Shri Sita Stuti / श्री सीता स्तुति

Shri Sita Stuti
श्री सीता स्तुति

Shri Sita Stuti, श्री सीता स्तुति :- हे माता ! कभी अवसर हो तो कुछ करुणा की बात छोड़कर श्रीरामचन्द्रजी को मेरी भी याद दिला देना, (इसी से मेरा काम बन जायगा।) यों कहना कि एक अत्यन्त दीन, सर्व साधनों से हीन, मनमलीन, दुर्बल और पूरा पापी मंनुष्य आपकी दासी (तुलसी)-का दास कहलाकर और आपका नाम ले-लेकर पेट भरता है। इस पर प्रभु कृपा करके पूछें कि वह कौन है, तो मेरा नाम और मेरी दशा उन्हें बता देना। कृपालु रामचन्द्रजी के इतना सुन लेने से ही मेरी सारी बिगड़ी बात बन जायगी।

कबहुँक अंब, अवसर पाइ ।
मेरिऔ सुधि द्याइबी, कछु करुन-कथा चलाइ ।। 1 ।।

अर्थात् :- हे माता ! कभी अवसर हो तो कुछ करुणा की बात छोड़कर श्रीरामचन्द्रजी को मेरी भी याद दिला देना, (इसी से मेरा काम बन जायगा।)

दीन, सब अँगहीन, छीन, मलीन, अघी अघाइ ।
नाम लै भरै उदर एक प्रभु-दासी-दास कहाइ ।। 2 ।।

अर्थात् :- यों कहना कि एक अत्यन्त दीन, सर्व साधनों से हीन, मनमलीन, दुर्बल और पूरा पापी मंनुष्य आपकी दासी (तुलसी)-का दास कहलाकर और आपका नाम ले-लेकर पेट भरता है।

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बुझिहैं ‘सो है कौन‘, कहिबी नाम दसा जनाइ ।
सुनत राम कृपालुके मेरी बिगरिऔ बनि जाइ ।। 3 ।।

अर्थात् :- इस पर प्रभु कृपा करके पूछें कि वह कौन है, तो मेरा नाम और मेरी दशा उन्हें बता देना। कृपालु रामचन्द्रजी के इतना सुन लेने से ही मेरी सारी बिगड़ी बात बन जायगी।

जानकी जगजननि जनकी किये बचन सहाइ ।
तरै तुलसीदास भव तव नाथ-गुन-गन गाइ ।। 4 ।।

अर्थात् :- हे जगज्जननी जानकीजी ! यदि इस दास की आपने इस प्रकार वचनों से ही सहायता कर दी तो यह तुलसीदास आपके स्वामी की गुणावली गाकर भव-सागर से तर जायगा।

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