Ganapati Stavah / श्री गणपति स्तव

Shri Ganapati Stavah
श्री गणपति स्तव


अशेषविघ्नप्रतिषेधदक्षो

मन्त्राक्षतानामिव दिङ्मुखेषु ।

विक्षेपलीलाकरशीकराणां
करोतु वः प्रीतिमिभाननस्य ।। 1 ।।

अर्थात् :- जैसे वैदिक मन्त्रों से अभिमन्त्रित अक्षतों के द्वारा दिक् पवित्रीकरण होता है, वैसे ही सम्पूर्ण विघ्नों का नाश करने में कुशल गजवदन श्रीगणेशजी लोकलीला के व्याज से सूँड से निःसृत मदबिन्दुओं के द्वारा आप लोगों को प्रसन्नता प्रदान करें।

दन्ताग्रनिर्भिन्नमहाचलोर्वी-
रन्ध्रोत्थिताहीन्द्रमणिप्रभौघे ।

नागाननः स्तम्भधिया कपोलौ
घर्षन्वितृष्णां हसितः पुनातु ।। 2 ।।

अर्थात् :- श्रीगणनाथजी लोकलीला-प्रदर्शन काल में दन्ताग्र भाग से महान् से भी महान् पर्वतों को विदीर्णकर पृथिवी को छिद्रवती कर देते हैं। जब पृथिवी के अन्तर्भाग से शेष  भगवान् की मणियों की आभा बाहर छिटक आती है, तब उस छिद्र को पूरित करने के लिये वहीं पर मस्तक और कपोलों का घर्षण कर क्रिया से उपरत हो जाते हैं – वे ही प्रसन्नवदन शान्तस्वरुप गणेशजी संसार को पवित्र करें।

दन्ताञ्चलेन धरणीतलमुन्नमय्य
पातालकेलिषु धृतादिवराहलीलम् ।

उल्लाघतोत्कणकणाधरगीयमान-
क्रीडावदानमिभराजमुखं नमामः ।। 3 ।।

अर्थात् :- आपने ही वराहवतार में दन्ताग्र भागों में पृथिवी में विवर बनाकर पाताल की यात्रा की ; उस समय आप लीलावराह रूप से कण-कण, घर्र-घर्र शब्दों के द्वारा प्राकृत वराहवपुका नाटक मात्र कर रहे थे। उसी वराहवतार-लीलामूलक गणपति को हम नमन करते हैं।

आनन्दमात्रमकरन्दमनन्तगन्धं
योगीन्द्रसुस्थिरमिलिन्दमपास्तबन्धम् ।

वेदान्तसूर्यकिरणैकविकासशीलं
हेरम्बपादशरदम्बुजमानतोऽस्मि ।। 4 ।।

अर्थात् :- गणेशजी के चरणों में शरद्-ऋतु के कमलों की छटा व्याप्त है, जहाँ केवलानन्द रूप मकरन्द विद्यमान है, जो अनन्त गन्ध से युक्त है, बड़े-बड़े योगीन्द्र भ्रमर बनकर स्थिर रूप से जिसका रसास्वाद लेते रहते हैं, जहाँ किसी प्रकार का बन्धन नहीं है, वेदान्त रूपी सूर्य के प्रकाश से ही जो विकसित होता है ; गणनाथ के उन चरणकमलों में मैं नमन करता हूँ।

पायाद् गजेन्द्रवदनः स इमां त्रिलोकीं
यस्योद्गतेन गगने महता करेण ।

मूलावलग्नसितदन्तबिसाङ्कुरेण
नालायितं तपनबिम्बसरोरुहस्य ।। 5 ।।

अर्थात् :- कमलांकुर के समान संलग्न श्वेत दन्त से युक्त तथा सूर्य-बिम्ब रूपी कमल के समान आकाश तक उठे हुए विशाल शुण्डवाले वे गजानन इस त्रिलोकी की रक्षा करें।

।। इस प्रकार पं० श्रीविन्ध्येश्वरीप्रसादद्वारा संकलित गणपतिस्तव सम्पूर्ण हुआ ।।

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