Ganpati Aarti / श्री गणपति आरती

Shri Ganpati Aarti
श्री गणपति आरती


गणपति की सेवा मंगल मेवा सेवा से सब विघ्न टरैं ।

तीन लोक तैंतीस देवता द्वार खड़े सब अर्ज करैं ।। टेर ।।

ऋधिसिधि दक्षिण बाम विराजैं अरु आनंदसों चमर करैं ।
धूप दीप औलिया आरती भक्त खड्या जयकार करैं ।। गणप० ।। 1 ।।

गुड़ के मोदक भोग लगत हैं मूषक वाहन चढ़ा सरैं ।
सौम्य रूप से ये गणपति को विघ्न भाजज्या दूर परैं ।। गणप० ।। 2 ।।

भादौं मास और शुक्ल चतुर्थी दिन दोपारा पूर परैं ।
लियो जन्म गणपति प्रभुजी सुनि दुर्गा मन आनंद भरैं ।। गणप० ।। 3 ।।

अद्भुत बाजा बज्या इंद्र का देव वधू जहँ गान करैं ।
श्रीशंकर के आनँद उपज्यो नाम सुन्या सब विघ्न टरैं ।। गणप० ।। 4 ।।

आनि विधाता बैठे आसन इंद्र अप्सरा निरत करैं ।
देख वेद ब्रह्माजी जाको विघ्नविनाशक नाम धरैं ।। गणप० ।। 5 ।।

एकदंत गजवदन विनायक त्रिनयन रूप अनूप धरैं ।
पग थंभा सा उदर पुष्ट है देख चंद्रमा हास्य करैं ।। गणप० ।। 6 ।।

दै शराप श्रीचंद्र देव को कला हीन तत काल करैं ।
चौदा लोक में फिरैं गणपती तीन भुवन में राज्य करैं ।। गणप० ।। 7 ।।

उठ प्रभात जब करे ध्यान कोइ ताके कारज सर्व सरैं ।
पूजा काले गाव आरती ताके शिर यश छत्र फिरैं ।। गणप० ।। 8 ।।

गणपति की पूजा पेला करणी काम सबी निर्विघ्न सरैं ।
‘ श्रीपरताप ‘ गणपतीजी की हाथ जोड़कर स्तुति करैं ।।
गणपति की सेवा मंगल मेवा सेवा से सब विघ्न टरैं ।। 9 ।।

इसे भी पढ़ें :-

Leave a Comment

error: Content is protected !!