Ganesh Namashtakam Stotram / गणेश नामाष्टकं स्तोत्रम्

Shri Ganesh Namashtakam Stotram
श्री गणेश नामाष्टकं स्तोत्रम्


विष्णुरुवाच

गणेशमेकदन्तं च हेरम्बं विघ्ननायकम् ।
लम्बोदरं शूर्पकर्णं गजवक्त्रं गुहाग्रजम् ।। 1 ।।

नामाष्टार्थं च पुत्रस्य शृणु मातर्हरप्रिये ।
स्तोत्राणां सारभूतं च सर्वविघ्नहरं परम् ।। 2 ।।

अर्थात् :- विष्णु जी [ पार्वती जी से बोले ] – हे माता ! आपके पुत्र के ‘ गणेश, एकदन्त, हेरम्ब, विघ्ननायक, लम्बोदर, शूर्पकर्ण, गजवक्त्र और गुहाग्रज ‘ – ये आठ नाम हैं – इन आठ नामों का अर्थ सुनिये। हे शिवप्रिये ! यह उत्तम ( नामाष्टकस्तोत्र ) सभी स्तोत्रों का सारभूत और सम्पूर्ण विघ्नों का निवारण करने वाला है।

ज्ञानार्थवाचको गश्च णश्च निर्वाणवाचकः ।
तयोरीशं परं ब्रह्म गणेशं प्रणमाम्यहम् ।। 3 ।।

अर्थात् :- ‘ ग ‘ ज्ञानार्थ वाचक और ‘ ण ‘ निर्वाण वाचक है। इन दोनों ( ग + ण ) – के जो ईश हैं, उन परब्रह्म ‘ गणेश ‘ को मैं प्रणाम करता हूँ।

एकशब्दः प्रधानार्थो दन्तश्च बलवाचकः ।
बलं प्रधानं सर्वस्मादेकदन्तं नमाम्यहम् ।। 4 ।।

अर्थात् :- ‘ एक ‘ शब्द प्रधानार्थक है और ‘ दन्त ‘ बलवाचक है ; अतः जिनके बल सबसे बढ़कर है, उन ‘ एकदन्त ‘ को मैं नमस्कार करता हूँ।

दीनार्थवाचको हेश्च रम्बः पालकवाचकः ।
दीनानां परिपालकं हेरम्बं प्रणमाम्यहम् ।। 5 ।।

अर्थात् :- ‘ हे ‘ दीनार्थ वाचक और ‘ रम्ब ‘ पालक का वाचक है ; अतः दीनों का पालन करने वाले ‘ हेरम्ब ‘ को मैं शीश नवाता हूँ।

विपत्तिवाचको विघ्नो नायकः खण्डनार्थकः ।
विपत्खण्डनकारकं नमामि विघ्ननायकम् ।। 6 ।।

अर्थात् :- ‘ विघ्न ‘ विपत्ति वाचक और ‘ नायक ‘ खण्डनार्थक है ; इस प्रकार जो विपत्ति के विनाशक हैं, उन ‘ विघ्ननायक ‘ का मैं अभिवादन करता हूँ।

विष्णुदत्तैश्च नैवेधैर्यस्य लम्बोदरं पुरा ।
पित्रा दतैश्च विविधैर्वन्दे लम्बोदरं पुरा ।। 7 ।।

अर्थात् :- पूर्वकाल में विष्णु द्वारा दिये गये नैवेद्यों तथा पिता द्वारा समर्पित अनेक प्रकार के मिष्टान्नों के खाने से जिनका उदार लम्बा हो गया है, उन ‘ लम्बोदर ‘ की मैं वन्दना करता हूँ।

शूर्पाकारौ च यत्कर्णाै विघ्नवारणकारणौ ।
सम्पदौ ज्ञानरूपौ च शूर्पकर्णं नमाम्यहम् ।। 8 ।।

अर्थात् :- जिनके कर्ण शूर्पाकार, विघ्न-निवारण के हेतु, सम्पदा के दाता और ज्ञानरूप हैं, उन ‘ शूर्पकर्ण ‘ को मैं सिर झुकाता हूँ।

विष्णुप्रसादपुष्पं च यन्मूर्ध्नि मुनिदत्तकम् ।
तद्गजेन्द्रवक्त्रयुक्तं गजवक्त्रं नमाम्यहम् ।। 9 ।।

अर्थात् :- जिनके मस्तक पर मुनि द्वारा दिया गया विष्णु का प्रसाद रूप पुष्प वर्तमान है और जो गजेन्द्र के मुख से युक्त हैं, उन ‘ गजवक्त्र ‘ को मैं नमस्कार करता हूँ।

गुहस्याग्रे च जातोऽयमाविर्भूतो हरालये।
वन्दे गुहाग्रजं देवं सर्वदेवाग्रपूजितम् ।। 10 ।।

अर्थात् :- जो गुह ( स्कन्द ) – से पहले जन्म लेकर शिव-भवन में आविर्भूत हुए हैं तथा समस्त देवगणों में जिनकी अग्र पूजा होती है, उन ‘ गुहाग्रज ‘ की मैं वन्दना करता हूँ।

एतन्नामाष्टकं स्तोत्रं नानार्थसंयुतं शुभम् ।
त्रिसंध्यं यः पठेन्नित्यं स सुखी सर्वतो जयी ।। 11 ।।

अर्थात् :- इस ‘ नामाष्टकस्तोत्र ‘ का जो नाना अर्थों से संयुक्त एवं शुभकारक है, जो नित्य तीनों संध्याओं के समय पाठ करता है, वह सुखी और सर्वत्र विजयी होता है।

ततो विघ्नाः पलायन्ते वैनतेयाद् यथोरगाः ।
गणेश्वरप्रसादेन महाज्ञानी भवेद् ध्रुवम् ।। 12 ।।

अर्थात् :- उसके पास से विघ्न उसी प्रकार भाग जाते हैं, जैसे गरुड़ के निकट से साँप। गणेश्वर की कृपा से वह निश्चय ही महान् ज्ञानी हो जाता है।

पुत्रार्थी लभते पुत्रं भार्यार्थी विपुलां स्त्रियम् ।
महाजडः कवीन्द्रश्च विद्यावांश्च भवेद् ध्रुवम् ।। 13 ।।

अर्थात् :- पुत्रार्थी को पुत्र और भार्या की कामनावाले को उत्तम स्त्री मिल जाती हैं तथा महामूर्ख निश्चय ही विद्वान् और श्रेष्ठ कवि हो जाता है।

।। इस प्रकार श्रीब्रह्मवैवर्तपुराण के अन्तर्गत गणपतिखण्ड में श्रीगणेशनामाष्टकस्तोत्र सम्पूर्ण हुआ ।।

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