न करके अपनी कल्पना के अनुसार पूजा करते हैं, उनकी स्थिति कौन सी है ? वे सतोगुणी है, रजोगुणी हैं या तमोगुणी ?

श्रीभगवानुवाच — 
त्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा ।

सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चेति तां शृणु ।। 2 ।। 

श्री-भगवान् उवाच — भगवान् ने कहा ; त्रि-विधा — तीन प्रकार की ; भवति — होती है ; श्रद्धा — श्रद्धा ; दहिनाम् — देहधारियों की ; सा — वह ; स्व-भाव-जा — प्रकृति के गुण के अनुसार ; सात्त्विकी — सतोगुणी ; राजसी — रजोगुणी ; च — भी ; एव — निश्चय ही ; तामसी — तमोगुणी ; च — तथा ; इति — इस प्रकार ; ताम् — उसको ; शृणु — मुझसे सुनो ।

तात्पर्य — भगवान् ने कहा — देहधारी जीव द्वारा अर्जित गुणों के अनुसार उसकी श्रद्धा तीन प्रकार की हो सकती है — सतोगुणी, रजोगुणी अथवा तमोगुणी । अब इसके विषय में सुनो ।

सत्त्वानुरुपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत
श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः ।। 3 ।।

सत्त्व-अनुरुपा — अस्तित्त्व के अनुसार ; सर्वस्य — सबों की ; श्रद्धा — श्रद्धा, निष्ठा ; भवति — हो जाती है ; भारत — हे भरतपुत्र ; श्रद्धा — श्रद्धा ; मयः — से युक्त ; अयम् — यह ; पुरुषः — जीवात्मा ; यः — जो ; यत् — जिसके होने से ; श्रद्धः — श्रद्धा ; सः — इस प्रकार ; एव — निश्चय ही ; सः — वह ।

तात्पर्य — हे भरतपुत्र ! विभिन्न गुणों के अन्तर्गत अपने-अपने अस्तित्व के अनुसार मनुष्य एक विशेष प्रकार की श्रद्धा विकसित करता है। अपने द्वारा अर्जित गुणों के अनुसार ही जीव को विशेष श्रद्धा से युक्त कहा जाता है ।

इसे भी पढ़ें :–

  1. अध्याय पन्द्रह — पुरुषोत्तम योग
  2. अध्याय सोलह — दैवी तथा आसुरी स्वभाव
  3. अध्याय सत्रह — श्रद्धा के विभाग

यजन्ते सात्त्विका देवान्यक्षरक्षांसि राजसाः ।
प्रेतान्भूतगणांश्चान्ये यजन्ते तामसा जनाः ।। 4 ।।

यजन्ते — पूजते हैं ; सात्त्विकाः — सतोगुण में स्थित लोग ; देवान् — देवताओं को ; यक्ष-रक्षांसि — असुरगण को ; राजसाः — रजोगुण में स्थित लोग ; प्रेतान् — मृतकों की आत्माओं को ; भूत-गणान् — भूतों को ; च — तथा ; अन्ये — अन्य ; यजन्ते — पूजते हैं ; तामसाः — तमोगुण में स्थित ; जनाः — लोग ।

तात्पर्य — सतोगुणी व्यक्ति देवताओं को पूजते हैं, रजोगुणी यक्षों व राक्षसों की पूजा करते हैं और तमोगुणी व्यक्ति भूत-प्रेतों को पूजते हैं ।

अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जनाः ।
दम्भाहङ्कारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः ।। 5 ।।

कर्षयन्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः ।
मां चैवान्तः शरीरस्थं तान्विद्ध्यासुरनिश्चयान् ।। 6 ।।

अशास्त्र — जो शास्त्रों में नहीं है ; विहितम् — निर्देशित ; घोरम् — अन्यों के लिए  हानिप्रद ; तप्यन्ते — तप करते हैं ; ये — जो लोग ; तपः — तपस्या : जनाः — लोग ; दम्भ — घमण्ड ; अहङ्कार — तथा अहंकार से ; संयुक्ताः — प्रवृत ; काम — काम ; राग — तथा आसक्ति का ; बल — बलपूर्वक ; अन्विताः — प्रेरित ; कर्षयन्तः — कष्ट देते हुए ; शरीर-स्थम् — शरीर के भीतर स्थित ; भूत-ग्रामम् — भौतिक तत्त्वों का संयोग ; अचेतसः — भ्रमित मनोवृत्ति वाले ; माम् — मुझको ; च — भी ; एव — निश्चय ही ; अन्तः — भीतर ; शरीर-स्थम् — शरीर में स्थित ; तान् — उनको ; विद्धि — जानो ; आसुर-निश्चयान् — असुर ।

तात्पर्य — जो लोग दम्भ तथा अहंकार से अभिभूत होकर शास्त्रविरुद्ध कठोर तपस्या और व्रत करते हैं, जो काम तथा आसक्ति द्वारा प्रेरित होते हैं, जो मुर्ख हैं तथा जो शरीर के भौतिक तत्त्वों को तथा शरीर के भीतर स्थित परमात्मा को कष्ट पहुँचाते हैं, वे असुर कहे जाते हैं ।

आगे के श्लोक :–

Leave a Comment

error: Content is protected !!