Siddhi Vinayak Stotram / श्री सिद्धि विनायक स्तोत्रम्

Shri Siddhi Vinayak Stotram
श्री सिद्धि विनायक स्तोत्रम्


विघ्नेश विघ्नचयखण्डननामधेय

श्रीशङ्करात्मज सुराधिपवन्द्यपाद ।

दुर्गामहाव्रतफलाखिलमङ्गलात्मन्
विघ्नं ममापहार सिद्धिविनायक त्वम् ।। 1 ।।

अर्थात् :- हे विघ्नेश ! हे सिद्धिविनायक ! आपका नाम विघ्न-समूह का खण्डन करने वाला है। आप भगवान् शंकर के सुपुत्र हैं। देवराज इन्द्र आपके चरणों की वन्दना करते हैं। आप श्रीपार्वती जी के महान् व्रत के उत्तम फल एवं निखिल मंगल रूप हैं। आप मेरे विघ्न का निवारण करें।

सत्पद्मरागमणिवर्णशरीरकान्तिः
श्रीसिद्धिबुद्धिपरिचर्चितकुङ्कुमश्रीः ।

दक्षस्तने वलयितातिमनोज्ञशुण्डो
विघ्नं ममापहर सिद्धिविनायक त्वम् ।। 2 ।।

अर्थात् :- हे सिद्धिविनायक ! आपके श्रीविग्रह की कान्ति उत्तम पद्मरागमणि के समान अरुण वर्ण की है। श्रीसिद्धि और बुद्धि देवियों ने अनुलेपन करके आपके श्रीअंगों में कुंकुम की शोभा का विस्तार किया है। आपके दाहिने स्तन पर वलयाकार मुड़ा हुआ शुण्ड-दण्ड अत्यन्त मनोहर जान पड़ता है। आप मेरे विघ्न हर लीजिये।

पाशाङ्कुशाब्जपरशूंश्च दधच्चतुर्भि-
र्दोर्भिश्च शोणकुसुमस्त्रगुमाङ्गजातः ।

सिन्दूरशोभितललाटविधुप्रकाशो
विघ्नं ममापहर सिद्धिविनायक त्वम् ।। 3 ।।

अर्थात् :- हे सिद्धिविनायक ! आप अपने चार हाथों में क्रमशः पाश, अंकुश, कमल और परशु धारण करते हैं, लाल फूलों की माला से अलंकृत हैं और उमा के अङ्ग से उत्पन्न हुए हैं तथा आपके सिन्दूर शोभित ललाट में चन्द्रमा का प्रकाश फ़ैल रहा है ; आप मेरे विघ्नों का अपहरण कीजिये।

कार्येषु विघ्नचयभीतविरञ्चिमुख्यैः
सम्पूजितः सुरवरैरपि मोदकाद्यैः ।

सर्वेषु च प्रथममेव सुरेषु पूज्यो
विघ्नं ममापहर सिद्धिविनायक त्वम् ।। 4 ।।

अर्थात् :- हे सिद्धिविनायक ! सभी कार्यों में विघ्न समूह के आ पड़ने की आशंका से भयभीत हुए ब्रह्मा आदि श्रेष्ठ देवताओं ने भी आपकी मोदक आदि मिष्टान्नों से भलीभाँति पूजा की है। आप समस्त देवताओं में सबसे पहले पूजनीय हैं। आप मेरे विघ्न-समूह का निवारण कीजिये।

शीघ्राञ्चनस्खलनतुङ्गरवोर्ध्वकण्ठ-
स्थूलेन्दुरूद्रगणहासितदेवसङ्घ ।

शूर्पश्रुतिश्च पृथुवर्तुलतुङ्गतुन्दो
विघ्नं ममापहर सिद्धिविनायक त्वम् ।। 5 ।।

अर्थात् :- हे सिद्धिविनायक ! आप जल्दी-जल्दी चलने, लड़खड़ाने, उच्चस्वर से शब्द करने, ऊर्ध्वकण्ठ होने, स्थूल इन्दु धारण करने तथा रुद्रगण को साथ रखने के कारण समस्त देवसमुदाय को हँसाते रहते हैं। आपके कान सूप के समान जान पड़ते हैं ; आप मोटा, गोलाकार और ऊँचा तुन्द ( तोंद ) धारण करते हैं ; आप मेरे विघ्नों का अपहरण कीजिये।

यज्ञोपवीतपदलम्भितनागराजो
मासादिपुण्यददृशीकृतऋक्षराजः ।

भक्ताभयप्रद दयालय विघ्नराज
विघ्नं ममापहर सिद्धिविनायक त्वम् ।। 6 ।।

अर्थात् :- आपने नागराज को यज्ञोपवीत का स्थान दे रखा है ; आप मासादि तिथि प्रतिपदा में भी पुण्यदाता चन्द्रमा का प्रत्यक्ष दर्शन करते हैं। भक्तों को अभय देने वाले हे दयाधाम हे विघ्नराज ! हे सिद्धिविनायक ! आप मेरे विघ्नों को हर लीजिये।

सद्रत्नसारततिराजितसत्किरीटः
कौसुम्भचारुवसनद्वय ऊर्जितश्रीः ।

सर्वत्र मङ्गलकरस्मरणप्रतापो
विघ्नं ममापहर सिद्धिविनायक त्वम् ।। 7 ।।

अर्थात् :- आपका सुन्दर किरीट उत्तम रत्नों के सार भागों की श्रेणियों से उद्दीप्त होता है। आप कुसुम्भी रंग के दो मनोहर वस्त्र धारण करते हैं ; आपकी शोभा या कान्ति बहुत बढ़ी-चढ़ी है और सर्वत्र आपके स्मरण का प्रताप सबका मंगल करने वाला है। हे सिद्धिविनायक ! आप मेरे विघ्न हर लें।

देवान्तकाद्यसुरभीतसुरार्तिहर्ता
विज्ञानबोधनवरेण तमोऽपहर्ता ।

आनन्दितत्रिभुवनेश कुमारबन्धो
विघ्नं ममापहर सिद्धिविनायक त्वम् ।। 8 ।।

अर्थात् :- हे सिद्धिविनायक ! आप देवान्तक आदि असुरों से डरे हुए देवताओं की पीड़ा दूर करने वाले तथा विज्ञान बोध के वरदान से सबके अज्ञानान्धकार को हर लेने वाले हैं। त्रिभुवनपति इन्द्र को आनन्दित करने वाले हे कुमारबन्धो ! आप मेरे विघ्नों का निवारण कीजिये।

।। इस प्रकार श्रीमुद्गलपुराण में विघ्ननिवारक श्रीसिद्धिविनायकस्तोत्र सम्पूर्ण हुआ ।।

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