Shri Ramji Se Hanuman Ji Ka Milna / श्री रामजी से हनुमान

श्रीरामचरितमानस किष्किन्धाकाण्ड

Shri Ramji Se Hanuman Ji Ka Milna Aur Shriram Sugriv Ki Mitrta
श्री रामजी से हनुमान जी का मिलना और श्रीराम सुग्रीव की मित्रता

Shri Ramji Se Hanuman Ji Ka Milna Aur Shriram Sugriv Ki Mitrta, श्री रामजी से हनुमान जी का मिलना और श्रीराम सुग्रीव की मित्रता :- हे वीर ! साँवले और गोर शरीर वाले आप कौन हैं, जो क्षत्रिय के रूप में वन में फिर रहे हैं ? हे स्वामी ! कठोर भूमि पर कोमल चरणों से चलनेवाले आप किस कारण वन में विचर रहे हैं। प्रभु को पहचानकर हनुमान् जी उनके चरण पकड़कर पृथ्वी पर गिर पड़े। [ शिवजी कहते हैं – ] हे पार्वती ! वह सुख वर्णन नहीं किया जा सकता। शरीर पुलकित है, मुख से वचन नहीं निकलता। वे प्रभु के सुन्दर वेष की रचना देख रहे हैं !


आगें चले बहुरि रघुराया। रिष्यमूक पर्बत निअराया ।।

तहँ रह सचिव सहित सुग्रीवा। आवत देखि अतुल बल सींवा ।।

अर्थात् :- श्रीरघुनाथजी फिर आगे चले। ऋष्यमूक पर्वत निकट आ गया। वहाँ ( ऋष्यमूक पर्वत पर ) मन्त्रियों सहित सुग्रीव रहते थे। अतुलनीय बल की सीमा श्रीरामचन्द्रजी और लक्ष्मणजी को आते देखकर। –

अति सभीत कह सुनु हनुमाना। पुरुष जुगल बल रूप निधाना ।।
धरि बटु रूप देखु तैं जाई। कहेसु जानि जियँ सयन बुझाई ।।

अर्थात् :- सुग्रीव अत्यन्त भयभीत होकर बोले – हे हनुमान् ! सुनो, ये दोनों पुरुष बल और रूप के निधान हैं। तुम ब्रह्मचारी का रूप धारण करके जाकर देखो। अपने हृदय में उनकी यथार्थ बात जानकर मुझे इशारे से समझाकर कह देना।  

पठए बालि होहिं मन मैला। भागौं तुरत तजौं यह सैला ।।
बिप्र रूप धरि कपि तहँ गयऊ। माथ नाइ पूछत अस भयऊ ।।

अर्थात् :- यदि वे मन के मलीन बलि के भेजे हुए हों तो मैं तुरंत ही इस पर्वत को छोड़कर भाग जाऊँ। [ यह सुनकर ] हनुमान् जी ब्राह्मण का रूप धरकर वहाँ गये और मस्तक नवाकर इस प्रकार पूछने लगे। – 

को तुम्ह स्यामल गौर सरीरा। छत्री रूप फिरहु बन बीरा ।।
कठिन भूमि कोमल पद गामी। कवन हेतु बिचरहु बन स्वामी ।।

अर्थात् :- हे वीर ! साँवले और गोर शरीर वाले आप कौन हैं, जो क्षत्रिय के रूप में वन में फिर रहे हैं ? हे स्वामी ! कठोर भूमि पर कोमल चरणों से चलनेवाले आप किस कारण वन में विचर रहे हैं। 

मृदुल मनोहर सुंदर गाता। सहत दुसह बन आतप बाता ।।
की तुम्ह तीनि देव महँ कोऊ। नर नारायन की तुम्ह दोऊ ।।

अर्थात् :- मन को हरण करने वाले आपके सुन्दर, कोमल अंग हैं, और आप वन के दुःसह धूप और वायु को सह रहे हैं। क्या आप ब्रह्मा, विष्णु, महेश – इन तीन देवताओं में से कोई हैं, या आप दोनों नर और नारायण हैं। 

दो० — जग कारन तारन भव भंजन धरनी भार ।
की तुम्ह अखिल भुवन पति लीन्ह मनुज अवतार ।। 1 ।।

अर्थात् :- अथवा आप जगत् के मूल कारण और सम्पूर्ण लोकों के स्वामी स्वयं भगवान् हैं, जिन्होंने लोगों को भवसागर से पार उतारने तथा पृथ्वी का भर नष्ट करने के लिये मनुष्य-रूप में अवतार लिया है ?

कोसलेस दसरथ के जाए। हम पितु बचन मानि बन आए ।।
नाम राम लछिमन दोउ भाई। संग नारि सुकुमारि सुहाई ।।

अर्थात् :- [ श्रीरामचन्द्रजी ने कहा – ] हम कोसलराज दशरथजी के पुत्र हैं और पिता के वचन मानकर वन आये हैं। हमारे राम-लक्ष्मण नाम हैं, हम दोनों भाई हैं। हमारे साथ सुन्दर सुकुमारी स्त्री थी।  

इहाँ हरी निसिचर बैदेही। बिप्र फिरहिं हम खोजत तेही ।।
आपन चरित कहा हम गाई। कहहु बिप्र निज कथा बुझाई ।।

अर्थात् :- यहाँ ( वन में ) राक्षस ने [ मेरी पत्नी ] जानकीजी को हर लिया। हे ब्राह्मण ! हम उसे ही खोजते फिरते हैं। हमने तो अपना चरित्र कह सुनाया। अब हे ब्राह्मण ! अपनी कथा समझाकर कहिये। 

प्रभु पहिचानि परेउ गहि चरना। सो सुख उमा जाइ नहिं बरना ।।
पुलकित तन मुख आव न बचना। देखत रुचिर बेष कै रचना ।।

अर्थात् :- प्रभु को पहचानकर हनुमान् जी उनके चरण पकड़कर पृथ्वी पर गिर पड़े ( उन्होंने साष्टाङ्ग दण्डवत्-प्रणाम किया )। [ शिवजी कहते हैं – ] हे पार्वती ! वह सुख वर्णन नहीं किया जा सकता। शरीर पुलकित है, मुख से वचन नहीं निकलता। वे प्रभु के सुन्दर वेष की रचना देख रहे हैं !

पुनि धीरजु धरि अस्तुति किन्ही। हरष हृदयँ निज नाथहि चीन्ही ।।
मोर न्याउ मैं पूछा साईं। तुम्ह पूछहु कस नर की नाईं ।।

अर्थात् :- फिर धीरज धरकर स्तुति की। अपने नाथ का पहचान लेने से हृदय में हर्ष हो रहा है। [ फिर हनुमान् जी ने कहा – ] हे स्वामी ! मैंने जो पूछा वह मेरा पूछना तो न्याय था, [ वर्षों के बाद आपको देखा, वह भी तपस्वी के वेष में और मेरी वानरी-बुद्धि, इससे मैं तो आपको पहचान न सका और अपनी परिस्थिति के अनुसार मैंने आपसे पूछा ] परन्तु आप मनुष्य की तरह कैसे पूछ रहे हैं ?

तव माया बस फिरउँ भुलाना। ताते मैं नहिं प्रभु पहिचाना ।।

अर्थात् :- मैं तो आपकी माया के वश भूला फिरता हूँ ; इसीसे मैंने अपने स्वामी ( आप ) को नहीं पहचाना। 

दो० — एकु मैं मंद मोहबस कुटिल हृदय अग्यान ।
पुनि प्रभु मोहि बिसारेउ दीनबंधु भगवान ।। 2 ।।

अर्थात् :- एक तो मैं यों ही मन्द हूँ, दूसरे मोह के वश में हूँ, तीसरे हृदय का कुटिल और अज्ञान हूँ, फिर हे दीनबन्धु भगवान् ! प्रभु ( आप ) ने भी मुझे भुला दिया। 

जदपि नाथ बहु अवगुन मोरें। सेवक प्रभुहि परै जनि भोरें ।।
नाथ जीव तव मायाँ मोहा। सो निस्तरइ तुम्हारेहिं छोहा ।।

अर्थात् :- हे नाथ ! यद्यपि मुझमें बहुत-से अवगुण हैं, तथापि सेवक स्वामी की विस्मृति में न पड़े ( आप उसे न भूल जायँ ) हे नाथ ! जीव आपकी माया से मोहित है। वह आपही की कृपा से निस्तार पा सकता है। 

ता पर मैं रघुबीर दोहाई। जानउँ नहिं कछु भजन उपाई ।।
सेवक सुत पति मातु भरोसें। रहइ असोच बनइ प्रभु पोसें ।।

अर्थात् :- उसपर हे रघुवीर ! मैं आपकी दुहाई ( शपथ ) करके कहता हूँ कि मैं भजन-साधन कुछ नहीं जानता। सेवक स्वामी के और पुत्र माता के भरोसे निश्चिन्त रहता है। प्रभु को सेवक का पालन-पोषण करते ही बनता है ( करना ही पड़ता है )।  

अस कहि परेउ चरन अकुलाई। निज तनु प्रगटि प्रीति उर छाई ।।
तब रघुपति उठाइ उर लावा। निज लोचन जल सींचि जुड़ावा ।।

अर्थात् :- ऐसा कहकर हनुमान् जी अकुलाकर प्रभु के चरणों पर गिर पड़े, उन्होंने अपना असली शरीर प्रकट कर दिया। उनके हृदय में प्रेम छा गया। तब श्रीरघुनाथजी ने उन्हें उठाकर हृदय से लगा लिया और अपने नेत्रों के जल से सींचकर शीतल किया। 

सुनु कपि जियँ मानसि जनि ऊना। तैं मम प्रिय लछिमन ते दूना ।।
समदरसी मोहि कह सब कोऊ। सेवक प्रिय अनन्य गति सोऊ ।।

अर्थात् :- [ फिर कहा – ] हे कपि ! सुनो, मन में ग्लानि मत मानना ( मन छोटा न करना )। तुम मुझे लक्ष्मणजी से भी दूने प्रिय हो। सब कोई मुझे समदर्शी कहते हैं ( मेरे लिये न कोई प्रिय है और न अप्रिय ) पर मुझको सेवक प्रिय है, क्योंकि वह अनन्यगति होता है ( मुझे छोड़कर उसको कोई दूसरा सहारा नहीं होता )। 

दो० — सो अनन्य जाकें असि मति न टरइ हनुमंत ।
मैं सेवक सचराचर रूप स्वामि भगवंत ।। 3 ।।

अर्थात् :- और हे हनुमान् ! अनन्य वही है जिसकी ऐसी बुद्धि कभी नहीं टलती कि मैं सेवक हूँ और यह चराचर ( जड-चेतन ) जगत् मेरे स्वामी भगवान् का रूप है।

आगे पढ़ें

इसे भी पढ़ें :-

Leave a Comment

error: Content is protected !!