Maa Kali Kavacham / माँ काली कवचम्

Maa Kali Kavacham

Maa Kali Kavacham, माँ काली कवचम्- श्रुणु नारद वक्ष्यामि महाविद्यां दशाक्षरीम् । गोपनीयं च कवचं त्रिषु लोकेषु दुर्लभम् ।। 2 ।। ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं कालिकायै स्वाहेति च दशाक्षरीम् ।
दुर्वासा हि ददौ राज्ञे पुष्करे सुर्यपर्वणि ।। 3 ।। दशलक्षजपेनैव मन्त्रसिद्धिः कृता पुरा । पञ्चलक्षजपेनैव पठन् कवचमुत्तमम् ।। 4 । बभूव सिद्धकवचोऽप्ययोध्यामाजगामसः ।
कृत्स्नां हि पृथिवीं जिग्ये कवचस्य प्रसादतः ।। 5 ।।

Siddha Kunjika Stotram / सिद्ध कुंजिका स्तोत्रम्

Siddha Kunjika Stotram

Siddha Kunjika Stotram, सिद्ध कुंजिका स्तोत्रम्- हे रुद्रस्वरूपिणी ! तुम्हें नमस्कार। हे मधु दैत्य को मारने वाली ! तुम्हें नमस्कार है। कैटभविनाशिनी को नमस्कार। महिषासुर को मारने वाली देवी ! तुम्हें नमस्कार है। यह कुंजिका स्तोत्र मन्त्र को जगाने के लिये है। इसे भक्तिहीन पुरुष को नहीं देना चाहिये। हे पार्वती ! इसे गुप्त रखो। हे देवी ! जो बिना कुंजिका के सप्तशती का पाठ करता है उसे उसी प्रकार सिद्धि नहीं मिलती जिस प्रकार वन में रोना निरर्थक होता है।

Devi Aparadha Kshamapana Stotram / देवी अपराध क्षमापन

Devi Aparadha Kshamapana Stotram

Devi Aparadha Kshamapana Stotram, देवी अपराध क्षमापन स्तोत्रम्- मुख में चन्द्रमा की शोभा धारण करने वाली माँ ! मुझे मोक्ष की इच्छा नहीं है, संसार के वैभव की भी अभिलाषा नहीं है ; न विज्ञान की अपेक्षा है, न सुख की आकांक्षा, अतः तुमसे मेरी यही याचना है कि मेरा जन्म ‘ मृडानी, रुद्राणी, शिव, शिव, भवानी ‘ — इन नामों का जप करते हुए बीते। जगदम्ब ! मुझपर जो तुम्हारी पूर्ण कृपा बनी हुई है, इसमें आश्चर्य की कौन-सी बात है, पुत्र अपराध-पर-अपराध क्यों न करता जाता हो, फिर भी माता उसकी उपेक्षा नहीं करती।

Durga Dwatrinsh Naam Mala / दुर्गा द्वात्रिंशन नाम माला

Durga Dwatrinsh Naam Mala

Durga Dwatrinsh Naam Mala, दुर्गा द्वात्रिंशन नाम माला- दुर्गा, दुर्गार्तिशमनी, दुर्गापद्विनिवारिणी, दुर्गमच्छेदिनी, दुर्गसाधिनी, दुर्गनाशिनी, दुर्गतोद्धारिणी, दुर्गनिहन्त्री, दुर्गमापहा, दुर्गमज्ञानदा, दुर्गदैत्यलोकदवानला, दुर्गमा, दुर्गमालोका, दुर्गमात्मस्वरूपिणी, दुर्गमार्गप्रदा, दुर्गमविद्या, दुर्गमाश्रिता, दुर्गम्ज्ञानसंस्थाना, दुर्गमध्यानभासिनी, दुर्गमोहा, दुर्गमगा, दुर्गमार्थस्वरूपिणी, दुर्गमासुरसंहन्त्री, दुर्गमायुधधारिणी, दुर्गमाङ्गी, दुर्गमता, दुर्गम्या, दुर्गमेश्वरी, दुर्गभीमा, दुर्गभामा, दुर्गभा, दुर्गदारिणी।

Shri Durga Manas Puja / श्री दुर्गा मानस पूजा

Shri Durga Manas Puja

Shri Durga Manas Puja, श्री दुर्गा मानस पूजा- माता त्रिपुरसुन्दरि ! तुम भक्तजनों की मनोवांछा पूर्ण करने वाली कल्पलता हो। माँ ! यह पादु का आदर पूर्वक तुम्हारे श्रीचरणों में समर्पित है, इसे ग्रहण करो। यह उत्तम चन्दन और कुंकुम से मिली हुई लाल जल की धरा से धोयी गयी है। भाँति-भाँति की बहुमूल्य मणियों तथा मूँगों से इसका निर्माण हुआ है और बहुत-सी देवांगनाओं ने अपने कर-कमलों द्वारा भक्ति पूर्वक इसे सब ओर से धो-पोंछकर स्वच्छ बना दिया है।

Saptashati Kshama Prarthana / सप्तशती क्षमा प्रार्थना

Saptashati Kshama Prarthana

Durga Saptashati Kshama Prarthana, दुर्गा सप्तशती क्षमा प्रार्थना- देवि ! सुरेश्वरि ! मैंने जो मन्त्रहीन, क्रियाहीन और भक्तिहीन पूजन किया है, वह सब आपकी कृपा से पूर्ण हो। देवि ! सुरेश्वरि ! तुम गोपनीय से भी गोपनीय वस्तु की रक्षा करने वाली हो। मेरे निवेदन किये हुए इस जप को ग्रहण करो। तुम्हारी कृपा से मुझे सिद्धि प्राप्त हो। सैकड़ों अपराध करके भी जो तुम्हारी शरण में जा ‘ जगदम्ब ‘ कहकर पुकारता है, उसे वह गति प्राप्त होती है, जो ब्रह्मादि देवताओं के लिये भी सुलभ नहीं है।

Murti Rahasyam / मूर्ति रहस्यम्

Murti Rahasyam

Murti Rahasyam, मूर्ति रहस्यम्- देवी रक्तदन्तिका का आकार वसुधा की भाँति विशाल है। उनके दोनों स्तन सुमेरु पर्वत के समान हैं। वे लंबे, चौड़े, अत्यन्त स्थूल एवं बहुत ही मनोहर हैं। कठोर होते हुए भी अत्यन्त कमनीय हैं तथा पूर्ण आनन्द के समुद्र हैं। सम्पूर्ण कामनाओं की पूर्ति करने वाले ये दोनों स्तन देवी अपने भक्तों को पिलाती हैं। सप्तशती के मन्त्रों के पाठमात्र से मनुष्य सात जन्मों में उपार्जित ब्रह्महत्यासदृश घोर पातकों एवं समस्त कल्मषों से मुक्त हो जाता है।

Ath Vaikritik Rahasyam / अथ वैकृतिकं रहस्यम्

Ath Vaikritik Rahasyam

Ath Vaikritik Rahasyam, अथ वैकृतिकं रहस्यम् – तमोगुणमयी महाकाली भगवान् विष्णु की योगनिद्रा कही गयी हैं। मधु और कैटभ का नाश करने के लिये ब्रह्माजी ने जिनकी स्तुति की थी, उन्हीं का नाम महाकाली है। उनके दस मुख, दस भुजाएँ और दस पैर हैं। वे काजल के समान काले रंग की हैं तथा तीस नेत्रों की विशाल पंक्ति से सुशोभित होती हैं। इस प्रकार जो मनुष्य प्रतिदिन भक्तिपूर्वक परमेश्वरी का पूजन करता है, वह मनोवांछित भोगों को भोगकर अन्त में देवी का सायुज्य प्राप्त करता है।

Ath Pradhanikam Rahasyam / अथ प्राधानिकं रहस्यम्

Ath Pradhanikam Rahasyam

Ath Pradhanikam Rahasyam, अथ प्राधानिकं रहस्यम्- ऋषि कहते हैं — राजन् ! यह रहस्य परम गोपनीय है। इसे किसी से कहने-योग्य नहीं बतलाया गया है ; किन्तु तुम मेरे भक्त हो, इसलिये तुम से न कहने-योग्य मेरे पास कुछ भी नहीं है। त्रिगुणमयी परमेश्वरी महालक्ष्मी ही सबका आदि कारण हैं। वे ही दृश्य और अदृश्य रूप से सम्पूर्ण विश्व को व्याप्त करके स्थित हैं।

Tantroktam Devi Suktam / तन्त्रोक्तं देवी सूक्तम्

Tantroktam Devi Suktam

Tantroktam Devi Suktam, तन्त्रोक्तं देवी सूक्तम्- या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता । नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः । स्तुता सुरैः पूर्वमभीष्टसंश्रया- त्तथा सुरेन्द्रेण दिनेषु सेविता । करोतु सा नः शुभहेतुरीश्वरी शुभानि भद्राण्यभिहन्तु चापदः ।

Rigvedoktam Devi Suktam / ऋग्वेदोक्तं देवी सूक्तम्

Rigvedoktam Devi Suktam

Rigvedoktam Devi Suktam, ऋग्वेदोक्तं देवी सूक्तम्- जो सिंह की पीठ पर विराजमान हैं, जिनके मस्तक पर चन्द्रमा का मुकुट है, जो मरकत मणि के समान कान्ति वाली अपनी चार भुजाओं में शंख, चक्र, धनुष और बाण धारण करती हैं, तीन नेत्रों से सुशोभित होती हैं, जिनके भिन्न-भिन्न अंग बाँधे हुए बाजूबंद, हार, कंकण, खनखनाती हुई करधनी और रुनझुन करते हुए नूपुरों से विभूषित हैं तथा जिनके कानों में रत्नजटित कुण्डल झिलमिलाते रहते हैं, वे भगवती दुर्गा हमारी दुर्गति दूर करने वाली हों।

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