Shri Sitaji Ka Parwati Pujan / श्री सीताजी का पार्वती पूजन

श्री रामचरितमानस बालकाण्ड

Shri Sitaji Ka Parwati Pujan Evam Vardan Prapti Tatha Ram Lakshman Samwad
श्रीसीताजी का पार्वती पूजन एवं वरदान प्राप्ति तथा राम लक्ष्मण संवाद

Shri Sitaji Ka Parwati Pujan Evam Vardan Prapti Tatha Ram Lakshman Samvad, श्री सीताजी का पार्वती पूजन एवं वरदान प्राप्ति तथा राम लक्ष्मण संवाद :- हे श्रेष्ठ पर्वतों के राजा हिमाचल की पुत्री पार्वती ! आपकी जय हो, जय हो ; हे महादेव जी के मुखरूपी चन्द्रमा की [ ओर टकटकी लगाकर देखने वाली ] चकोरी ! आपकी जय हो ; हे हाथी के मुखवाले गणेश जी और छः मुखवाले स्वामिकार्तिकेय जी की माता ! घी जगज्जननी ! हे बिजली की-सी कान्तियुक्त शरीरवाली ! आपकी जय हो ! पति को इष्ट देव मानने वाली श्रेष्ठ नारियों में हे माता ! आपकी प्रथम गणना है। आपकी अपार महिमा को हजारों सरस्वती और शेषजी भी नहीं कह सकते।


सोभा सीवँ सुभग दोउ बीरा। नील पीत जलजाभ सरीरा ।।

मोरपंख सिर सोहत नीके। गुच्छ बीच बिच कुसुम कली के ।।

अर्थात् :- दोनों सुन्दर भाई शोभा की सीमा हैं। उनके शरीर की आभा नीले और पीले कमल की-सी है। सिर पर सुन्दर मोर पंख सुशोभित हैं। उनके बीच-बीच में फूलों की कलियों के गुच्छे लगे हैं।

भाल तिलक श्रमबिंदु सुहाए। श्रवन सुभग भूषन छबि छाए ।।
बिकट भृकुटि कच घूघरवारे। नव सरोज लोचन रतनारे ।।

अर्थात् :- माथे पर तिलक और पसीने की बूँदें शोभयमान हैं। कानों में सुन्दर भूषणों की छबि छायी है। टेढ़ी भौहें और घुँघराले बाल है। नये लाल कमल के समान रतनारे ( लाल ) नेत्र हैं।

चारु चिबुक नासिका कपोला। हास बिलास लेत मनु मोला ।।
मुखछबि कहि न जाइ मोहि पाहीं। जो बिलोकि बहु काम लजाहीं ।।

अर्थात् :- ठोड़ी, नाक और गाल बड़े सुन्दर हैं, और हँसी की शोभा मन को मोल लिये लेती है। मुख की छबि तो मुझसे कही ही नहीं जाती, जिसे देखकर बहुत-से कामदेव लजा जाते हैं।

उर मनि माल कंबु कल गीवा। काम कलभ कर भुज बलसींवा ।।
सुमन समेत बाम कर दोना। सावँर कुअँर सखी सुठि लोना ।।

अर्थात् :- वक्षःस्थल पर मणियों की माला है। शङ्ख के सदृश सुन्दर गला है। कामदेव के हाथी के बच्चे की सूँड के समान ( उतार-चढ़ाव वाली एवं कोमल ) भुजाएँ हैं, जो बल की सीमा हैं। जिसके बायें हाथ में फ़ूलोंसाहित दोना है, हे सखि ! वह साँवला कुँवर तो बहुत ही सलोना है।

दो० — केहरि कटि पट पीत धर सुषमा सील निधान ।
देखि भानुकुलभूषनहि बिसरा सखिन्ह अपान ।। 233 ।।

अर्थात् :- सिंह की-सी ( पतली, लचीली ) कमरवाले, पीताम्बर धारण किये हुए, शोभा और शील के भण्डार, सूर्यकुल के भूषण श्रीरामचन्द्रजी को देखकर सखियाँ अपने-आपको भूल गयीं।

धरि धीरजु एक आलि सयानी। सीता सन बोली गहि पानी ।।
बहुरि गौरि कर ध्यान करेहू। भूपकिसोर देखि किन लेहू ।।

अर्थात् :- एक चतुर सखी धीरज धरकर, हाथ पकड़कर सीताजी से बोली – गिरिजाजी का ध्यान फिर लेना, इस समय राजकुमार को क्यों नहीं देख लेतीं।

सकुचि सीयँ तब नयन उघारे। सनमुख दोउ रघुसिंघ निहारे ।।
नख सिख देखि राम कै सोभा। सुमिरि पिता पनु मनु अति छोभा ।।

अर्थात् :- तब सीताजी ने सकुचाकर नेत्र खोले और रघुकुल के दोनों सिंहों को अपने सामने [ खड़े ] देखा। नख से शिखा तक श्रीरामजी शोभा देखकर और फिर पिता का प्रण याद करके उनका मन बहुत क्षुब्ध हो गया।

परबस सखिन्ह लखी जब सीता। भयउ गहरु सब कहहिं सभीता ।।
पुनि आउब एहि बेरिआँ काली। अस कहि मन बिहसी एक आली ।।

अर्थात् :- जब सखियों ने सीताजी को परवश ( प्रेम के वश ) देखा, तब सब भयभीत होकर कहने लगीं – बड़ी देर हो गयी [ अब चलना चाहिये ]। कल इसी समय फिर आयेंगी, ऐसा कहकर एक सखी मन में हँसी।

गूढ़ गिरा सुनि सिय सकुचानी। भयउ बिलंबु मातु भय मानी ।।
धरि बड़ि धीर रामु उर आने। फिरी अपनपउ पितुबस जाने ।।

अर्थात् :- सखी की यह रहस्यभरी वाणी सुनकर सीताजी सकुचा गयीं। देर हो गयी जान उन्हें माता का भय लगा। बहुत धीरज धरकर वे श्रीरामचन्द्रजी को हृदय में ले आयीं, और [ उनका ध्यान करती हुई ] अपने को पिता के अधीन जानकर लौट चलीं।

दो० — देखन मिस मृग बिहग तरु फिरइ बहोरि बहोरि ।
निरखि निरखि रघुबीर छबि बाढ़इ प्रीति न थोरि ।। 234 ।।

अर्थात् :- मृग, पक्षी और वृक्षों को देखने के बहाने सीताजी बार-बार घूम जाती हैं और श्रीरामजी की छबि देख-देखकर उनका प्रेम कम नहीं बढ़ रहा है ( अर्थात् बहुत ही बढ़ता जाता है)।

जानि कठिन सिवचाप बिसूरति। चली राखि उर स्यामल मूरति ।।
प्रभु जब जात जानकी जानी। सुख सनेह सोभा गुन खानी ।।

अर्थात् :- शिवजी के धनुष को कठोर जानकर वे विसूरती ( मन में विलाप करती ) हुई हृदय में श्रीरामजी की साँवली मूर्ति को रखकर चलीं। ( शिवजी के धनुष की कठोरता का स्मरण आने से उन्हें चिन्ता होती थी कि ये सुकुमार रघुनाथ जी उसे कैसे तोड़ेंगे, पिता के प्रण की स्मृति से उनके हृदय में क्षोभ था ही, इसलिये मन में विलाप करने लगीं। प्रेमवश ऐश्वर्य की विस्मृति हो जाने से ही ऐसा हुआ ; फिर भगवान् के बल का स्मरण आते ही वे हर्षित हो गयीं और साँवली छबि को हृदय में धारण करके चली)। प्रभु श्रीरामजी ने जब सुख, स्नेह, शोभा और गुणों की खान श्रीजानकीजी जाती हुई जाना।

परम प्रेममय मृदु मसि किन्ही। चारु चित्त भीतीं लिखि लीन्ही ।।
गई भवानी भवन बहोरी। बंदि चरन बोली कर जोरी ।।

अर्थात् :- तब परम प्रेम की कोमल स्याही बनाकर उनके स्वरुप को अपने सुन्दर चित्तरूपी भित्ति पर चित्रित कर लिया। सीताजी पुनः भवानी के मन्दिर में गयीं और उनके चरणों की वन्दना करके हाथ जोड़कर बोलीं। —

जय जय गिरिबरराज किसोरी। जय महेस मुख चंद चकोरी ।।
जय गजबदन षडानन माता। जगत जननि दामिनि दुति गाता ।।

अर्थात् :- हे श्रेष्ठ पर्वतों के राजा हिमाचल की पुत्री पार्वती ! आपकी जय हो, जय हो ; हे महादेव जी के मुखरूपी चन्द्रमा की [ ओर टकटकी लगाकर देखने वाली ] चकोरी ! आपकी जय हो ; हे हाथी के मुखवाले गणेश जी और छः मुखवाले स्वामिकार्तिकेय जी की माता ! घी जगज्जननी ! हे बिजली की-सी कान्तियुक्त शरीरवाली ! आपकी जय हो !

नहिं तव आदि मध्य अवसाना। अमित प्रभाउ बेदु नहिं जाना ।।
भव भव बिभव पराभव कारिनि। बिस्व बिमोहनि स्वबस बिहारिनि ।।

अर्थात् :- आपका न आदि है, न मध्य है और न अन्त है। आपके असीम प्रभाव को वेद भी नहीं जानते। आप संसार को उत्पन्न, पालन और नाश करने वाली हैं। विश्व को मोहित करने वाली और स्वतन्त्र रूप से विहार करने वाली है।

दो० — पतिदेवता सुतीय महुँ मातु प्रथम तव रेख ।
महिमा अमित न सकहिं कहि सहस सारदा सेष ।। 235 ।।

अर्थात् :- पति को इष्ट देव मानने वाली श्रेष्ठ नारियों में हे माता ! आपकी प्रथम गणना है। आपकी अपार महिमा को हजारों सरस्वती और शेषजी भी नहीं कह सकते।

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