Shri Geeta Ji Ka Mahatmya / श्री गीता जी का माहात्म्य

अध्याय अठारह उपसंहार

Shri Geeta Ji Ka Mahatmya
श्री गीता जी का माहात्म्य

Shri Geeta Ji Ka Mahatmya, श्री गीता जी का माहात्म्य- यह गुह्यज्ञान उनको कभी भी न बताया जाय, जो न तो संयमी हैं, न एकनिष्ठ, न भक्ति में रत हैं, न ही उसे, जो मुझसे द्वेष करता है। जो व्यक्ति भक्तों को यह परम रहस्य बताता है, वह शुद्धभक्ति को प्राप्त करेगा और अन्त में वह मेरे पास वापस आएगा। और मैं घोषित करता हूँ कि जो हमारे इस पवित्र संवाद का अध्ययन करता है, वह अपनी बुद्धि से मेरी पूजा करता हैं। 

श्लोक 67 से 78

इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन ।
न चाशुश्रुषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति ।। 67 ।।

इदम् — यह ; ते — तुम्हारे द्वारा ; न — कभी नहीं ; अतपस्काय — असंयमी के लिए ; न — कभी नहीं ; अभक्ताय — अभक्त के लिए ; कदाचन — किसी समय ; न – कभी नहीं ; च — भी ; अशुश्रुषवे — जो भक्ति में रत नहीं है ; वाच्यम् — कहने के लिए ; न — कभी नहीं ; च — भी ; माम् — मेरे प्रति ; यः — जो ; अभ्यसूयति — द्वेष करता है। 

तात्पर्य — यह गुह्यज्ञान उनको कभी भी न बताया जाय, जो न तो संयमी हैं, न एकनिष्ठ, न भक्ति में रत हैं, न ही उसे, जो मुझसे द्वेष करता है।

य इदं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति
भक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशयः ।। 68 ।। 

यः — जो ; इदम् — इस ; परमम् — अत्यन्त ; गुह्यम् — रहस्य को ; मत् — मेरे ; भक्तेषु — भक्तों में से ; अभिधास्यति — कहता है ; भक्तिम् — भक्ति को ; मयि — मुझको ; पराम् — दिव्य ; कृत्वा — करके ; माम् — मुझको ; एव — निश्चय ही ; एष्याति — प्राप्त होता है ; असंशयः — इसमें कोई सन्देह नहीं ।

तात्पर्य — जो व्यक्ति भक्तों को यह परम रहस्य बताता है, वह शुद्धभक्ति को प्राप्त करेगा और अन्त में वह मेरे पास वापस आएगा ।

न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तमः ।
भविता न च मे तस्मादन्यः प्रियतरो भुवि ।। 69 ।।

न — कभी नहीं ; च — तथा ; तस्मात् — उसकी अपेक्षा ; मनुष्येषु — मनुष्यों में ; कश्चित् — कोई ; मे — मुझको ; प्रिय-कृत्-तमः — अत्यन्त प्रिय ; भविता — होगा ; न — न तो ; च — तथा ; मे — मुझको ; तस्मात् — उसकी अपेक्षा, उससे ; अन्यः — कोई दूसरा ; प्रिय-तरः — अधिक प्रिय ; भुवि — इस संसार में ।

तात्पर्य — इस संसार में उसकी अपेक्षा कोई अन्य सेवक न तो मुझे अधिक प्रिय है और न कभी होगा।

अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवादमावयोः ।
ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्टः स्यामिति मे मतिः ।। 70 ।।  

अध्येष्यते — अध्ययन या पाठ करेगा, च — भी ; यः — जो ; इमम् — इस ; धर्म्यम् — पवित्र ; संवादम् — वार्तालाप या संवाद को ; आवयोः — हम दोनों के ; ज्ञान — ज्ञान रूपी ; यज्ञेन — यज्ञ से ; तेन — उसके द्वारा ; अहम् — मैं ; इष्टः — पूजित ; स्याम् — होऊँगा ; इति — इस प्रकार ; मे — मेरा ; मतिः — मत।

तात्पर्य — और मैं घोषित करता हूँ कि जो हमारे इस पवित्र संवाद का अध्ययन करता है, वह अपनी बुद्धि से मेरी पूजा करता हैं।

श्रद्धावाननसूयश्च शृणुयादपि यो नरः
सोऽपि मुक्तः श्रुभाँल्लोकान्प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम् ।। 71 ।।

श्रद्धा-वान् — श्रद्धालु ; अनसूयः — द्वेषरहित ; च — तथा ; शृणुयात् — सुनता है ; अपि — निश्चय ही ; यः — जो ; नरः — मनुष्य ; सः — वह ; अपि — भी ; मुक्तः — मुक्त होकर ; श्रुभान् — शुभ ; लोकान् — लोकों को ; प्राप्नुयात् — प्राप्त करता है ; पुण्य-कर्मणाम् — पुण्यात्माओं का। 

तात्पर्य — और जो श्रद्धा समेत तथा द्वेषरहित होकर इसे सुनता है, वह सारे पापों से मुक्त हो जाता है और उन शुभ लोकों को प्राप्त होता है, जहाँ पुण्यात्माएँ निवास करती हैं।

कच्चिदेतच्छ्रुतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसा ।
कच्चिदज्ञानसम्मोहः प्रणष्टस्ते धनञ्जय ।। 72 ।। 

कच्चित् — क्या ; एतत् — यह ; श्रुतम् — सुना गया ; पार्थ — हे पृथापुत्र ; त्वया — तुम्हारे द्वारा ; एक-अग्रेण — एकाग्र ; चेतसा — मन के ; कच्चित् — क्या ; अज्ञान — अज्ञान का ; सम्मोहः — मोह, भ्रम ; प्रणष्टः — दूर हो गया ; ते — तुम्हारा ; धनञ्जय — हे सम्पत्ति के विजेता ( अर्जुन ) ।

तात्पर्य — हे पृथापुत्र ! हे धनञ्जय ! क्या तुमने इसे ( इस शास्त्र को ) एकाग्र चित्त होकर सुना ? और क्या अब तुम्हारा अज्ञान तथा मोह दूर हो गया है ?

इसे भी पढ़ें :–

  1. भगवद्गीता यथारूप हिंदी में
  2. अध्याय सात — भगवद्ज्ञान
  3. अध्याय नौ — परम गुह्य ज्ञान

अर्जुन उवाच — 
नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत ।

स्थितो स्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव ।। 73 ।।

अर्जुनः उवाच — अर्जुन ने कहा ; नष्टः — दूर हुआ ; मोहः — मोह ; स्मृतिः — स्मरण शक्ति ; लब्धा — पुनः प्राप्त हुई ; त्वत्-प्रसादात् — आपकी कृपा से ; मया — मेरे द्वारा ; अच्युत — हे अच्युत कृष्ण ; स्थितः — स्थित ; अस्मि — हूँ ; गत — दूर हुए ; सन्देहः — सारे संशय ; करिष्ये — पूरा करूँगा ; वचनम् — आदेश को ; तव — तुम्हारे ।

तात्पर्य — अर्जुन ने कहा — हे कृष्ण, हे अच्युत ! अब मेरा मोह दूर हो गया। आपके अनुग्रह से मुझे मेरी स्मरण शक्ति वापस मिल गई। अब मैं संशयरहित तथा दृढ हूँ और आपके आदेशानुसार कर्म करने के लिए उद्यत हूँ।

सञ्जय उवाच — 
इत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः ।

संवादमिममश्रौषमद्भुतं रोमहर्षणम् ।। 74 ।।

सञ्जयः उवाच — संजय ने कहा ; इति — इस प्रकार ; अहम् — मैं ; वासुदेवस्य — कृष्ण का ; पार्थस्य — तथा अर्जुन का ; च — भी ; महा-आत्मनः — महात्माओं का ; संवादम् — वार्ता ; इमम् — यह ; अश्रौषम् — सुनी है ; अद्भुतम् — रोम-हर्षणम् — रोंगटे खड़ी करने वाली।

तात्पर्य — संजय ने कहा — इस प्रकार मैंने कृष्ण तथा अर्जुन इन दोनों महापुरुषों की वार्ता सुनी। और यह सन्देश इतना अद्भुत है कि मेरे शरीर में रोमांच हो रहा है।

व्यासप्रसादछ्रुतवानेतद्गुह्यमहं परम् ।
योगं योगेश्वरात्कृष्णात्साक्षात्कथयतः स्वयम् ।। 75 ।।

व्यास-प्रसादात् — व्यासदेव की कृपा से ; श्रुतवान् — सुना है ; एतत् — इस् ; गुह्यम् — गोपनीय ; अहम् — मैंने ; परम् — परम ; योगम् — योग को ; योग-ईश्वरात् — योग के स्वामी ; कृष्णात् — कृष्ण से ; साक्षात् — साक्षात् ; कथयतः — कहते हुए ; स्वयम् — स्वयं।

तात्पर्य — व्यास की कृपा से मैंने ये परम गुह्य बातें साक्षात् योगेश्वर कृष्ण के मुख से अर्जुन के प्रति कही जाती हुई सुनीं।

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