Shri Ram Ki Sugriv Par Naraji / श्री राम की सुग्रीव पर नाराजी

श्रीरामचरितमानस किष्किन्धाकाण्ड

श्री राम की सुग्रीव पर नाराजी, लक्ष्मण जी का कोप
Shri Ram Ki Sugriv Par Naraji, Lakshman Ji Ka Kop

Shri Ram Ki Sugriv Par Naraji, Lakshman Ji Ka Kop, श्री राम की सुग्रीव पर नाराजी, लक्ष्मण जी का कोप :- ज्ञानी मुनि जिन्होंने श्रीरघुनाथजी के चरणों में प्रीति मान ली है ( जोड़ ली है ), वे ही इस चरित्र ( लीलारहस्य  ) को जानते हैं। लक्ष्मणजी ने जब प्रभु को क्रोधयुक्त जाना, तब उन्होंने धनुष चढ़ाकर बाण हाथ में ले लिये। हे हनुमान् ! सुनो, तुम तारा को साथ ले जाकर विनती करके राजकुमार को समझाओ ( समझा-बुझाकर शान्त करो )। हनुमान् जी ने तारासहित जाकर लक्ष्मणजी के चरणों की वन्दना की और प्रभु के सुन्दर यश का बखान किया।  

बरषा गत निर्मल रितु आई। सुधि न तात सीता कै पाई ।।
एक बार कैसेहुँ सुधि जानौं। कालहु जीति निमिष महुँ आनौं ।।

अर्थात् :- वर्षा बीत गयी, निर्मल शरद्-ऋतु आ गयी। परन्तु हे तात ! सीता की कोई खबर नहीं मिली। एक बार कैसे भी पता पाऊँ तो काल को भी जीतकर पलभर में जानकीजी को ले आऊँ। 

कतहुँ रहउ जौं जीवति होई। तात जतन करि आनउँ सोई ।।
सुग्रीवहुँ सुधि मोरि बिसारी। पावा राज कोस पुर नारी ।।

अर्थात् :- कहीं भी रहे, यदि जीती होगी तो हे तात ! यत्न करके मैं उसे अवश्य लाऊँगा। राज्य, खजाना, नगर और स्त्री पा गया, इसलिये सुग्रीव ने मेरी सुधि भुला दी। 

जेहिं सायक मारा मैं बाली। तेहिं सर हतौं मूढ़ कहँ काली ।।
जासु कृपाँ छूटहिं मद मोहा। ता कहुँ उमा कि सपनेहुँ कोहा ।।

अर्थात् :- जिस बाण से मैंने बालि को मारा था, उसी बाण से कल उस मूढ़ को मारूँ ! [ शिवजी कहते हैं – ] हे उमा ! जिनकी कृपा से मद और मोह छूट जाते हैं, उनको कहीं स्वप्न में भो क्रोध आ सकता है ? [ यह तो लीलामात्र है ]। 

जानहिं यह चरित्र मुनि ग्यानी। जिन्ह रघुबीर चरन रति मानी ।।
लछिमन क्रोधवंत प्रभु जाना। धनुष चढाइ गहे कर बाना ।।

अर्थात् :- ज्ञानी मुनि जिन्होंने श्रीरघुनाथजी के चरणों में प्रीति मान ली है ( जोड़ ली है ), वे ही इस चरित्र ( लीलारहस्य  ) को जानते हैं। लक्ष्मणजी ने जब प्रभु को क्रोधयुक्त जाना, तब उन्होंने धनुष चढ़ाकर बाण हाथ में ले लिये। 

दो० — तब अनुजहि समुझावा रघुपति करुना सींव ।
भय देखाइ लै आवहु तात सखा सुग्रीव ।। 18 ।।

अर्थात् :- तब दया की सीमा श्रीरघुनाथजी ने छोटे भाई लक्ष्मणजी को समझाया कि हे तात ! सखा सुग्रीव को केवल भय दिखलाकर ले आओ [ उसे मारने की बात नहीं है ]।

इहाँ पवनसुत हृदयँ बिचारा। राम काजु सुग्रीवँ बिसारा ।।
निकट जाइ चरनन्हि सिरु नावा। चारिहु बिधि तेहि कहि समुझावा ।।

अर्थात् :- यहाँ ( किष्किन्धानगरी में ) पवनकुमार श्रीहनुमान् जी ने विचार किया कि सुग्रीव ने श्रीरामजी के कार्य को भुला दिया। उन्होंने सुग्रीव के पास जाकर चरणों में सिर नवाया। [ साम, दाम, दण्ड, भेद ] चारों प्रकार की नीति कहकर उन्हें समझाया। 

सुनि सुग्रीवँ परम भय माना। बिषयँ मोर हरि लीन्हेउ ग्याना ।।
अब मारुतसुत दूत समूहा। पठवहु जहँ तहँ बानर जूहा ।।

अर्थात् :- हनुमान् जी के वचन सुनकर सुग्रीव ने बहुत ही भय माना। [ और कहा – ] विषयों ने मेरे ज्ञान को हर लिया। अब हे पवनसुत ! जहाँ-तहाँ वानरों के यूथ रहते हैं ; वहाँ दूतों के समूह को भेजो। 

कहहु पाख महुँ आव न जोई। मोरें कर ता कर बध होई ।।
तब हनुमंत बोलाए दूता। सब कर करि सनमान बहूता ।।

अर्थात् :- और कहला दो कि एक पखवाड़े में ( पंद्रह दिनों में ) जो न आ जायगा, उसका मेरे हाथों वध होगा। तब हनुमान् जी ने दूतों को बुलाया और सबका बहुत सम्मान करके। 

भय अरु प्रीति नीति देखराई। चले सकल चरनन्हि सिर नाई ।।
एहि अवसर लछिमन पुर आए। क्रोध देखि जहँ तहँ कपि धाए ।।

अर्थात् :- सबको भय, प्रीति और निति दिखलायी। सब बंदर चरणों में सिर नवाकर चले। इसी समय लक्ष्मणजी नगर में आये। उनका क्रोध देखकर बंदर जहाँ-तहाँ भागे। 

दो० — धनुष चढ़ाइ कहा तब जारि करउँ पुर छार ।
ब्याकुल नगर देखि तब आयउ बालिकुमार ।। 19 ।।

अर्थात् :- तदनन्तर लक्ष्मणजी ने धनुष चढ़ाकर कहा कि नगर को जलाकर अभी राख कर दूँगा। तब नगर भर को व्याकुल देखकर बालिपुत्र अंगदजी उनके पास आये।

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