Shri Parvati Stuti / श्री पार्वती स्तुति

Shri Parvati Stuti
श्री पार्वती स्तुति

Shri Parvati Stuti, श्री पार्वती स्तुति :- गिरिनन्दिनि ! आपके कन्धे सूर्यमण्डल के समान चमकते हुए सुशोभित हो रहे हैं। आपकी शरीरकान्ति प्रचुर सुवर्ण से परिपूर्ण सुमेरु गिरि की तरह है। आप विषैले सर्प रूपी तरकश से विभूषित हैं, मैं आपका आश्रय ग्रहण करता हूँ। आपने महेश्वर मण्डल को निर्मल योगबल से निर्मित अपने शरीर के तुल्य दुर्जय बना दिया है। आप मारे गये अन्धकासुर के भाई-बन्धुओं का संहार करने वाली हैं। सुरेश्वरों ने सर्वप्रथम आपकी स्तुति की है।

वीरक उवाच
नतसुरासुरमौलिमिलन्मणिप्रचयकान्तिकरालनखाङ्किते ।
नगसुते शरणागतवत्सले तव नतोऽस्मि नतार्तिविनाशिनि ।। 1 ।।

अर्थात् :- वीरक ने कहा – गिरिराजकुमारी ! आपके चरण-नख प्रणत हुए सुरों और असुरों के मुकुटों में लगी हुई मणि समूहों की उत्कट कान्ति से सुशोभित होते रहते हैं। आप शरणागतवत्सला तथा प्रणतजनों का कष्ट दूर करने वाली हैं। मैं आपके चरणों में नमस्कार करता हूँ।   

तपनमण्डलमण्डितकन्धरे पृथुसुवर्णनगद्यूते
विषभुजङ्गनिषङ्गविभूषिते गिरिसुते भवतीमहमाश्रये ।। 2 ।।

अर्थात् :- गिरिनन्दिनि ! आपके कन्धे सूर्यमण्डल के समान चमकते हुए सुशोभित हो रहे हैं। आपकी शरीरकान्ति प्रचुर सुवर्ण से परिपूर्ण सुमेरु गिरि की तरह है। आप विषैले सर्प रूपी तरकश से विभूषित हैं, मैं आपका आश्रय ग्रहण करता हूँ। 

इसे भी पढ़ें :- मीनाक्षी पंचरत्नम्

जगति कः प्रणताभिमतं ददौ झटिति सिद्धनुते भवती यथा ।
जगति कां च न वाञ्छति शङ्करो भुवनधृत्तनये भवतीं यथा ।। 3 ।। 

अर्थात् :- सिद्धों द्वारा नमस्कार की जानेवाली देवि ! आपके समान जगत् में प्रणतजनों के अभीष्ट को तुरंत प्रदान करने वाला दूसरा कौन है ? गिरिजे ! इस जगत् में भगवान् शंकर आपके समान किसी अन्य की इच्छा नहीं करते। 

विमलयोगविनिर्मितदुर्जयस्वतनुतुल्यमहेश्वरमण्डले ।
विदलितान्धकबान्धवसंहतिः सुरवरैः प्रथमं त्वमभिष्टुता ।। 4 ।।      

अर्थात् :- आपने महेश्वर मण्डल को निर्मल योगबल से निर्मित अपने शरीर के तुल्य दुर्जय बना दिया है। आप मारे गये अन्धकासुर के भाई-बन्धुओं का संहार करने वाली हैं। सुरेश्वरों ने सर्वप्रथम आपकी स्तुति की है। 

इसे भी पढ़ें :- श्री ललिता पंचकम्

सितसटापटलोद्धतकन्धराभरमहामृगराजरथस्थिता ।
विकलशक्तिमुखानलपिङ्गलायतभुजौघविपिष्टमहासुरा ।। 5 ।। 

अर्थात् :- आप श्वेत वर्ण की जटा (केश)- समूह से आच्छादित कन्धे वाले विशालकाय सिंहरूपी रथ पर आरूढ़ होती हैं। आपने चमकती हुई शक्ति के मुख से निकलने वाली अग्नि की कान्ति से पीली पड़ने वाली लम्बी भुजाओं से प्रधान-प्रधान असुरों को पीसकर चूर्ण कर दिया है। 

निगदिता भुवनैरिति चण्डिका जननि शुम्भनिशुम्भनिषूदनी ।
प्रणतचिन्तितदानवदानवप्रमथनैकरतिस्तरसा भुवि ।। 6 ।।

अर्थात् :- जननि ! त्रिभुवन के प्राणी आपको शुम्भ-निशुम्भ का संहार करने वाली चण्डिका कहते हैं। एकमात्र आप इस भूतल पर विनम्र जनों द्वारा चिन्तन किये गये प्रधान-प्रधान दानवों का वेगपूर्वक मर्दन करने में उत्साह रखनेवाली हैं।

आगे पढ़ें

इसे भी पढ़ें :- 

Leave a Comment

error: Content is protected !!