Shri Ramcharitmanas / श्री रामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas
श्री रामचरितमानस


श्री सहित दिनकर बंस भूषन काम बहु छबि सोहई ।
नव अंबुधर बर गात अंबर पीत सुर मन मोहई ।।

 मुकुटांगदादि बिचित्र भूषन अंग अंगन्हि प्रति सजे ।
अंभोज नयन बिसाल उर भुज धन्य नर निरखंति जे ।।

श्रीरामचरितमानस का स्थान हिंदी-साहित्य में ही नहीं, जगत् के साहित्य में निराला है। इसके जोड़ का ऐसा ही सर्वाङ्गसुन्दर, उत्तम काव्य के लक्षणों से युक्त, साहित्य के सभी रसों का आस्वादन कराने वाला, काव्य कला की दृष्टि से भी सर्वोच्च कोटिका तथा आदर्श गार्हस्थ्य-जीवन, आदर्श राजधर्म, आदर्श पारिवारिक जीवन, आदर्श पातिव्रतधर्म, आदर्श भ्रातृधर्म के साथ-साथ सर्वोच्च भक्ति, ज्ञान, त्याग, वैराग्य तथा सदाचार की शिक्षा देने वाला, स्त्री-पुरुष, बालक-वृद्ध और युवा — सब के लिये समान उपयोगी एवं सर्वोपरि सगुण-साकार भगवान् की आदर्श मनवलीला तथा उनके गुण, प्रभाव, रहस्य तथा प्रेम के गहन तत्त्व को अत्यन्त सरल, रोचक एवं ओजस्वी शब्दों में व्यक्त करने वाला कोई दूसरा ग्रन्थ हिंदी-भाषा में नहीं, कदाचित् संसार की किसी भाषा में आज तक नहीं लिखा गया। यही कारण है कि जितने चाव से गरीब-अमीर, शिक्षित-अशिक्षित, गृहस्थ-संन्यासी, स्त्री-पुरुष, बालक-वृद्ध — सभी श्रेणी को लोग इस ग्रन्थरत्न को पढ़ते हैं, उतने चाव से और किसी ग्रन्थ को नहीं पढ़ते तथा भक्ति, ज्ञान, नीति, सदाचार का जितना प्रचार जनता में इस ग्रन्थ से हुआ है, उतना कदचित् और किसी ग्रन्थ से नहीं हुआ। 

जिस ग्रन्थ का जगत् में इतना मान हो, उसके अनेकों संस्करणों का छपना तथा उसपर अनेकों टीकाओं का लिखा जाना स्वाभाविक ही है। इस नियम के अनुसार श्रीरामचरितमानस के भी आज तक सैकड़ों संस्करण छप चुके हैं। इस पर सैकड़ों ही टीकाएँ लिखी जा चुकी हैं। हमारे गीता-पुस्तकालय में रामायण-सम्बन्धी सैकड़ों ग्रन्थ भिन्न-भिन्न भाषाओं के आ चुके हैं। अब तक अनुमानतः इसकी लाखों प्रतियाँ छप चुकी होंगी। आये दिन इसका एक-न-एक नया संस्करण देखने को मिलता है और उसमें अन्य संस्करणों की अपेक्षा कोई-न-कोई विशेषता अवश्य रहती है। इसके पाठ के सम्बन्ध में भी रामायणी विद्वानों में बहुत मतभेद है, यहाँ तक कि कई स्थलों में तो प्रत्येक चौपाई में एक-न-एक पाठभेद इस ग्रन्थ के मिलते हैं, उतने कदचित् और किसी प्राचीन ग्रन्थ के नहीं मिलते। इससे भी इसकी सर्वोपरि लोकप्रियता सिद्ध होती है।

इसके अतिरिक्त रामचरितमानस एक आशीर्वादात्मक ग्रन्थ है। इसके प्रत्येक पद्य को श्रद्धालु लोग मंत्रवत् आदर देते हैं और इसके पाठ से लौकिक एवं पारमार्थिक अनेक कार्य सिद्ध करते हैं। यही नहीं, इसका श्रद्धापूर्वक पाठ करने तथा इसमें आये हुए उपदेशों को विचारपूर्वक मनन करने एवं उनके अनुसार आचरण करने से तथा इसमें वर्णित भगवान् की मधुर लीलाओं का चिन्तन एवं कीर्तन करने से मोक्ष रूप परम पुरुषार्थ एवं उससे भी बढ़कर भगवत्प्रेम की प्राप्ति आसानी से की जा सकती है।

और पढ़ें

Leave a Comment

error: Content is protected !!