Ganesh Ji Ke Swaroop / श्री गणेश जी के स्वरुप

Shri Ganesh Ji Ke Swaroopon Ke Dhyan
श्री गणेश जी के स्वरुपों के ध्यान


भगवान् गणेश

सिन्दूरवर्णं द्विभुजं गणेशं
लम्बोदरं पद्मदले निविष्टम् ।
ब्रह्मादिदेवैः परिसेव्यमानं
सिद्धैर्युतं तं प्रणमामि देवम् ।।

अर्थात् :- सच्चिदानन्दमय भगवान् गणेश की अंगकान्ति सिन्दूर के समान है, उनकी दो भुजाएँ हैं, वे लम्बोदर हैं और कमलदल पर विराजमान हैं। ब्रह्मा आदि देवता उनकी सेवा में लगे हैं तथा वे सिद्ध समुदाय से युक्त हैं, ऐसे श्रीगणपति देव को मैं प्रणाम करता हूँ।

गजवक्त्र

अविरलमदधाराधौतकुम्भः शरण्यः
फणिवरवृतगात्रः सिद्धसाध्यादिवन्द्यः ।
त्रिभुवनजनविघ्नध्वान्तविध्वंसदक्षो
वितरतु गजवक्त्रः संततं मङ्गलं वः ।।

अर्थात् :- जिनका कुम्भस्थल निरन्तर बहने वाली मद धारा से धुला हुआ है ; जो सबके शरणदाता हैं ; जिनके शरीर में बड़े-बड़े सर्प लिपटे रहते हैं ; जो सिद्ध और साध्य आदि देवताओं के वन्दनीय हैं तथा तीनों लोकों के निवासी-जनों के विघ्नान्धकार का विध्वंस करने में दक्ष ( चतुर ) हैं, वे गजानन गणेश आपलोगों को सदा मंगल प्रदान करें।

महागणपति

ओङ्कारसंनिभमिभाननमिन्दुभालं
मुक्ताग्रबिन्दुममलद्युतिमेकदन्तम् ।
लम्बोदरं कलचतुर्भुजमादिदेवं
ध्यायेन्महागणपतिं मतिसिद्धिकान्तम् ।।

अर्थात् :- ओंकार-सदृश, हाथी के-से मुखवाले तथा जिनके ललाट पर चन्द्रमा और बिन्दु तुल्य मुक्ता विराजमान है, जो बड़े तेजस्वी और एक दाँत वाले हैं, जिनका उदर लम्बायमान है, जिनकी चार सुन्दर भुजाएँ हैं, उन बुद्धि और सिद्धि के स्वामी आदिदेव गणेश जी का हम ध्यान करते हैं।

विघ्नेश्वर

विघ्नध्वान्तनिवारणैकतरणिर्विघ्नाटवीहव्यवाङ्
विघ्नव्यालकुलाभिमानगरुडो विघ्नेभपञ्चाननः ।
विघ्नोत्तुंगगिरिप्रभेदनपविर्विघ्नाम्बुधौ वाडवो
विघ्नाघौघघनप्रचण्डपवनो विघ्नेश्वरः पातु वः ।।

अर्थात् :- वे विघ्नेश्वर आपलोगों की रक्षा करें, जो विघ्नान्धकार का निवारण करने के लिये एकमात्र सूर्य हैं, विघ्नरूपी विपिन को जलाकर भस्म करने के लिये दावानल रूप हैं, विघ्नरूपी सर्पकुल के अभिमान को कुचल डालने के लिये गरुड़ हैं, विघ्नरूपी गजराज को पछाड़ने के लिये सिंह हैं, विघ्नों को ऊँचे पर्वत का भेदन करने के लिये वज्र हैं, विघ्न-समुद्र के लिये वड़वानल हैं तथा विघ्न एवं पाप समूह रूपी मेघों की घटा को छिन्न-भिन्न करने के लिये प्रचण्ड पवन हैं।

गणपति

सिन्दूराभं त्रिनेत्रं पृथुतरजठरं हस्तपद्मैर्दधानं
दन्तं पाशाङ्कुशेष्टान्युरुकरविलसद् बीजपूराभिरामम् ।
बालेन्दुद्योतमौलिं करिपतिवदनं दानपूरार्द्रगण्डं
भोगीन्द्राबद्धभूषं भजत गणपतिं रक्तवस्त्राङ्गरागम् ।।

अर्थात् :- जो सिन्दूर की-सी अंगकान्ति धारण करने वाले और त्रिनेत्रधारी हैं ; जिनका उदर बहुत विशाल है ; जो अपने चार हस्त-कमलों में दन्त, पाश, अंकुश और वर-मुद्रा धारण करते हैं ; जिनके विशाल शुण्ड-दण्ड में बीजपूर ( बिजौरा नीबू और अनार ) शोभा दे रहा है ; जिनका मस्तक बालचन्द्र से दीप्तिमान् और गण्डस्थल मद के प्रवाह से आर्द्र है ; नागराज को जिन्होंने भूषण के रूप में धारण किया है तथा जो लाल वस्त्र और अरुण अंगराग से सुशोभित हैं, उन गजेन्द्र-वदन गणपति का भजन करो।

एकाक्षरगणपति

रक्तो रक्ताङ्गरागांशुककुसुमयुतस्तुन्दिलश्चन्द्रमौलि –
र्नेत्रेर्युक्तस्त्रिभिर्वामनकरचरणो बीजपूरान्तनासः ।
हस्ताग्राक्लृप्तपाशांकुशशरदवरदो नागवक्त्रो हिभूषोऽहिभूषो
देवः पद्मासनो वो भवतु नतसुरो भूतये विघ्नराजः ।।

अर्थात् :- वे विघ्ननाशक श्रीगणपति शरीर से रक्तवर्ण हैं। उन्होंने लाल रंग के ही अंगराग, वस्त्र और पुष्पहार धारण कर रखे हैं। वे लम्बोदर हैं ; उनके मस्तक पर चन्द्राकार मुकुट है ; उनके तीन नेत्र हैं और हाथ-पैर छोटे-छोटे हैं ; उन्होंने शुण्डाग्र भाग में बीजपूर ( बिजौरा नीबू ) ले रखा है ; उनके हस्ताग्र भाग में पाश, अंकुश, दन्त तथा वरद ( मुद्रा ) सुशोभित हैं ; उनका मुख गज के समान है और सर्पमय आभूषण धारण किये हैं। वे कमल के आसन पर विराजमान हैं और समस्त देवता उनके चरणों में नतमस्तक हैं ; ऐसे विघ्नराजदेव आपलोगों के लिये कल्याणकारी हों।

और पढ़ें

Leave a Comment

error: Content is protected !!