Gajanan Stotram / श्री गजानन स्तोत्रम्

Shri Gajanan Stotram
श्री गजानन स्तोत्रम्


देवर्षय ऊचुः

विदेहरूपं भवबन्धहारं
सदा स्वनिष्ठं स्वसुखप्रदं तम् ।

अमेयसाङ्ख्येन च लक्ष्यमीशं
गजाननं भक्तियुक्तं भजामः ।। 1 ।।

अर्थात् :- देवर्षि बोले :- जो विदेह ( देहाभिमान शून्य ) – रूप से स्थित हैं ; भवबन्धन का नाश करने वाले हैं ; सदा स्वानन्द रूप में स्थित तथा आत्मनन्द प्रदान करने वाले हैं, उन अमेय सांख्य ज्ञान के लक्ष्यभूत भगवान् गजानन का हम भक्तिभाव से भजन करते हैं।

मुनीन्द्रवन्द्यं विधिबोधहीनं
सुबुद्धिदं बुद्धिधरं प्रशान्तम् ।

विकारहीनं सकलाङ्गकं वै
गजाननं भक्तियुक्तं भजामः ।। 2 ।।

अर्थात् :- जो मुनीश्वरों के लिये वन्दनीय, वेदज्ञान से भी अजेय, उत्तम बुद्धि के दाता, बुद्धिधारी, प्रशान्त चित्त, निर्विकार तथा सर्वांग पूर्ण हैं, उन गजानन का हम भक्तिपूर्वक भजन करते हैं।

अमेयरूपं हृदि संस्थितं तं
ब्रह्माहमेकं भ्रमनाशकारम् ।

अनादिमध्यान्तमपाररूपं
गजाननं भक्तियुक्तं भजामः ।। 3 ।।

अर्थात् :- जिनका स्वरुप अमेय ( मानातीत ) है ; जो हृदय में विराजमान हैं ; ‘ मैं एकमात्र अद्वितीय ब्रह्म हूँ ‘ — यह बोध जिनका स्वरुप है ; जो भ्रम का नाश करने वाले हैं ; जिनका आदि, मध्य और अन्त नहीं है तथा जो अपार रूप हैं, उन गजानन का हम भक्तिभाव से भजन करते हैं।

जगत्प्रमाणं जगदीशमेव
मगम्यमाद्यं जगदादिहीनम् ।

अनात्मनां मोहप्रदं पुराणं
गजाननं भक्तियुतं भजामः ।। 4 ।।

अर्थात् :- जिनका स्वरुप जगत् को मापने वाला अर्थात् विश्वव्यापी है ; इस प्रकार जो जगदीश्वर, अगम्य, सबके आदि तथा जगत् आदि से हीन हैं तथा जो अनात्मा ( अज्ञानी ) पुरुषों को मोह में डालने वाले हैं, उन पुराण पुरुष गजानन का हम भक्ति भाव से भजन करते हैं।

न पृथ्विरूपं न जलप्रकाशं
न तेजसंस्थं न समीरसंस्थम् ।

न खे गतं पञ्चविभूतिहीनं
गजाननं भक्तियुतं भजामः ।। 5 ।।

अर्थात् :- जो न पृथ्वी रूप हैं, न जल के रूप में प्रकाशित होते हैं ; न तेज, वायु और आकाश में स्थित हैं, उन पंचविध विभूतियों से रहित गजानन का हम भक्तिभाव से भजन करते हैं।

न विश्वगं तैजसगं न प्राज्ञं
समष्टिव्यष्टिस्थमनन्तगं तम् ।

गुणैर्विहीनं परमार्थभूतं
गजाननं भक्तियुतं भजामः ।। 6 ।।

अर्थात् :- जो न विश्व में हैं, न तैजस में हैं और न प्राज्ञ ही हैं ; जो समष्टि और व्यष्टि – दोनों में विराजमान हैं, उन अनन्त व्यापी, निर्गुण एवं परमार्थ स्वरुप गजानन का हम भक्ति भाव से भजन करते हैं।

गुणेशगं नैव च बिन्दुसंस्थं
न देहिनं बोधमयं न ढुण्ढिम् ।

सुयोगहीनं प्रवदन्ति तत्स्थं
गजाननं भक्तियुतं भजामः ।। 7 ।।

अर्थात् :- जो न तो गुणों के स्वामी ( प्रधान ) में हैं तथा न बिन्दु में विराजमान हैं ; न बोधमय देही हैं और न ढुण्ढि ही हैं ; जिन्हें ज्ञानीजन सुयोगहीन और योग में स्थित बताते हैं, उन गजानन का हम भक्तिभाव से भजन करते हैं।

अनागतं ग्रैवगतं गणेशं
कथं तदाकारमयं वदामः ।

तथापि सर्वं प्रतिदेहसंस्थं
गजाननं भक्तियुतं भजामः ।। 8 ।।

अर्थात् :- जो अनागत ( भविष्य ) हैं, गजग्रीवायुक्त हैं, उन गणेश को हम उस आकार से युक्त कैसे कहें ! तथापि जो सर्वरूप हैं और प्रत्येक शरीर में अन्तर्यामी रूप से विराजमान हैं, उन गजानन का हम भक्ति-भाव से भजन करते हैं। 

यदि त्वया नाथ धृतं न किञ्चि-
त्तदा कथं सर्वमिदं भजामि ।

अतो महात्मानमचिन्त्यमेवं
गजाननं भक्तियुतं भजामः ।। 9 ।।

अर्थात् :- हे नाथ ! यदि आपने कुछ भी धारण नहीं किया है, तब हम कैसे इस सम्पूर्ण जगत् की सेवा कर सकते हैं। अतः ऐसे अचिन्त्य महात्मा गजानन का हम भक्तिभाव से भजन करते हैं।

सुसिद्धिदं भक्तजनस्य देवं
सकामिकानामिह सौख्यदं तम् ।

अकामिकानां भवबन्धहारं
गजाननं भक्तियुतं भजामः ।। 10 ।।

अर्थात् :- जो भक्तजनों को उत्तम सिद्धि देने वाले देवता हैं ; सकाम पुरुषों को यहाँ अभीष्ट सौख्य प्रदान करते हैं और निष्काम जनों के भव-बन्धन को हर लेते हैं, उन गजानन का हम भक्तिभाव से भजन करते हैं।

सुरेन्द्रसेव्यं ह्यसुरैः सुसेव्यं
समानभावेन विराजयन्तम् ।

अनन्तबाहुं मुषकध्वजं तं
गजाननं भक्तियुतं भजामः ।। 11 ।।

अर्थात् :- जो सुरेन्द्रों के सेव्य हैं और असुर भी जिनकी भलीभाँति सेवा करते हैं ; जो समान भाव से सर्वत्र विराजमान हैं ; जिनकी भुजाएँ अनन्त हैं और जिनके ध्वज में मूषक का चिह्न है, उन गजानन का हम भक्तिभाव से भजन करते हैं।

सदा सुखानन्दमयं जले च
समुद्रजे इक्षुरसे निवासम् ।

द्वन्द्वस्य यानेन च नाशरूपं
गजाननं भक्तियुतं भजामः ।। 12 ।।

अर्थात् :- जो सदा सुखानन्दमय हैं ; समुद्र के जल में तथा इक्षुरस में निवास करते हैं ; और जो अपने वाहन द्वारा द्वन्द्व का नाश करने वाले हैं, उन गजानन का हम भक्तिभाव से भजन करते हैं।

चतुःपदार्था विविधप्रकाशास्त
एव हस्ताः सचतुर्भुजं तम् ।

अनाथनाथं च महोदरं वै
गजाननं भक्तियुतं भजामः ।। 13 ।।

अर्थात् :- विविध रूप से प्रकाशित होने वाले जो चार पदार्थ ( धर्म, अर्थ, काम और और मोक्ष ) हैं, वे ही जिनके हाथ हैं और उन्हीं हाथों के कारण जो चतुर्भुज हैं, उन अनाथ नाथ महोदर गजानन का हम भक्तिभाव से भजन करते हैं।

महाखुमारूढमकालकालं
विदेहयोगेन च लक्ष्यमानम् ।

अमायिनं मायिकामोहदं तं
गजाननं भक्तियुतं भजामः ।। 14 ।।

अर्थात् :- जो विशाल मूषक पर आरूढ़ हैं, अकाल काल हैं ; विदेहात्मक योग से जिनकी उपलब्धि होती है ; जो मायावी नहीं है, मायावियों को मोह में डालने वाले हैं, उन गजानन का हम भक्तिभाव से भजन करते हैं।

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