Ganesh Neerajanam / श्री गणेश नीराजनम्

Shri Ganesh Neerajanam
श्री गणेश नीराजनम्


जय देव जय देव गजमुख सुखहेतो ।

नेतर्विघ्नगणानां जाड्यार्णवसेतो ।। ध्रुवपदम् ।।

येन भवदुपायनतां नीता नवदूर्वा ।
विद्यासम्पत्कीर्तिस्तेनाप्तापूर्वा ।
मुक्तिर्लभ्या सुखतस्तव नित्यापूर्वा ।
धार्या जगतः स्थितये भूमौ दिवि धूर्वा ।। जय० ।। 1 ।।

अर्थात् :- हे सुख की प्राप्ति के हेतुभूत गजाननदेव ! आपकी जय हो, जय हो। हे विघ्नगानों के नायक तथा जडता ( अज्ञान )- रूपी सागर से पार होने के लिये सेतुरूप विनयकदेव ! आपकी जय हो। जिस पुण्यात्मा ने आपको नूतन दूर्वादल का उपहार अर्पित किया, उसने अपूर्व विद्या, संपत्ति एवं कीर्ति प्राप्त कर ली। आपकी कृपा से नित्य, अपूर्व मुक्ति अनायास प्राप्त की जा सकती है। भूतल पर अथवा स्वर्गलोक में सर्वत्र सम्पूर्ण जगत् की रक्षा के लिये दायित्त्व का भार आप ही वहन करते हैं। हे देव ! आपकी जय हो।

प्रथमनमस्कृतिभाक्त्वं तव लोकप्रथितम् ।
दृष्टं सद्वयवहारे गुरुभिरपि च कथितम् ।
यः कश्चन विमुखस्त्वयि निजसिद्धेः पथि तम् ।
विविधा विघ्ना भगवन् कुर्वन्ति व्यथितम् ।। जय० ।। 2 ।।

अर्थात् :- हे भगवन् ! आपके सबसे प्रथम नमस्कार-भाजन ( वन्दनीय ) होने की बात लोक में प्रसिद्ध है। यह परम्परागत सद्वयवहार में भी देखी गयी है तथा गुरुजनों द्वारा भी बतायी गयी है। जो कोई भी आपसे विमुख हुआ, उसे उसकी साधना के मार्ग पर नाना प्रकार के विघ्न आकर पीड़ा ( बाधा ) देते हैं। हे देव ! आपकी जय हो।

बालं सकृदनुसरति त्वद्दृष्टिश्चेत्ता ।
मनुराशीनिव दासीर्विद्याः स हि वेत्ता ।
पविपाणिरिव परं परपक्षाणां भेत्ता ।
भवति मयूरो हेरिव मोहस्यच्छेत्ता ।। जय० ।। 3 ।।

अर्थात् :- यदि आपकी कृपा-दृष्टि एक बार भी बालक पर पड़ जाती है तो वह मन्त्रराशि-तुल्य उन विद्याओं को इस प्रकार प्राप्त कर लेता है, मानो वे उसकी दासियाँ हों। जैसे वज्रपाणि इन्द्र ने पर्वतों की पाँखें काट डाली थीं, उसी प्रकार वह परपक्ष ( वादी के मत )- का खण्डन करने में समर्थ होता है; तथा जैसे मयूर सर्प को विदीर्ण कर देता है, उसी प्रकार वह विद्वान् बालक मोह का छेदन करने वाला होता है। हे देव ! आपकी जय हो।

।। इस प्रकार कविवर मोरोपन्तकृत श्रीगणेशनीराजन सम्पूर्ण हुआ ।।

 

श्रीगणेश जी के विभिन्न मन्त्र

श्रीमहागणपतिस्वरुप प्रणव-मन्त्र — ‘ ॐ ‘।
श्रीमहागणपति का प्रणव-सम्पुटित बीज-मन्त्र – ‘ ॐ गं ॐ ‘ ।
सबीज गणपति-मन्त्र – ‘ गं गणपतये नमः ‘।
प्रणवादि सबीज गणपति-मन्त्र ‘ ॐ गं गणपतये नमः ‘।

नाम मन्त्र —

ॐ नमो भगवते गजाननाय।  ( द्वादशाक्षर )
श्री गणेशाय नमः।  ( सप्ताक्षर )
ॐ श्रीगणेशाय नमः। ( अष्टाक्षर )
उच्छिष्टगणपति-नवार्णमन्त्र — ‘ ॐ हस्ति पिशाचि लिखे स्वाहा ‘।
एकोनविंशत्यक्षरोच्छिष्टगणपतिमन्त्र — ‘ ॐ नम उच्छिष्टगणेशाय हस्ति पिशाचि लिखे स्वाहा। ‘

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