Shri Ram Guun Ka Mahatmya / श्री राम गुण का माहात्म्य

श्रीरामचरितमानस किष्किन्धाकाण्ड

Shri Ram Guun Ka Mahatmya
श्री राम गुण का माहात्म्य

Shri Ram Guun Ka Mahatmya, श्री राम गुण का माहात्म्य :- वानरों की सेना साथ लेकर राक्षसों का संहार करके श्रीरामजी सीताजी को ले आयेंगे। तब देवता और नारदादि मुनि भगवान् के तीनों लोकों को पवित्र करने वाले सुन्दर यश का बखान करेंगे, जिसे सुनने, गाने, कहने और समझने से मनुष्य परमपद पाते हैं और जिसे श्रीरघुवीर के चरणकमल का मधुकर ( भ्रमर ) तुलसीदास गाता है। श्रीरघुवीर का यश भव ( जन्म-मरण ) रूपी रोग की [ अचूक ] दवा है। जो पुरुष और स्त्री इसे सुनेंगे, त्रिशिरा के शत्रु श्रीरामजी उनके सब मनोरथों को सिद्ध करेंगे।  

 अंगद कहइ जाउँ मैं पारा। जियँ संसय कछु फिरती बारा ।।
जामवंत कह तुम्ह सब लायक। पठइअ किमि सबही कर नायक ।।

अर्थात् :- अंगद ने कहा – मैं पार तो चला जाऊँगा। परन्तु लौटते समय के लिये हृदय में कुछ सन्देह है। जाम्बवान् जी ने कहा – तुम प्रकार से योग्य हो। परन्तु तुम सबके नेता हो, तुम्हें कैसे भेजा जाय ? 

कहइ रीछपति सुनु हनुमाना। का चुप साधि रहेहु बलवाना ।।
पवन तनय बल पवन समाना। बुधि बिबेक बिग्यान निधाना ।।

अर्थात् :- ऋक्षराज जाम्बवान् जी ने श्रीहनुमान् जी से कहा – हे हनुमान् ! हे बलवान् ! सुनो, तुमने यह क्या चुप साध रखी है ? तुम पवन के पुत्र हो और बल में पवन के समान हो। तुम बुद्धि-विवेक और विज्ञान की खान हो।  

कवन सो काज कठिन जग माहीं। जो नहिं होइ तात तुम्ह पाहीं ।।
राम काज लगि तव अवतारा। सुनतहिं भयउ पर्बताकारा ।।

अर्थात् :- जगत् में कौन-सा ऐसा कठिन काम है जो हे तात ! तुमसे न हो सके। श्रीरामजी के कार्य के लिये ही तुम्हारा अवतार हुआ है। यह सुनते ही हनुमान् जी पर्वत की आकार से (  अत्यन्त विशालकाय ) हो गये। 

कनक बरन तन तेज बिराजा। मानहुँ अपर गिरिन्ह कर राजा ।।
सिंहनाद करि बारहिं बारा। लीलहिं नाघउँ जलनिधि खारा ।।

अर्थात् :- उनका सोने का-सा रंग है, शरीर पर तेज सुशोभित है, मानो दूसरा पर्वतों का राजा सुमेरु हो। हनुमान् जी ने बार-बार सिंहनाद करके कहा – मैं इस खारे समुद्र को खेल में ही लाँघ सकता हूँ। 

सहित सहाय रावनहि मारी। आनउँ इहाँ त्रिकूट उपारी ।।
जामवंत मैं पूँछउँ तोही। उचित सिखावनु दीजहु मोही ।।

अर्थात् :- और सहायकों सहित रावण को मारकर त्रिकूट पर्वत को उखाड़कर यहाँ ला सकता हूँ। हे जाम्बवान् ! मैं तुमसे पूछता हूँ, तुम मुझे उचित सीख देना [ कि मुझे क्या करना चाहिये ]। 

एतना करहु तात तुम्ह जाई। सीतहि देखि कहहु सुधि आई ।।
तब निज भुज बल राजिवनैना। कौतुक लागि संग कपि सेना ।।

अर्थात् :- [ जाम्बवान् जी ने कहा – ] हे तात ! तुम जाकर इतना ही करो कि सीताजी को देखकर लौट आओ और उनकी खबर कह दो। फिर कमलनयन श्रीरामजी अपने बाहुबल से [ ही राक्षसों का संहार कर सीताजी को ले आयेंगे, केवल ] खेल के लिये ही वे वानरों की सेना साथ लेंगे। 

छं० — कपि सेन संग सँघारि निसिचर रामु सीतहि आनिहैं ।
त्रैलोक पावन सुजसु सुर मुनि नारदादि बखानिहैं ।।
जो सुनत गावत कहत समुझत परम पद नर पावई ।
रघुबीर पद पाथोज मधुकर दास तुलसी गावई ।।

अर्थात् :- वानरों की सेना साथ लेकर राक्षसों का संहार करके श्रीरामजी सीताजी को ले आयेंगे। तब देवता और नारदादि मुनि भगवान् के तीनों लोकों को पवित्र करने वाले सुन्दर यश का बखान करेंगे, जिसे सुनने, गाने, कहने और समझने से मनुष्य परमपद पाते हैं और जिसे श्रीरघुवीर के चरणकमल का मधुकर ( भ्रमर ) तुलसीदास गाता है। 

दो० — भव भेषज रघुनाथ जसु सुनहिं जे नर अरु नारि ।
तिन्ह कर सकल मनोरथ सिद्ध करहिं त्रिसिरारि ।। 30 ( क ) ।।

अर्थात् :- श्रीरघुवीर का यश भव ( जन्म-मरण ) रूपी रोग की [ अचूक ] दवा है। जो पुरुष और स्त्री इसे सुनेंगे, त्रिशिरा के शत्रु श्रीरामजी उनके सब मनोरथों को सिद्ध करेंगे। 

सो० — नीलोत्पल तन स्याम काम कोटि सोभा अधिक ।
सुनिअ तासु गुन ग्राम जासु नाम अघ खग बधिक ।। 30 ( ख ) ।।

अर्थात् :- जिनका नीले कमल के समान श्याम शरीर है, जिनकी शोभा करोड़ों कामदेवों से भी अधिक है और जिनका नाम पापरूपी पक्षियों को मारने के लिये बधिक ( व्याधा ) के समान है, उन श्रीराम के गुणों के समूह ( लीला ) को अवश्य सुनना चाहिये। 

मासपारायण, तेईसवाँ विश्राम

इति श्रीमद्रामचरितमानसे सकलकलिकलुषविध्वंसने चतुर्थः सोपानः समाप्तः ।
कलियुग के समस्त पापों के नाश करनेवाले श्रीरामचरितमानस का यह चौथा सोपान समाप्त हुआ।

किष्किन्धाकाण्ड समाप्त

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