Ganesh Nirajan / श्री गणेश नीराजन

Shri Ganesh Nirajan
श्री गणेश नीराजन


विघ्नध्वान्तविनाशनसुप्रभमुखकमलं

दिव्यज्ञानानन्दितमेकामलरदनम् ।

मोदकमोदं देवं जय मङ्गलसदनं
वञ्छितफलदं वन्दे स्तम्बेरमवदनम् ।। 1 ।।

अर्थात् :- जिनका उत्तम प्रभा से विभासमान मुखारविन्द विघ्नरूपी अन्धकार का विनाश करने वाला है ; जो दिव्य ज्ञानजनित आनन्द में मग्न रहते हैं ; जिनका एक ही निर्मल दन्त प्रकाशमान है ; जो मोदक ( मिष्टान्न )- से मुदित होने वाले देवता हैं ; विजय और मंगल के आवासस्थान हैं ; जिनका मुख हाथी के मुख के सदृश है तथा जो मनवांछित फल देने वाले हैं, उन श्रीगणेश की मैं वन्दना करता हूँ। हे मंगलमूर्ति देवता ! आपकी जय हो, जय हो, जय हो। शुभ मुहूर्त में आपकी पूजा की गयी है ; इसे तथा इस दीपमयी आरती को स्वीकार करें। जय देव ! जय देव !

भ्रमदलिकुम्भं शुण्डास्तम्भितमददम्भं
सिन्दूरारुणशोभं कृतरिपुसंक्षोभम् ।

शङ्करवंशस्तम्भं निर्जितमददम्भं
व्यापितसकलारम्भं वन्दे ब्रह्मनिभम् ।। 2 ।।

जय देव जय देव जय मङ्गलमूर्ते
दीपार्तीमङ्गीकुरु पूजां सुमुहूर्ते ।। 2 ।।

अर्थात् :- जिनके कुम्भस्थल पर भ्रमरों की भीड़ मँडरा रही है; जिन्होंने शुण्डदण्ड के प्रहार से मदासुर के दम्भ को स्तम्भित कर दिया था; जिनके अंगों पर सिन्दूर की अरुण शोभा फ़ैल रही है; जिन्होंने शत्रुदल में हलचल मचा दी थी; जो शंकरकुल के रक्षास्तम्भ स्वरुप हैं; जिन्होंने मद एवं दम्भ को पराजित कर दिया है; जो सम्पूर्ण कर्मों के आरम्भ में प्रथम पूज्य के रूप में व्याप्त हैं ; उन ब्रह्मतुल्य महामहिम गणेश की मैं वन्दना करता हूँ। हे मंगलमूर्ति देवता ! आपकी जय हो, जय हो, जय हो। शुभ मुहूर्त में आपकी पूजा की गयी है; इसे तथा इस दीपमयी आरती को आप स्वीकार करें। जय देव ! जय देव !

वृन्दारकवृन्दैरपि वन्दितपदकमलं
कमलजकमलाधववर्णितगुणगणममलम् ।

विद्यामण्डितदेहं पण्डितकुलपालं
शेषस्त्वामहमीडे सततं खलकालम् ।।

जय देव जय देव जय मङ्गलमूर्ते
दीपार्तीमङ्गीकुरु पूजां सुमुहर्ते ।। 3 ।।

अर्थात् :- देवताओं के समुदाय भी जिनके चरणारविन्दों की वन्दना करते हैं; ब्रह्मा और विष्णु भी जिनके गुणों का बखान करते हैं; जिनका स्वरुप निर्मल है; जिनकी देह विद्या से मण्डित है; जो पण्डितकुल के पालक हैं तथा दुष्टों के लिये कालरूप हैं, उन आप गणपति की मैं नागेश निरन्तर वन्दना करता हूँ।  हे मंगलमूर्ति देवता ! आपकी जय हो, जय हो, जय हो। शुभ मुहूर्त में आपकी पूजा की गयी है; इसे तथा इस दीपमयी आरती को आप स्वीकार करें। जय देव ! जय देव !

।। इस प्रकार श्रीनागेशपण्डितकृत श्रीगणेशनीराजन सम्पूर्ण हुआ ।।

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