Ekdant Sharanagati Stotram / श्री एकदन्त शरणागति स्तोत्रम्

Shri Ekdant Sharanagati Stotram
श्री एकदन्त शरणागति स्तोत्रम्


देवर्षय ऊचुः

सदात्मरूपं सकलादिभूत –
ममायिनं सोऽहमचिन्त्यबोधम् ।

अनादिमध्यान्तविहीनमेकं
तमेकदन्तं शरणं व्रजामः ।। 1 ।।

अर्थात् :- देवर्षिगण बोले :- जो सदात्मस्वरूप, सबके आदिकारण, मायारहित तथा ‘ सोऽहमस्मि ‘ ( वह परमात्मा मैं हूँ ) — इस अचिन्त्य बोध से सम्पन्न हैं ; जिनका आदि, मध्य और अन्त नहीं है, उन एक-अद्वितीय एकदन्तधारी भगवान् गणेश की हम शरण लेते हैं।

अनन्तचिद्रूपमयं गणेश –
मभेदभेदादिविहीनमाद्यम् ।

हृदि प्रकाशस्य धरं स्वधीस्थं
तमेकदन्तं शरणं व्रजामः ।। 2 ।।

अर्थात् :- जो अनन्त चिन्मय हैं ; अभेद और भेद आदि से परे हैं ; आदिपुरुष हैं और हृदय में ज्ञानमय प्रकाश धारण करते हैं, अपनी बुद्धि में स्थित हुए उन एकदन्त गणेश की हम शरण लेते हैं।

समाधिसंस्थं हृदि योगिनां यं
प्रकाशरूपेण विभातमेतम् ।

सदा निरालम्बसमाधिगम्यं
तमेकदन्तं शरणं व्रजामः ।। 3 ।।

अर्थात् :- जो सदा समाधिस्थ रहते हैं, योगियों के ह्रदय में प्रकाश रूप से उद्भासित होते हैं और सदा निरालम्ब समाधि के द्वारा अनुभव में आने वाले हैं, उन एकदन्तधारी भगवान् गणेश की हम शरण लेते हैं।

स्वबिम्बभावेन विलासयुक्तां
प्रत्यक्षमायां विविधस्वरूपाम् ।

स्ववीर्यकं तत्र ददाति यो वै
तमेकदन्तं शरणं व्रजामः ।। 4 ।।

अर्थात् :- जो स्वीय बिम्बभाव से विलास शीला, विविध स्वरूपा, प्रत्यक्ष दृश्य रूपा माया है, उसमें जो अपने वीर्य ( बल ) – का आधान करते हैं, उन एकदन्तधारी भगवान् गणेश की हम शरण लेते हैं।

त्वदीयवीर्येण समर्थभूत –
स्वमायया संरचितं च विश्वम् ।

तुरीयकं ह्यात्मप्रतीतिसंज्ञं
तमेकदन्तं शरणं व्रजामः ।। 5 ।।

अर्थात् :- [ हे प्रभो ! ] आपके ही वीर्य से — बल वैभव से सामर्थ्यशालिनी हुई जो आपकी मायाशक्ति है, उसी के द्वारा इस सम्पूर्ण विश्व की संरचना हुई है। आप जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति — इन तीनों अवस्थाओं से परे, आत्मबोध स्वरुप, तुरीय परमात्मा हैं। ऐसा एकदन्तधारी भगवान् गणेश की हम शरण लेते हैं।

त्वदीयसत्ताधरमेकदन्तं
गुणेश्वरं यं गुणबोधितारम् ।

भजन्तमत्यन्तमजं त्रिसंस्थं
तमेकदन्तं शरणं व्रजामः ।। 6 ।।

अर्थात्  :- [ हे भगवान् !] आपकी ही सत्ता धारण करनेवाले भक्त एकदन्त ( अपूर्व दानी ) हैं, वे तीनों गुणों के स्वामी होते हुए उन गुणों का बोध कराने वाले हैं। वे आप अजन्मा परमेश्वर के अत्यन्त भजन में संलग्न हैं। तीनों लोकों, तीनों गुणों, तीनों अवस्थाओं एवं तीनों देवों में विद्यमान उन एकदन्त गणेश की हम शरण लेते हैं।

ततस्त्वया प्रेरितनादकेन
सुषुप्तिसंज्ञं रचितं जगद् वै ।

समानरूपं ह्युभयत्रसंस्थं
तमेकदन्तं शरणं व्रजामः ।। 7 ।।

अर्थात् :- [ हे प्रभो !] फिर आपके द्वारा प्रेरित नाद ने सुषुप्ति-नामक जगत् की सृष्टि की है। दोनों अवस्थाओं में समान रूप से विराजमान आप एकदन्त की हम शरण लेते हैं।

तदेव विश्वं कृपया प्रभूतं
द्विभावमादौ तमसा विभान्तम् ।

अनेकरूपं च तथैकभूतं
तमेकदन्तं शरणं व्रजामः ।। 8 ।।

अर्थात् :- वह सुषुप्ति-संज्ञक जगत् ही, जो आदिकाल में तम से आच्छन्न था, आपकी कृपा से दो रूपों में प्रकट हुआ। जो अनेक रूप होते हुए भी एकरूप हैं, उन भगवान् एकदन्त की हम शरण लेते हैं।

ततस्त्वया प्रेरितकेन सृष्टं
बभूव सूक्ष्मं जगदेकसंस्थम् ।

सुसात्विकं स्वप्नमनन्तमाद्यं
तमेकदन्तं शरणं व्रजामः ।। 9 ।।

अर्थात् :- तदनन्तर आपके द्वारा प्रेरित बिन्दु से सूक्ष्म जगत् की सृष्टि हुई, जो एकमात्र आप में ही स्थित है। जो परम सात्त्विक, स्वप्नमय, अनन्त एवं सबके आदिकारण हैं, उन भगवान् एकदन्त की हम शरण लेते हैं।

तदेव स्वप्नं तपसा गणेश
सुसिद्धरूपं विविधं बभूव ।

सदैकरूपं कृपया च तेऽद्य
तमेकदन्तं शरणं व्रजामः ।। 10 ।।

अर्थात् :- हे गणेश ! वह सूक्ष्म जगत् ही स्वप्न है, जो आपके संकल्पमय तप से सुसिद्ध रूप ही विविध भावों में प्रकट हुआ। वह आपकी कृपा से सदा एकरूप में स्थित है। आज हम उन्हीं भगवान् एकदन्त की शरण लेते हैं।

त्वदाज्ञया तेन त्वया हृदिस्थं
तथा सुसृष्टं जगदंशरूपम् ।

विभिन्नजाग्रन्मयमप्रमेयं
तमेकदन्तं शरणं व्रजामः ।। 11 ।।

अर्थात् :- आपकी आज्ञा से क्रियाशील हुए उस स्वप्न के द्वारा आपने ही अपने हृदय में विराजमान जगत् के अंश रूप जगत् के उत्तम सृष्टि की है। वह विभिन्न जाग्रत्कालीन वस्तुओं से उपलक्षित है। हम अप्रमेय शक्तिशाली उन भगवान् एकदन्त की शरण लेते हैं।

तदेव जाग्रद्रजसा विभातं
विलोकितं त्वत्कृपया स्मृतेन ।

बभूव भिन्नं च सदैकरूपं
तमेकदन्तं शरणं व्रजामः ।। 12 ।।

अर्थात् :- वही जाग्रत् जगत् रजोगुण से व्यक्त होकर आपकी कृपा एवं स्मृति से प्रत्यक्ष दिखायी देता है। जो सदा एकरूप होते हुए भी विभिन्न रूपों में प्रकट हुए हैं, उन भगवान् एकदन्त की हम शरण लेते हैं।

सदेव सृष्ट्वा प्रकृतिस्वभावा-
त्तदन्तरे त्वं च विभासि नित्यम् ।

धियः प्रदाता गणनाथ एक-
स्तमेकदन्तं शरणं व्रजामः ।। 13 ।।

अर्थात् :- प्रकृति के स्वाभाव से सद्रूप जगत् की सृष्टि करके आप उसके भीतर नित्य विराज रहे हैं। एकमात्र गणनाथ ही बुद्धि के दाता हैं। हम उन्हीं भगवान् एकदन्त की शरण लेते हैं।

त्वदाज्ञया भान्ति ग्रहाश्च सर्वे
प्रकाशरूपाणि विभान्ति खे वै ।

भ्रमन्ति नित्यं स्वविहारकार्या-
स्तमेकदन्तं शरणं व्रजामः ।। 14 ।।

अर्थात् :- [ हे भगवान् ! ] आपकी ही आज्ञा से आकाश में समस्त ग्रह तथा प्रकाश रूप तारे विभासित हो रहे हैं। वे आपके आदेश से ही नित्य अपने विहार-कार्य का सम्पादन करते हुए भ्रमण करते हैं। उन्हीं आप भगवान् एकदन्त की हम शरण लेते हैं।

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