Shri Ganesh Ashtakam / श्री गणेश अष्टकम्

Shri Ganesh Ashtakam
श्री गणेश अष्टकम्


सर्वे ऊचुः

यतोऽनन्तशक्तेरनन्ताश्च जीवा
यतो निर्गुणादप्रमेया गुणास्ते ।

यतो भाति सर्वं त्रिधा भेदभिन्नं
सदा तं गणेशं नमामो भजामः ।। 1 ।।

अर्थात् :- सब भक्तों ने कहा – जिन अनन्त शक्ति वाले परमेश्वर से अनन्त जीव प्रकट हुए हैं ; जिन निर्गुण परमात्मा से अप्रमेय ( असंख्य ) गुणों की उत्पत्ति हुई है ; सात्त्विक, राजस और तामस – इन तीनों भेदों वाला यह सम्पूर्ण जगत् जिनसे प्रकट एवं भासित हो रहा है, उन गणेश को हम नमन एवं भजन करते हैं।

यतश्चाविरासीज्जगत्सर्वमेत-
त्तथाब्जासनो विश्वगो विश्वगोप्ता ।

तथेन्द्रादयो देवसङ्घा मनुष्याः
सदा तं गणेशं नमामो भजामः ।। 2 ।।

अर्थात् :- जिनसे इस समस्त जगत् का पादुर्भाव हुआ है ; जिनसे कमलासन ब्रह्मा, विश्वव्यापी विश्व रक्षक विष्णु, इन्द्र आदि देव-समुदाय और मनुष्य प्रकट हुए  हैं,उन गणेश का हम सदा ही नमन एवं भजन करते हैं।

यतो वह्निभानूद्भवो भूर्जलं च
यतः सागराश्चन्द्रमा व्योम वायुः ।

यतः स्थावरा जङ्गमा वृक्षसङ्घाः
सदा तं गणेशं नमामो भजामः ।। 3 ।।

अर्थात् :- जिनसे अग्नि और सूर्य का प्राकट्य हुआ ; पृथ्वी, जल, समुद्र, चन्द्रमा, आकाश और वायु का प्रादुर्भाव हुआ तथा जिनसे स्थावर-जंगम और वृक्ष समूह उत्पन्न हुए हैं, उन गणेश का हम नमन एवं भजन करते हैं।

यतो दानवाः किन्नरा यक्षसङ्घा
यतश्चारणा वारणाः श्वापदाश्च ।

यतः पक्षिकीटा यतो विरुधश्च
सदा तं गणेशं नमामो भजामः ।। 4 ।।

अर्थात् :- जिनसे दानव, किंनर और यक्ष समूह प्रकट हुए ; जिनसे हाथी और हिंसक जीव उत्पन्न हुए तथा जिनसे पक्षियों, कीटों और लता-बेलों का प्रादुर्भाव हुआ,  उन गणेश का हम सदा ही नमन और भजन करते हैं।

यतो बुद्धिरज्ञाननाशो मुमुक्षोर्यतः
सम्पदो भक्तसंतोषिकाः स्युः ।

यतो विघ्ननाशो यतः कार्यसिद्धिः
सदा तं गणेशं नमामो भजामः ।। 5 ।।

अर्थात् :- जिनसे मुमुक्षु को बुद्धि प्राप्त होती है और अज्ञान का नाश होता है ; जिनसे भक्तों को सन्तोष देने वाली सम्पदाएँ प्राप्त होती हैं तथा जिनसे विघ्नों का नाश और समस्त कार्यों की सिद्धि होती है, उन गणेश का हम सदा नमन एवं भजन करते हैं।

यतः पुत्रसम्पद् यतो वाञ्छितार्थो
यतोऽभक्तविघ्नास्तथानेकरूपाः ।

यतः शोकमोहौ यतः काम एव
सदा तं गणेशं नमामो भजामः ।। 6 ।।

अर्थात् :- जिनसे पुत्र-सम्पत्ति सुलभ होती है; जिनसे मनोवांछित अर्थ सिद्ध होता है; जिनसे अभक्तों को अनेक प्रकार के विघ्न प्राप्त होते हैं तथा जिनसे शोक, मोह और काम प्राप्त होते हैं, उन गणेश का हम सदा नमन एवं भजन करते हैं।

यतोऽनन्तशक्तिः स शेषो बभूव
धराधारणेऽनेकरुपे च शक्तः ।

यतोऽनेकधा स्वर्गलोका हि नाना
सदा तं गणेशं नमामो भजामः ।। 7 ।।

अर्थात् :- जिनसे अनन्त शक्ति सम्पन्न सुप्रसिद्ध शेषनाग प्रकट हुए; जो इस पृथ्वी को धारण करने एवं अनेक रूप ग्रहण करने में समर्थ हैं ; जिनसे अनेक प्रकार के अनेक स्वर्गलोक प्रकट हुए हैं, उन गणेश का हम सदा ही नमन एवं भजन करते हैं।

यतो वेदवाचो विकुण्ठा मनोभिः
सदा नेति नेतीत यत्ता गृणन्ति ।

परब्रह्मरूपं चिदानन्दभूतं
सदा तं गणेशं नमामो भजामः ।। 8 ।।

अर्थात् :- जिनके विषय में वेदवाणी कुण्ठित है ; जहाँ मन की भी पहुँच नहीं है तथा श्रुति सदा सावधान रहकर ‘ नेति-नेति ‘ – इन शब्दों द्वारा जिनका वर्णन करती है ; जो सच्चिदानन्द स्वरुप परब्रह्म हैं, उन गणेश का हम सदा ही नमन एवं भजन करते हैं।

श्रीगणेश उवाच

पुनरुचे गणाधीशः स्तोत्रमेतत्पठेन्नरः
त्रिसंध्यं त्रिदिनं तस्य सर्वं कार्यं भविष्यति ।। 9 ।।

अर्थात् :- श्रीगणेश जी बोले – जो मनुष्य तीन दिनों तक तीनों संध्याओं के समय इस स्तोत्र का पाठ करेगा, उसके सारे कार्य सिद्ध हो जायँगे।

यो जपेदष्टदिवसं श्लोकाष्टकमिदं शुभम् ।
अष्टवारं चतुर्थ्यां तु सोऽष्टसिद्धीरवाप्नुयात् ।। 10 ।।

अर्थात् :- जो आठ दिनों तक इन आठ श्लोकों का एक बार पाठ करेगा और चतुर्थी तिथि को आठ बार इस स्तोत्र को पढ़ेगा, वह आठों सिद्धियों को प्राप्त कर लेगा।

यः पठेन्मासमात्रं तु दशवारं दिने दिने ।
स मोचयेद् बन्धगतं राजवध्यं न संशयः ।। 11 ।।

अर्थात् :- जो एक मास तक प्रतिदिन दस-दस बार इस स्तोत्र का पाठ करेगा, वह कारागार में बँधे हुए तथा राजा के द्वारा वध-दण्ड पाने वाले कैदी को भी छुड़ा लेगा, इसमें संशय नहीं है।

विद्याकामो लभेद्विद्यां पुत्रार्थी पुत्रमाप्नुयात् ।
वाञ्छिताँल्लभते सर्वानेकविंशतिवारतः ।। 12 ।।

अर्थात् :- इस स्तोत्र का इक्कीस बार पाठ करने से विद्यार्थी विद्या को, पुत्रार्थी पुत्र को तथा कामार्थी समस्त मनोवांछित कामनाओं को प्राप्त कर लेता है।

यो जपेत् परया भक्त्या गजाननपरो नरः ।
एवमुक्त्वा ततो देवाश्चान्तर्धानं गतः प्रभुः ।। 13 ।।

अर्थात् :- जो मनुष्य पराभक्ति से इस स्तोत्र का जप करता है, वह गजानन का परम भक्त हो जाता है – ऐसा कहकर भगवान् गणेश वहीं अन्तर्धान हो गये।

।। इस प्रकार श्रीगणेशपुराण में श्रीगणेशाष्टक सम्पूर्ण हुआ ।।

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