Dhundhi Bhujang Prayat Stotr / ढुण्ढि भुजंग प्रयात स्तोत्र

Shri Dhundhi Bhujang Prayat Stotram
श्री ढुण्ढि भुजंग प्रयात स्तोत्रम्


उमाङ्गोद्भवं दन्तिवक्त्रं गणेशं

भुजे कङ्कणैः शोभितं धूम्रकेतुम् ।

गले हारमुक्तावलीशोभितं तं
नमो ज्ञानरूपं गणेशं नमस्ते ।। 1 ।।

अर्थात् :- भगवती उमा के अंग से उत्पन्न, हाथी के मुखवाले, गणों के स्वामी, भुजा में कंकणों से शोभित होने वाले, धूम्रवर्ण की पताका वाले तथा गले में हार और मोतियों की माला से सुशोभित ज्ञान स्वरुप उन गणेश को बारम्बार नमस्कार है।

गणेशैकदन्तं शुभं सर्वकार्ये
स्मरन्मन्मुखं ज्ञानदं सर्वसिद्धिम् ।

मनश्चिन्तितं कार्यसिद्धिर्भवेत्तं
नमो बुद्धिकान्तं गणेशं नमस्ते ।। 2 ।।

अर्थात् :- गणों के स्वामी, एक दाँतवाले, सभी कार्यों में शुभ करने वाले, प्रारम्भ में स्मरण किये जाने वाले, ज्ञान और सभी प्रकार की सिद्धि प्रदान करने वाले उन भगवान् गणेश का मन से चिन्तन करने पर कार्य की सिद्धि हो जाती है, ऐसी बुद्धि के स्वामी गणेश को बारम्बार नमस्कार है।

कुठारं धरन्तं कृतं विघ्नराजं
चतुर्भिर्मुखैरेकदन्तैकवर्णम् ।

इदं देवरूपं गणं सिद्धिनाथं
नमो भालचन्द्रं गणेशं नमस्ते ।। 3 ।।

अर्थात् :- कुठार धारण करने वाला, विघ्नों के स्वामी, चार मुखों से युक्त होने पर भी एक दाँत और एक वर्ण वाले इस प्रकार के देव स्वरुप को धारण करने वाले गण स्वरूप तथा सिद्धि के स्वामी भाल चन्द्र गणेश आपको बारम्बार नमस्कार है।

शिरःसिन्दुरं कुंकुमं देहवर्णं
शुभेभादिकं प्रीयते विघ्नराजम् ।

महासङ्कटच्छेदने धूम्रकेतुं
नमो गौरिपुत्रं गणेशं नमस्ते ।। 4 ।।

अर्थात् :- जिनका सिर सिन्दूर से सुधोभित हैं और जिनके देह की आभा कुंकुम वर्ण की है, शुभ हाथी आदि जिस विघ्नराज की प्रार्थना करते हैं, जो महान् संकट को दूर करने में धूमकेतु हैं, इस प्रकार के गौरीपुत्र गणेश को बारम्बार नमस्कार है।

यथा पातकं छेदितुं विष्णुनाम
तथा ध्यायतां शङ्करं पापनाशम् ।

यथा पूजितं षण्मुखं शोकनाशं
नमो विघ्ननाशं गणेशं नमस्ते ।। 5 ।।

अर्थात् :- जिस प्रकार पातक को काटने में विष्णु का नाम समर्थ है, उसी प्रकार ध्यान करने वालों का पाप का नाश करने में भगवान् शंकर समर्थ हैं। जिस प्रकार पूजित होने पर षण्मुख कार्तिकेय शोक का नाश करने वाले हैं, उसी प्रकार विघ्नों का नाश करने वाले गणेश को बारम्बार नमस्कार है।

सदा सर्वदा ध्यायतामेकदन्तं
सदा पूजितं सिन्दुरारक्तपुष्पैः ।

सदा चर्चितं चन्दनैः कुङ्कुमाक्तं
नमो ज्ञानरूपं गणेशं नमस्ते ।। 6 ।।

अर्थात् :- जो सदा-सर्वदा एकदन्त रूप से ध्यान करने योग्य हैं, जो सदा सिन्दूर वर्ण के लाल पुष्पों से पूजित हैं, जो सदा कुंकुम से मिश्रित चन्दन से चर्चित हैं, इस प्रकार के ज्ञान स्वरुप गणेश को बारम्बार नमस्कार है।

नमो गौरिदेहमलोत्पन्न तुभ्यं
नमो ज्ञानरूपं नमः सिद्धिपं तम् ।

नमो ध्यायतामर्चतां बुद्धिदं तं
नमो गौर्यपत्यं गणेशं नमस्ते ।। 7 ।।

अर्थात् :- पार्वती के शरीर के मैल से उत्पन्न होने वाले आपको नमस्कार है। ज्ञान स्वरुप आपको नमस्कार है, सिद्धियों के पालन करने वाले आपको नमस्कार है, जो ध्यान करने वाले तथा अर्चन करने वालों को बुद्धि प्रदान करने वाले हैं, उन गौरी के पुत्र गणेश को बारम्बार नमस्कार है।

भुजङ्गप्रयातं पठेद्यस्तु भक्त्या
प्रभाते नरस्तन्मयैकाग्रचित्तः ।

क्षयं यान्ति विघ्ना दिशः शोभयन्तं
नमो ज्ञानरूपं गणेशं नमस्ते ।। 8 ।।

अर्थात् :- जो मनुष्य भक्ति से तन्मय होकर एकाग्रचित्त से प्रभात-वेला में इस भुजंगप्रयातस्तोत्र को पढता है, उसके सभी प्रकार के विघ्न नष्ट हो जाते हैं। दिशाओं को सुशोभित करने वाले ज्ञान रूप गणेश को बारम्बार नमस्कार है।

।। इस प्रकार श्रीढुण्ढिभुजंगप्रयातस्तोत्र सम्पूर्ण हुआ ।।

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