Ganesh Kavi Ashtakam / श्री गणेश कवि अष्टकम्

Shri Ganesh Kavi Ashtakam
श्री गणेश कवि अष्टकम्


चतुःपष्टिकोट्याख्यविद्याप्रदं त्वां

सुराचार्यविद्याप्रदानापदानम् ।

कठाभीष्टविद्यार्पकं दन्तयुग्मं
कविं बुद्धिनाथं कवीनां नमामि ।। 1 ।।

अर्थात् :- हे गणेश्वर ! आप चौंसठ कोटि विद्याओं के दाता तथा देवताओं के आचार्य बृहस्पति को भी विद्या-प्रदान का कार्य पूर्ण करने वाले हैं। कठ को अभीष्ट विद्या देने वाले भी आप ही हैं। ( अथवा आप कठोपनिषद् रूपा अभीष्ट विद्या के दाता हैं। ) आप द्विरद हैं, कवि हैं और कवियों की बुद्धि के स्वामी हैं ; मैं आपको प्रणाम करता हूँ।

स्वनाथं प्रधानं महाविघ्ननाथं
निजेच्छाविसृष्टाण्डवृन्देशनाथम् ।

प्रभुं दक्षिणास्यस्य विद्याप्रदं त्वां
कविं बुद्धिनाथं कवीनां नमामि ।। 2 ।।

अर्थात् :- आप ही अपने स्वामी एवं प्रधान हैं। बड़े-बड़े विघ्नों के नाथ हैं। स्वेच्छा से रचित ब्रह्माण्ड-समूह के स्वामी और रक्षक भी आप ही हैं। आप दक्षिणास्य के प्रभु एवं विद्यादाता हैं। आप कवि हैं एवं कवियों के लिये बुद्धिनाथ हैं ; मैं आपको प्रणाम करता हूँ।

विभो व्यासशिष्यादिविद्याविशिष्ट-
प्रियानेकविद्याप्रदातारमाद्यम् ।

महाशाक्तदीक्षागुरुं श्रेष्ठदं त्वां
कविं बुद्धिनाथं कवीनां नमामि ।। 3 ।।

अर्थात् :- हे विभो ! आप व्यास-शिष्य आदि विद्या विशिष्ट प्रियजनों को अनेक विद्या प्रदान करने वाले और सबके आदि पुरुष हैं। महाशाक्त-मन्त्र की दीक्षा के गुरु एवं श्रेष्ठ वस्तु प्रदान करने वाले आप कवि एवं कवियों के बुद्धिनाथ को मैं प्रणाम करता हूँ।

विद्यात्रे त्रयीमुख्यवेदांश्च योगं
महाविष्णवे चागमाञ् शङ्कराय ।

दिशन्तं च सूर्याय विद्यारहस्यं
कविं बुद्धिनाथं कवीनां नमामि ।। 4 ।।

अर्थात् :- जो विधाता ( ब्रह्माजी )-को ‘ वेदत्रयी ‘ के नाम से प्रसिद्ध मुख्य वेदों का, महाविष्णु को योग का, शंकर के आगमों का और सूर्य देव को विद्या के रहस्य का उपदेश देते हैं, उन कवियों के बुद्धिनाथ एवं कवि गणेशजी को मैं नमस्कार करता हूँ।

महाबुद्धिपुत्राय चैकं पुराणं
दिशन्तं गजास्यस्य माहात्म्ययुक्तम् ।

निजज्ञानशक्त्या समेतं पुराणं
कविं बुद्धिनाथं कवीनां नमामि ।। 5 ।।

अर्थात् :- महाबुद्धि-देवी के पुत्र के प्रति गजानन के माहात्म्य से युक्त तथा निज ज्ञानशक्ति से सम्पन्न एक पुराण का उपदेश देने वाले गणेश को, जो कवि एवं कवियों के बुद्धिनाथ हैं, मैं प्रणाम करता हूँ।

त्रयीशीर्षसारं रुचानेकमारं
रमाबुद्धिदारं परं ब्रह्मपारम् ।

सुरस्तोमकायं गणौघाधिनाथं
कविं बुद्धिनाथं कवीनां नमामि ।। 6 ।।

अर्थात् :- जो वेदान्त के सार तत्त्व, अपने तेज से अनेक असुरों का संहार करने वाले, सिद्धि-लक्ष्मी एवं बुद्धि को दारा के रूप में अंगीकार करने वाले और परात्पर ब्रह्म-स्वरुप हैं, देवताओं का समुदाय जिनका शरीर है तथा जो गण-समुदाय के अधीश्वर हैं, उन कवि एवं कवियों के बुद्धिनाथ गणेश को मैं नमस्कार करता हूँ।

चिदानन्दरूपं मुनिध्येयरूपं
गुणातीतमीशं सुरेशं गणेशम् ।

धरानन्दलोकादिवासप्रियं त्वां
कविं बुद्धिनाथं कवीनां नमामि ।। 7 ।।

अर्थात् :- जो ज्ञानानन्द स्वरुप, मुनियों के ध्येय तथा गुणातीत हैं ; धरा एवं स्वानन्द लोक आदि का निवास जिन्हें प्रिय है ; उन ईश्वर, सुरेश्वर, कवि तथा कवियों के बुद्धिनाथ गणेश को मैं प्रणाम करता हूँ।

अनेकप्रतारं सुरक्ताब्जहारं
परं निर्गुणं विश्वसद्ब्रह्मरूपम् ।

महावाक्यसन्दोहतात्पर्यमूर्तिं
कविं बुद्धिनाथं कवीनां नमामि ।। 8 ।।

अर्थात् :- जो अनेकानेक भक्तजनों को भवसागर से पार करने वाले हैं, लाल कमल के फूलों का हार धारण करते हैं, परम निर्गुण हैं ; विश्वात्मक सद् ब्रह्म जिनका रूप है, ‘ तत्त्वमसि ‘ आदि महाकाव्यों के समूह का तात्पर्य जिनका श्रीविग्रह है, उन कवि एवं कवियों के बुद्धिनाथ गणेश को मैं प्रणाम करता हूँ।

इदं ये तु कव्यष्टकं भक्तियुक्ता-
स्त्रिसन्ध्यं पठन्ते गजास्यं स्मरन्तः ।

कवित्वं सुवाक्यार्थमत्यद्भुतं ते
लभन्ते प्रसादाद् गणेशस्य मुक्तिम् ।। 9 ।।

अर्थात् :- जो भक्ति-भाव से युक्त ही तीनों सन्ध्याओं के समय गजानन का स्मरण करते हुए ‘ कव्यष्टक ‘ का पाठ करते हैं, वे गणेशजी के कृपा प्रसाद से कवित्व, सुन्दर एवं अद्भुत वाक्यार्थ तथा मानव-जीवन के चरम लक्ष्य मोक्ष को प्राप्त कर लेते हैं।

।। इस प्रकार ब्रह्मपुराणान्तर्गत श्रीवाल्मीकिकृत श्रीगणेशकव्यष्टक सम्पूर्ण हुआ ।।

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