Shree Durga Saptshati / श्री दुर्गा सप्तशती

Shree Durga Saptshati
श्री दुर्गा सप्तशती

Sanskaran Ka Nivedan
संस्करण का निवेदन

Shree Durga Saptshati, श्री दुर्गा सप्तशती- वैदिक-तान्त्रिक रात्रिसूक्त और देवीसूक्त के साथ ही देव्यथर्वशीर्ष, सिद्ध-कुंजी का स्तोत्र, मूल सप्तश्लोकी दुर्गा, श्रीदुर्गाद्वात्रिंशन्नाममाला, श्रीदुर्गाष्टोत्तरशतनामस्तोत्र, श्रीदुर्गामानसपूजा और देव्यपराधक्षमापनस्तोत्र को भी दे देने से पुस्तक की उपादेयता विशेष बढ़ गयी है। नवार्ण-विधि तो है ही, आवश्यक न्यास भी नहीं छूटने पायें हैं। सप्तशती के मूल श्लोकों का पूरा अर्थ दे दिया गया है।


देवि प्रपन्नार्तिहरे प्रसीद प्रसीद मातर्जगतोऽखिलस्य ।

प्रसीद विश्वेश्वरि पाहि विश्वं त्वमीश्वरी देवि चराचरस्य ।।

दुर्गा सप्तशती हिन्दू-धर्म का सर्वमान्य ग्रन्थ है। इसमें भगवती की कृपा के सुन्दर इतिहास के साथ ही बड़े-बड़े गूढ़ साधन-रहस्य भरे हैं। कर्म, भक्ति और ज्ञान की त्रिविध मन्दाकिनी बहाने वाला यह ग्रन्थ भक्तों के लिये वांछाकल्पतरु है। सकाम भक्त इसके सेवन से मनोऽभिलषित दुर्लभतम वस्तु या स्थिति सहज ही प्राप्त करते हैं और निष्काम भक्त परम दुर्लभ मोक्ष को पाकर कृतार्थ होते हैं। राजा सुरथ से महर्षि मेधा ने कहा था — ‘ तामुपैहि महाराज शरणं परमेश्वरीम्। आराधिता सैव नृणां भोगस्वर्गापवर्गदा ।। महाराज ! आप उन्हीं भगवती परमेश्वरी की शरण ग्रहण कीजिये। वे आराधना से प्रसन्न होकर मनुष्यों को भोग, स्वर्ग और अपुनरावर्ती मोक्ष प्रदान करती है।

इसी के अनुसार आराधना करके ऐश्वर्यकामी राजा सुरथ ने अखण्ड साम्राज्य प्राप्त किया तथा वैराग्यवान् समाधि वैश्य ने दुर्लभ ज्ञान के द्वारा मोक्ष की प्राप्ति की। अब तक इस आशीर्वाद रूप मंत्रमय ग्रन्थ के आश्रय से न मालूम कितने आर्त, अर्थाथी, जिज्ञासु तथा प्रेमी भक्त अपना मनोरथ सफल कर छूके हैं। हर्ष की बात है कि जगज्जननी भगवती श्री दुर्गा जी की कृपा से वही सप्तशती संक्षिप्त पाठ-विधि सहित पाठकों के समक्ष पुस्तक रूप में उपस्थित की जा रही है। इसमें कथा-भाग तथा अन्य बातें वे ही हैं, जो ‘ कल्याण ‘ के विशेषांक ‘ संक्षिप्त मार्कण्डेय-ब्रह्मपुराणांक ‘ में प्रकाशित हो चुकी हैं। कुछ उपयोगी स्त्रोत और बढ़ाये गए हैं।  

वैदिक-तान्त्रिक रात्रिसूक्त और देवीसूक्त के साथ ही देव्यथर्वशीर्ष, सिद्ध-कुंजी का स्तोत्र, मूल सप्तश्लोकी दुर्गा, श्रीदुर्गाद्वात्रिंशन्नाममाला, श्रीदुर्गाष्टोत्तरशतनामस्तोत्र, श्रीदुर्गामानसपूजा और देव्यपराधक्षमापनस्तोत्र को भी दे देने से पुस्तक की उपादेयता विशेष बढ़ गयी है। नवार्ण-विधि तो है ही, आवश्यक न्यास भी नहीं छूटने पायें हैं। सप्तशती के मूल श्लोकों का पूरा अर्थ दे दिया गया है। तीनों रहस्यों में आये हुए कई गूढ़ विषयों को भी टिप्पणी द्वारा स्पष्ट किया गया है। इन विशेषताओं के कारण यह पाठ और अध्ययन के लिए बहुत ही उपयोगी और उत्तम पुस्तक हो गयी है।

गीताप्रेस, गोरखपुर धार्मिक साहित्य की पुस्तकों को बहुत ही कम मूल्य पर उपलब्ध कराने वाले प्रकाशन द्वारा श्रीदुर्गासप्तशती को भाष्य के साथ आम जनता तक पहुँचाने में योगदान दिया है। 

हिन्दीस ब्लॉग (राधाकृष्ण) के माध्यम से हम श्रीदुर्गासप्तशती को प्रस्तुत करेंगे, इस प्रयास में हम सभी अध्यायों और उनके सभी श्लोकों का सरल अनुवाद हिन्दी में प्रस्तुत करेंगे। श्री दुर्गा सप्तशती के सभी अध्यायों के अलावा और श्लोकों की सरल व्याख्या भी की गयी है। 

सप्तशती के पाठ में विधि का ध्यान रखना तो उत्तम है ही, उसमें भी सबसे उत्तम बात है भगवती दुर्गामाता के चरणों में प्रेमपूर्ण भक्ति। श्रद्धा और भक्ति के साथ जगदम्बा के स्मरणपूर्वक सप्तशती का पाठ करने वाले को उनकी कृपा का शीघ्र अनुभव हो सकता है। आशा है, प्रेमी पाठक इससे लाभ उठायेंगे। यद्यपि पुस्तक को सब प्रकार से शुद्ध बनाने की ही चेष्टा की गयी है, तथापि प्रमादवश कुछ अशुद्धियों का रह जाना असंभव नहीं है। ऐसी भूलों के लिए हम क्षमा माँगते हैं।

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