Shri Siddh Saraswati Stotram / श्री सिद्ध सरस्वती स्तोत्रम

Shri Siddh Saraswati Stotram
श्री सिद्ध सरस्वती स्तोत्रम्

Shri Siddh Saraswati Stotram, श्री सिद्ध सरस्वती स्तोत्रम् :- जो श्वेत हंस पर सवार होकर आकाश में विचरण करती है, जिनके दाहिने हाथ में अक्षमाला और बायें हाथ में दिव्य स्वर्णमय वस्त्र से आवेष्टित पुस्तक शोभित है, जो ज्ञानगम्या हैं, जो वीणा बजाती हुई और अपने हाथ की करमाला से शास्त्रोक बीजमन्त्रों का जप करती हुई क्रीडारत हैं, जिनका दिव्य रूप है तथा जो हाथ में कमल धारण करती हैं, वे सरस्वती देवी मुझ पर प्रसन्न हों। 

ध्यानम्

दोर्भिर्युक्ताश्चतुर्भिः स्फटिकमणिमयीमक्षमालां दधाना
हस्तेनैकेन पद्मं सितमपि स शुकं पुस्तकं चापरेन ।
या सा कुन्देन्दुशङ्खस्फटिकमणिनिभा  भासमाना समाना
सा मे वाग्देवतेयं निवसतु वदने सर्वदा सुप्रसन्ना ।। 1 ।।

अर्थात् :- ध्यान – जो चार हाथों से सुशोभित हैं और उन हाथों में स्फटिकमणि की बनी हुई अक्षमाला, श्वेत कमल, शुक और पुस्तक धारण किये हुई हैं। जो कुन्द, चन्द्रमा, शंख और स्फटिकमणि के सदृश देदीप्यमान होती हुई इनके समान उज्जवल वर्णा हैं, वे ही ये वाग्देवता सरस्वती परम प्रसन्न होकर सर्वदा मेरे मुख में निवास करें।

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आरूढ़ा श्वेतहंसे भ्रमति च गगने दक्षिणे चाक्षसूत्रं
वामे हस्ते च दिव्याम्बरकनकमयं पुस्तकं ज्ञानगम्या ।
सा वीणां वादयन्ती स्वकरकरजपैः शास्त्रविज्ञानशब्दैः
क्रीडन्ती दिव्यरूपा करकमलधरा भारती सुप्रसन्ना ।। 2 ।।

अर्थात् :- जो श्वेत हंस पर सवार होकर आकाश में विचरण करती है, जिनके दाहिने हाथ में अक्षमाला और बायें हाथ में दिव्य स्वर्णमय वस्त्र से आवेष्टित पुस्तक शोभित है, जो ज्ञानगम्या हैं, जो वीणा बजाती हुई और अपने हाथ की करमाला से शास्त्रोक बीजमन्त्रों का जप करती हुई क्रीडारत हैं, जिनका दिव्य रूप है तथा जो हाथ में कमल धारण करती हैं, वे सरस्वती देवी मुझ पर प्रसन्न हों। 

श्वेतपद्मासना देवी श्वेतगन्धानुलेपना ।
अर्चिता मुनिभिः सर्वैऋषिभिः स्तूयते सदा ।। 3 ।।
एवं ध्यात्वा सदा देवीं वाञ्छितं लभते नरः ।। 4 ।।

अर्थात् :- जो भगवती श्वेत कमल पर आसीन हैं, जिनके शरीर में श्वेत चन्दन का अनुलेप है, मुनिगण जिनका अर्चना करते हैं तथा सभी ऋषि सदा जिनका स्तवन करते हैं- इस प्रकार सदा देवी का ध्यान करके मनुष्य मनोवांछित फल प्राप्त कर लेता है। 

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विनियोगः
ॐ अस्य श्रीसिद्धसरस्वतीस्तोत्रमन्त्रस्य मार्कण्डेय ऋषिः, स्रग्धरा अनुष्टुप् छन्दः, मम वाग्विलाससिद्ध्यर्थं पाठे विनियोगः ।

अर्थात् :- विनियोग- इस श्रीसिद्धसरस्वती स्तोत्र मन्त्र के मार्कण्डेय ऋषि हैं, स्रग्धरा अनुष्टुप् छन्द है, अपनी वाक्-शक्ति की सिद्धि के लिये पाठ में विनियोग होता है। 

शुक्लां ब्रह्मविचारसारपरमामाद्यां जगद्व्यापिनीं
वीणापुस्तकधारिणीमभयदां जाड्यान्धकारापहाम् ।
हस्ते स्फाटिकमालिकां विदधतीं पद्मासने संस्थितां
वन्दे तां परमेश्वरीं भगवतीं बुद्धिप्रदां शारदाम् ।। 1 ।

अर्थात् :- जिनका रूप श्वेत है, जो ब्रह्मविचार की परम तत्त्व हैं, आदि शक्ति हैं, सब संसार में व्याप्त हैं, हाथों में वीणा और पुस्तक धारण किये रहती हैं, भक्तों को अभय देती हैं, मूर्खता रूपी अन्धकार को दूर करती हैं, हाथ में स्फटिक-मणि की माला लिये रहती हैं, कमल के आसन पर विराजमान हैं और बुद्धि देने वाली हैं, उन परमेश्वरी भगवती सरस्वती की मैं वन्दना करता हूँ।

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या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता
या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना ।
या ब्रह्माच्युतशङ्करप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता
सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा ।। 2 ।।

अर्थात् :- जो कुन्द के फूल, चन्द्रमा, हिम और हार के समान श्वेत हैं; जो शुभ्र वस्त्र धारण करती हैं; जिनके हाथ उत्तम वीणा से सुशोभित हैं; जो श्वेत कमलासन पर बैठती हैं; ब्रह्मा, विष्णु, महेश आदि देव जिनकी सदा स्तुति करते हैं और जो सब प्रकार की जड़ता का हरण कर लेती हैं, वे भगवती सरस्वती मेरी रक्षा करें।

ह्रीं ह्रीं हृद्यैकबीजे शशिरुचिकमले कल्पविस्पष्टशोभे
भव्ये भव्यानुकूले कुमतिवनदवे विश्ववन्द्याङ्घ्रिपद्मे ।
पद्मे पद्मोपविष्टे प्रणतजनमनोमोदसम्पादयित्रि
प्रोत्फुल्लज्ञानकूटे हरिनिजदयिते देवि संसारसारे ।। 3 ।।

अर्थात् :- ‘ह्रीं ह्रीं’- इस एकमात्र मनोहर बीजमन्त्र वाली, चन्द्रमा की कान्ति वाले श्वेत कमल के समान विग्रह वाली, प्रत्येक कल्प में व्यक्त रूप से सुशोभित होने वाली, भव्य स्वरूप वाली, प्रिय तथा अनुकूल स्वभाव वाली, कुबुद्धि रूपी वन को दग्ध करने के लिये दावानल स्वरूपिणी, सम्पूर्ण जगत् के द्वारा वन्दित चरणकमल वाली, कमलारूपा, कमल के आसन पर विराजमान रहने वाली, शरणागत जनों के मन को आह्लादित करने वाली, महान् ज्ञान की शिखर स्वरूपिणी, भार्या रूप में भगवान् विष्णु की आत्मशक्ति के रूप में प्रतिष्ठित तथा संसार की तत्त्व स्वरूपिणी हे देवि ! (मैं आपकी स्तुति और वन्दना करता हूँ।)

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