Shri Ganpati Stotram / श्री गणपति स्तोत्रम्

Shri Ganpati Stotram
श्री गणपति स्तोत्रम्


सुवर्णवर्णसुन्दरं सितैकदन्तबन्धुरं

गृहीतपाशकाङ्कुशं वरप्रदाभयप्रदम् ।

चतुर्भुजं त्रिलोचनं भुजङ्गमोपवीतिनं
प्रफुल्लवारिजासनं भजामि सिन्धुराननम् ।। 1 ।।

अर्थात् :- जो सुवर्ण के समान उज्जवल वर्ण से सुन्दर प्रतीत होता हैं ; एक ही श्वेत दन्त के द्वारा मनोहर जान पड़ते हैं ; जिन्होंने हाथों में पाश और अंकुश ले रखा है ; जो वर तथा अभय प्रदान करने वाले हैं ; जिनके चार भुजाएँ और तीन नेत्र हैं ; जो सर्पमय यज्ञोपवीत धारण करते हैं और प्रफुल्ल कमल के आसन पर बैठते हैं, उन गजानन का मैं भजन करता हूँ।

किरीटहारकुण्डलं प्रदीप्तबाहुभूषणं
प्रचण्डरत्नकङ्कणं प्रशोभिताङ्घ्रियष्टिकम् ।

प्रभातसूर्यसुन्दराम्बरद्वयप्रधारिणं
सरत्नहेमनूपुरप्रशोभिताङ्घ्रिपङ्कजम् ।। 2 ।।

अर्थात् :- जो किरीट, हार और कुण्डल के साथ उद्दीप्त बाहुभूषण धारण करते हैं ; चमकीले रत्नों का कंगन पहनते हैं ; जिनके दण्डोपम चरण अत्यन्त शोभाशाली हैं ; जो प्रभातकाल के सूर्य के समान सुन्दर और लाल दो वस्त्र धारण करते हैं तथा जिनके युगल चरणारविन्द रत्नजटित सुवर्ण निर्मित नूपुरों से सुशोभित हैं, उन गणेशजी का मैं भजन करता हूँ।

सुवर्णदण्डमण्डितप्रचण्डचारुचामरं
गृहप्रदेन्दुसुन्दरं युगक्षणप्मोदितम् ।

कवीन्द्रचित्तरञ्जकं महाविपत्तिभञ्जकं
षडक्षरस्वरुपिणं भजे गजेन्द्ररूपिणम् ।। 3 ।।

अर्थात् :- जिनका विशाल एवं मनोहर चँवर सुवर्णमय दण्ड से मण्डित है ; जो सकाम भक्तों को गृह-सुख प्रदान करने वाले एवं चन्द्रमा एक समान सुन्दर हैं ; अति शीघ्र प्रसन्न होने वाले हैं ; जिनसे कवीश्वरों के चित्त का रंजन होता है ; जो बड़ी-बड़ी विपत्तियों का भंजन करने वाले और षडक्षर मन्त्र स्वरुप हैं, उन गजराज रूप धारी गणेश का मैं भजन करता हूँ।

विरिञ्चिविष्णुवन्दितं विरुपलोचनस्तुतं
गिरीशदर्शनेच्छया समर्पितं पराम्बया ।

निरन्तरं सुरासुरैः सपुत्रवामलोचनैः
महामखेष्टकर्मसु स्मृतं भजामि तुन्दिलम् ।। 4 ।।

अर्थात् :- ब्रह्मा और विष्णु जिनकी वन्दना तथा विरूपलोचन शिव जिनकी स्तुति करते हैं ; जो गिरीश ( शिव ) – के दर्शन की इच्छा से परा अम्बा पार्वतीद्वारा समर्पित हैं ; देवता और असुर अपने पुत्रों और वमलोचना पत्नियों के साथ बड़े-बड़े यज्ञों तथा अभीष्ट कर्मों में निरन्तर जिनका स्मरण करते हैं ; उन तुन्दिल देवता गणेश का मैं भजन करता हूँ।

मदौघलुब्धचञ्चलालिमञ्जुगुञ्जितारवं
प्रबुद्धचित्तरञ्जकं प्रमोदकर्णचालकम् ।

अनन्यभक्तिमानवं प्रचण्डमुक्तिदायकं
नमामि नित्यमादरेण वक्रतुण्डनायकम् ।। 5 ।।

अर्थात् :- जिनकी मदराशि पर लुभाये हुए चंचल भ्रमर मंजु गुंजारव करते रहते हैं ; जो ज्ञानीजनों के चित्त को आनन्द प्रदान करने वाले हैं ; अपने कानों को सानन्द हिलाया करते हैं और अनन्य भक्ति रखने वाले मनुष्यों को उत्कृष्ट मुक्ति देने वाले हैं, उन वक्रतुण्ड गणनायक का मैं प्रतिदिन आदरपूर्वक भजन करता हूँ।

दारिद्रयविद्रावणमाशु कामदं
स्तोत्रं पठेदेतदजस्त्रमादरात् ।

पुत्री कलत्रस्वजनेषु मैत्री
पुमान् भवेदेकवरप्रसादात् ।। 6 ।।

अर्थात् :- यह स्तोत्र दरिद्रता को शीघ्र भगाने वाला और अभीष्ट वस्तु को देने वाला है। जो निरन्तर आदरपूर्वक इसका पाठ करेगा, वह मनुष्य एकेश्वर गणेश की कृपा से पुत्रवान् तथा स्त्री एवं स्वजनों के प्रति मित्रभाव से युक्त होगा।

।। इस प्रकार श्रीशंकराचार्यविचरित श्रीगणपतिस्तोत्र सम्पूर्ण हुआ ।।

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