Shri Ganapati Stotram / श्री गणपति स्तोत्रम्

Shri Ganapati Stotram
श्री गणपति स्तोत्रम्


निर्विघ्नार्थं हरीशाद्या देवा अपि भजन्ति यम् ।

मर्त्यैः स वक्रतुण्डोऽर्च्य इति गणेशसम्मतम् ।। 1 ।।

अर्थात् :-  विघ्नों के नाश के लिये जिनकी सेवा विष्णु तथा महेश्वर आदि देवता भी करते रहते हैं, उन वक्रतुण्ड की पूजा मरणधर्मी जीवों को करनी चाहिये, ऐसा गणपति-सम्प्रदाय के लोगों का कहना है।

जगत्सृष्टियादिहेतुः सा वरा श्रुत्युक्तदेवता ।
गणानां त्वेति मन्त्रेण स्तुतो गृत्समदर्षिणा ।। 2 ।।

अर्थात् :- जगत् की स्थिति, पालन एवं संहार हेतु श्रुतियों के द्वारा प्रतिपादित श्रेष्ठ देवता श्रीगणेश हैं, ; ‘ गणानां त्वा ‘ — इस वैदिक मन्त्र के द्वारा गृत्समद ऋषि ने उनकी स्तुति की है।

इत्युक्तं तत्पुराणेऽतो गणेशो ब्रह्मणस्पतिः ।
महाकविर्ज्येष्ठराजः श्रूयते मन्त्रकृच्च सः ।। 3 ।।

मन्त्रं वदत्युक्थमेष प्रनूनं ब्रह्मणस्पतिः ।
यस्मिन्निन्द्रादयः सर्वे देवा ओकांसि चक्रिरे ।। 4 ।।

अर्थात् :- गणेश पुराण में उन गणेश जी को ब्राह्मणस्पति नाम से कहा गया है, वे महाकवि, ज्येष्ठराज तथा मन्त्रकृत् आदि नामों से भी सम्बोधित किये जाते हैं। ये ब्रह्मणस्पति सामवेद के मन्त्र का यथार्थ रूप में गान करते हैं, जिसमें इन्द्र आदि सभी देवताओं ने आश्रय ग्रहण किया।

स प्रभुः सर्वतः पाता यो रेवान्यो अमीवहा ।
अतोऽर्च्योऽसौ यश्चतुरो वसुवित्पुष्टिवर्धनः ।। 5 ।।

अर्थात् :- वे गणनाथ ही एकमात्र सबके प्रभु हैं, सभी जीवों के संरक्षक हैं, सभी का सब तरह से कल्याण करने वाले हैं, सभी के योगक्षेम का वहन करने वाले हैं, प्रवीण हैं, ऐश्वर्य सम्पन्न हैं, पुष्टि की वृद्धि करने वाले हैं, अतः वे पूजनीय हैं।

वक्रतुण्डोऽपि सुमुखः साधो गन्तापि चोर्ध्वगः ।
येऽमुं नार्चन्ति ते विघ्नैः पराभूता भवन्ति हि ।। 6 ।।

अर्थात् :- गणपति वक्रतुण्ड वाले होने पर भी सुन्दर मुख वाले हैं। उनका तुण्ड नीचे की ओर गमन करता हुआ भी ऊपर की ओर गति करता है। जो इनकी पूजा नहीं करते हैं, वे विघ्नों के बन्धन में पड़कर दुःख भोगते हैं।

ये दूर्वां कुरलाजाद्यैः पुज्यन्ति शिवात्मजम् ।
ऐहिकामुष्मिकान् भोगान् भुक्त्वा मुक्तिं व्रजन्ति ते ।। 7 ।।

अर्थात् :- जो [ श्रद्धवान् पुरुष ] दूर्वांकर, लावा आदि उपचारों से शिवसुत गणेश की पूजा करते हैं, वे लौकिक तथा पारलौकिक सुखों को भोगकर मुक्ति प्राप्त करते हैं।

।। इस प्रकार श्रीवासुदेवनन्दसरस्वतीविरचित गणपतिस्तोत्र सम्पूर्ण हुआ ।।

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